स्फिग्नोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) नामक यंत्र से क्या नापते हैं?

Sanjay Yadav
स्फिग्नोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) नामक यंत्र से रक्त दाब (Blood Pressure) नापते हैं। मानव शरीर में रक्त दाब (Blood Pressure) जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक जैविक मानक है। यह हृदय द्वारा पम्प किए गए रक्त के कारण धमनियों की दीवारों पर पड़ने वाले दबाव को दर्शाता है। रक्त दाब का संतुलित रहना स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है जबकि इसमें असामान्यता अनेक रोगों जैसे उच्च रक्तचाप (Hypertension), निम्न रक्तचाप (Hypotension), हृदय रोग, स्ट्रोक, गुर्दा विकार आदि का कारण बन सकती है। रक्त दाब को मापने के लिए जिस वैज्ञानिक यंत्र का उपयोग किया जाता है उसे स्फिग्नोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) कहा जाता है। यह यंत्र आधुनिक चिकित्सा पद्धति का एक मूल स्तंभ है और चिकित्सकीय जांच का अनिवार्य भाग बन चुका है।

स्फिग्नोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) नामक यंत्र से रक्त दाब (Blood Pressure) नापते हैं।

रक्त दाब की संकल्पना

रक्त दाब दो प्रमुख मानों में व्यक्त किया जाता है:
  • सिस्टोलिक रक्त दाब (Systolic Blood Pressure): जब हृदय संकुचन करता है और रक्त को धमनियों में प्रवाहित करता है तब उत्पन्न अधिकतम दाब।
  • डायस्टोलिक रक्त दाब (Diastolic Blood Pressure): जब हृदय शिथिल अवस्था में होता है और धमनियों में न्यूनतम दाब बना रहता है।
सामान्य वयस्क व्यक्ति का औसत रक्त दाब लगभग 120/80 मिमी पारे (mmHg) माना जाता है। यहाँ 120 सिस्टोलिक और 80 डायस्टोलिक दाब को दर्शाता है।

स्फिग्नोमैनोमीटर का अर्थ एवं व्युत्पत्ति

“स्फिग्नोमैनोमीटर” शब्द ग्रीक भाषा के तीन शब्दों से मिलकर बना है:
  • Sphygmos = नाड़ी
  • Manos = दबाव
  • Meter = मापने वाला यंत्र
अर्थात् यह यंत्र नाड़ी अथवा रक्त प्रवाह से संबंधित दबाव को मापने वाला उपकरण है।

स्फिग्नोमैनोमीटर का ऐतिहासिक विकास

रक्त दाब मापन की अवधारणा वैज्ञानिक विकास की लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। प्रारंभिक काल में रक्त दाब का प्रत्यक्ष मापन पशुओं में नलिकाएँ डालकर किया जाता था जो जोखिमपूर्ण और अव्यावहारिक था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गैर-आक्रामक (Non-invasive) विधियों का विकास हुआ। धीरे-धीरे पारे (Mercury) आधारित स्फिग्नोमैनोमीटर विकसित हुआ जिसने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी। समय के साथ इसमें एनेरॉयड (Aneroid) और डिजिटल स्फिग्नोमैनोमीटर जैसे आधुनिक रूप भी विकसित हुए।

स्फिग्नोमैनोमीटर के प्रकार

स्फिग्नोमैनोमीटर मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं:

पारा स्फिग्नोमैनोमीटर (Mercury Sphygmomanometer)

यह सबसे पारंपरिक और सटीक माना जाने वाला यंत्र है। इसमें कांच की नली में भरा पारा रक्त दाब के अनुसार ऊपर-नीचे होता है। पारे की ऊँचाई मिमी पारे (mmHg) में रक्त दाब को दर्शाती है। हालांकि पारे के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के कारण आजकल इसका उपयोग सीमित किया जा रहा है।

एनेरॉयड स्फिग्नोमैनोमीटर (Aneroid Sphygmomanometer)

इसमें पारे के स्थान पर धात्विक झिल्ली और डायल (सूचक चक्र) का उपयोग किया जाता है। यह हल्का, पोर्टेबल और उपयोग में आसान होता है किंतु समय-समय पर कैलिब्रेशन (अंशांकन) आवश्यक होता है।

डिजिटल स्फिग्नोमैनोमीटर (Digital Blood Pressure Monitor)

यह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक यंत्र है जो स्वचालित रूप से रक्त दाब मापकर स्क्रीन पर प्रदर्शित करता है। घरेलू उपयोग में यह अत्यंत लोकप्रिय है। हालांकि इसकी सटीकता रोगी की स्थिति और यंत्र की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

