हैली पुच्छल तारा (Halley’s Comet) प्रति कितने वर्ष बाद दिखाई पड़ता है?

Sanjay Yadav
हैली पुच्छल तारा (Halley’s Comet) प्रति 76 वर्ष बाद दिखाई पड़ता है। रात्रि के आकाश में दिखाई देने वाले खगोलीय पिंड सदियों से मानव जिज्ञासा, भय, आस्था और वैज्ञानिक अध्ययन का विषय रहे हैं। तारों, ग्रहों और नक्षत्रों के अतिरिक्त कुछ ऐसे खगोलीय पिंड भी हैं जो अचानक प्रकट होते हैं, कुछ समय तक आकाश में चमकते रहते हैं और फिर लुप्त हो जाते हैं। इन्हीं में से एक है पुच्छल तारा जिसे अंग्रेज़ी में Comet कहा जाता है।

हैली पुच्छल तारा (Halley’s Comet) प्रति 76 वर्ष बाद दिखाई पड़ता है।

सभी पुच्छल तारों में सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक महत्व वाला पुच्छल तारा है हैली पुच्छल तारा (Halley’s Comet)। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लगभग प्रति 76 वर्ष के अंतराल पर पृथ्वी से दिखाई देता है। यह विशेषता इसे अन्य पुच्छल तारों से अलग बनाती है और इसी कारण यह मानव इतिहास में बार-बार दर्ज किया गया है।

पुच्छल तारा क्या है?

पुच्छल तारा सौरमंडल का एक छोटा खगोलीय पिंड होता है जो मुख्यतः बर्फ, धूल, जमी हुई गैसों और चट्टानी पदार्थों से मिलकर बना होता है। जब कोई पुच्छल तारा सूर्य से बहुत दूर होता है तब वह सामान्यतः निष्क्रिय रहता है और दिखाई नहीं देता।

जैसे ही वह अपनी कक्षा में घूमते हुए सूर्य के पास आता है सूर्य की ऊष्मा के कारण उसकी बर्फ पिघलने लगती है। इससे गैस और धूल बाहर निकलती हैं और एक चमकीला सिर (कोमा) तथा लंबी पूँछ (पुच्छ) बन जाती है। यही पूँछ पुच्छल तारे को विशिष्ट पहचान देती है।

हैली पुच्छल तारे की खोज और नामकरण

हैली पुच्छल तारे का नाम प्रसिद्ध अंग्रेज़ खगोलशास्त्री एडमंड हैली के नाम पर रखा गया है। 17वीं शताब्दी में उन्होंने ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि 1531, 1607 और 1682 में दिखाई देने वाले पुच्छल तारे वास्तव में एक ही पुच्छल तारा थे जो नियमित अंतराल पर पृथ्वी के पास से गुजरता है।

एडमंड हैली ने भविष्यवाणी की थी कि यह पुच्छल तारा 1758–59 में पुनः दिखाई देगा। उनकी मृत्यु के बाद यह भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई और तभी से इस पुच्छल तारे को उनके सम्मान में हैली पुच्छल तारा कहा जाने लगा।

हैली पुच्छल तारे की कक्षा और आवर्तकाल

हैली पुच्छल तारा सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षा में घूमता है। इसकी कक्षा अत्यंत विस्तृत है और यह सूर्य के बहुत निकट भी आता है तथा अत्यधिक दूर भी चला जाता है।
  • इसका औसत आवर्तकाल लगभग 76 वर्ष है।
  • हालांकि, गुरुत्वीय प्रभावों के कारण यह अवधि कभी-कभी 74 से 79 वर्ष के बीच बदल सकती है।
  • यह पुच्छल तारा सूर्य के पास आने पर पृथ्वी से दिखाई देता है और फिर सूर्य से दूर जाकर अदृश्य हो जाता है।
  • इसका अंतिम दर्शन 1986 में हुआ था और अगली बार इसके 2061 में दिखाई देने की संभावना है।

ऐतिहासिक काल में हैली पुच्छल तारे के दर्शन

हैली पुच्छल तारे का उल्लेख मानव इतिहास में हजारों वर्षों से मिलता है। विभिन्न सभ्यताओं ने इसे अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा।