स्फिग्नोमैनोमीटर के मुख्य भाग

एक पारंपरिक (पारा या एनेरॉयड) स्फिग्नोमैनोमीटर के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
  • कफ (Cuff): रबर का बना पट्टा जो बाँह के चारों ओर लपेटा जाता है।
  • रबर बल्ब (Inflation Bulb): कफ में हवा भरने के लिए।
  • वायु निकास वाल्व (Valve): कफ से हवा धीरे-धीरे निकालने के लिए।
  • मापक यंत्र (Manometer/Dial): जिसमें रक्त दाब का मान प्रदर्शित होता है।
  • स्टेथोस्कोप (Stethoscope): धमनियों में रक्त प्रवाह की ध्वनियाँ सुनने के लिए (विशेषकर पारंपरिक विधि में)।

रक्त दाब मापन की विधि (ऑस्कल्टेटरी विधि)

स्फिग्नोमैनोमीटर से रक्त दाब मापने की सबसे प्रचलित विधि ऑस्कल्टेटरी विधि है। इसमें निम्न चरण शामिल हैं:
  • रोगी को शांत अवस्था में बैठाया या लिटाया जाता है।
  • कफ को ऊपरी बाँह पर हृदय की ऊँचाई के बराबर बाँधा जाता है।
  • रबर बल्ब की सहायता से कफ में हवा भरी जाती है जिससे धमनी दब जाती है।
  • स्टेथोस्कोप को ब्रैकियल धमनी (Brachial artery) पर रखा जाता है।
  • धीरे-धीरे हवा निकाली जाती है।
  • पहली स्पष्ट ध्वनि (कोरोत्कॉफ ध्वनि) सुनाई देने पर सिस्टोलिक दाब दर्ज किया जाता है।
  • ध्वनि के पूर्णतः समाप्त होने पर डायस्टोलिक दाब नोट किया जाता है।

कोरोत्कॉफ ध्वनियाँ

रक्त दाब मापन के दौरान सुनाई देने वाली विशेष ध्वनियों को कोरोत्कॉफ ध्वनियाँ कहा जाता है। ये ध्वनियाँ रक्त के पुनः प्रवाह शुरू होने और रुकने के कारण उत्पन्न होती हैं और सिस्टोलिक व डायस्टोलिक दाब निर्धारण में सहायक होती हैं।

डिजिटल स्फिग्नोमैनोमीटर द्वारा मापन

डिजिटल यंत्रों में ऑस्सिलोमेट्रिक विधि का प्रयोग होता है। इसमें धमनी की दीवारों में उत्पन्न कंपन (Oscillations) को सेंसर द्वारा मापा जाता है और माइक्रोप्रोसेसर के माध्यम से रक्त दाब की गणना की जाती है। इसमें स्टेथोस्कोप की आवश्यकता नहीं होती।

स्फिग्नोमैनोमीटर का चिकित्सकीय महत्व

  • उच्च रक्तचाप की पहचान और निगरानी
  • हृदय एवं रक्तवाहिनी रोगों का पूर्वानुमान
  • गर्भावस्था में प्रीक्लेम्पसिया की जाँच
  • शल्य क्रिया से पूर्व एवं पश्चात् रोगी की निगरानी
  • आपातकालीन चिकित्सा में त्वरित निर्णय

रक्त दाब मापन में सावधानियाँ

  • मापन से पूर्व रोगी को कम से कम 5 मिनट आराम देना चाहिए।
  • कफ का आकार बाँह के अनुसार उचित होना चाहिए।
  • मापन के समय बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  • धूम्रपान, कैफीन या व्यायाम के तुरंत बाद मापन से बचना चाहिए।
  • एक से अधिक बार मापन कर औसत मान लेना अधिक विश्वसनीय होता है।

स्फिग्नोमैनोमीटर की सीमाएँ

यद्यपि यह यंत्र अत्यंत उपयोगी है फिर भी कुछ सीमाएँ हैं:
  • गलत कफ आकार से त्रुटि
  • डिजिटल यंत्रों में बैटरी या सेंसर त्रुटि
  • एनेरॉयड यंत्रों में अंशांकन की आवश्यकता
  • अनुभवहीन व्यक्ति द्वारा मापन में गलती

आधुनिक चिकित्सा में स्फिग्नोमैनोमीटर की भूमिका

आज के युग में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। उच्च रक्तचाप “साइलेंट किलर” के रूप में जाना जाता है क्योंकि इसके लक्षण प्रारंभ में स्पष्ट नहीं होते। ऐसे में स्फिग्नोमैनोमीटर नियमित स्वास्थ्य जांच का एक अनिवार्य उपकरण बन गया है। अस्पतालों, क्लीनिकों, एम्बुलेंस सेवाओं से लेकर घरों तक इसका व्यापक उपयोग हो रहा है।

Post a Comment