प्राचीन सभ्यताएँ
  • चीन के खगोलशास्त्रियों ने 240 ईसा पूर्व में इसके दर्शन का उल्लेख किया है।
  • बेबीलोन और यूनान में भी इसके प्रेक्षण के प्रमाण मिलते हैं।
मध्यकालीन यूरोप
  • 1066 ईस्वी में जब यह पुच्छल तारा दिखाई दिया उसी समय इंग्लैंड पर नॉर्मन विजय हुई। इसे उस समय शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़ा गया। प्रसिद्ध बायू टेपेस्ट्री में भी इसका चित्रण मिलता है।
आधुनिक युग
  • 1910 और 1986 में इसके दर्शन आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से किए गए। विशेष रूप से 1986 में अंतरिक्ष यानों द्वारा इसके निकट से अध्ययन किया गया जिससे इसके संरचना और संघटन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।

वैज्ञानिक दृष्टि से हैली पुच्छल तारे का महत्व

सौरमंडल की उत्पत्ति का अध्ययन
  • पुच्छल तारे सौरमंडल के सबसे प्राचीन पिंडों में से माने जाते हैं। हैली पुच्छल तारे का अध्ययन करके वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता मिलती है कि सौरमंडल की उत्पत्ति के समय किन पदार्थों की उपस्थिति थी।
रासायनिक संरचना की जानकारी
  • इस पुच्छल तारे में पानी की बर्फ, कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया और अन्य कार्बनिक यौगिक पाए गए हैं। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि जीवन के लिए आवश्यक तत्व पृथ्वी तक पुच्छल तारों के माध्यम से पहुँचे हो सकते हैं।
गुरुत्वीय प्रभावों का अध्ययन
  • हैली पुच्छल तारे की कक्षा में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों से ग्रहों विशेष रूप से बृहस्पति के गुरुत्वीय प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

हैली पुच्छल तारा और मानव संस्कृति

हैली पुच्छल तारे का प्रभाव केवल विज्ञान तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका गहरा प्रभाव मानव संस्कृति, साहित्य और लोककथाओं पर भी पड़ा है।
  • प्राचीन काल में इसे युद्ध, महामारी या राजाओं के पतन का संकेत माना जाता था।
  • कुछ संस्कृतियों में इसे देवताओं का संदेश या दैवी चेतावनी समझा गया।
  • आधुनिक युग में यह वैज्ञानिक जिज्ञासा और खगोलीय शिक्षा का प्रतीक बन गया है।

1986 का प्रेक्षण और अंतरिक्ष मिशन

1986 में हैली पुच्छल तारे के आगमन के समय कई अंतरिक्ष यानों को इसके अध्ययन के लिए भेजा गया। इन यानों ने इसके केंद्र (न्यूक्लियस) की तस्वीरें लीं और इसकी गैसों व धूल का विश्लेषण किया। इन अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि:
  • इसका केंद्र अनियमित आकार का है।
  • सतह पर सक्रिय और निष्क्रिय दोनों प्रकार के क्षेत्र मौजूद हैं।
  • इससे निकलने वाली गैसें और धूल सूर्य के प्रभाव से तेज़ी से अंतरिक्ष में फैलती हैं।

अगला दर्शन: 2061

हैली पुच्छल तारा अगली बार 2061 में पृथ्वी के पास आएगा। उस समय यह पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और चमकीला दिखाई देने की संभावना है। वर्तमान पीढ़ी के अनेक लोग इस ऐतिहासिक खगोलीय घटना के साक्षी बन सकेंगे। यह दर्शन न केवल वैज्ञानिकों के लिए बल्कि आम लोगों के लिए भी खगोल विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने वाला अवसर होगा।

अन्य पुच्छल तारों से तुलना

हालाँकि सौरमंडल में अनेक पुच्छल तारे हैं लेकिन अधिकांश का आवर्तकाल या तो बहुत छोटा होता है या अत्यधिक लंबा। हैली पुच्छल तारा इस दृष्टि से अद्वितीय है कि:
  • इसका आवर्तकाल मानव जीवनकाल के आसपास है।
  • इसे कई पीढ़ियाँ अपने जीवन में देख सकती हैं।
  • इसका ऐतिहासिक रिकॉर्ड अत्यंत समृद्ध है।

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