सामान्य व्यक्ति का अनुशीलक (Diastolic) रक्त दाब कितना होता है?

Sanjay Yadav
सामान्य व्यक्ति का अनुशीलक (Diastolic) रक्त दाब 80 मिमी पारे के बराबर होता है। मानव शरीर एक अत्यंत जटिल जैविक प्रणाली है जिसमें रक्त परिसंचरण (Blood Circulation) जीवन की निरंतरता के लिए अनिवार्य है। रक्त परिसंचरण का प्रमुख कार्य ऑक्सीजन, पोषक तत्वों, हार्मोनों तथा अपशिष्ट पदार्थों का शरीर के विभिन्न अंगों तक परिवहन करना है। इस परिसंचरण को सुचारु बनाए रखने में रक्त दाब (Blood Pressure) की केंद्रीय भूमिका होती है। सामान्यतः रक्त दाब को दो मानों में व्यक्त किया जाता है। ऊर्ध्वसिस्टोलिक (Systolic) तथा अनुशीलक या डायस्टोलिक (Diastolic) रक्त दाब। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में अनुशीलक (Diastolic) रक्त दाब लगभग 80 मिमी पारे (mmHg) माना जाता है।

सामान्य व्यक्ति का अनुशीलक (Diastolic) रक्त दाब 80 मिमी पारे के बराबर होता है।

रक्त दाब की मूल अवधारणा

रक्त दाब वह दबाव है जो प्रवाहित होता हुआ रक्त रक्त-वाहिकाओं (विशेषतः धमनियों) की दीवारों पर डालता है। हृदय जब संकुचित होता है तो रक्त को धमनियों में पंप करता है और जब वह शिथिल अवस्था में होता है तब भी धमनियों में एक न्यूनतम दबाव बना रहता है। इसी आधार पर रक्त दाब के दो घटक माने जाते हैं:
  • सिस्टोलिक रक्त दाब – हृदय के संकुचन के समय का अधिकतम दबाव।
  • डायस्टोलिक (अनुशीलक) रक्त दाब – हृदय के शिथिल होने के समय का न्यूनतम दबाव।

अनुशीलक (Diastolic) रक्त दाब का अर्थ

“डायस्टोल” शब्द ग्रीक भाषा के Diastole से लिया गया है जिसका अर्थ है “फैलाव” या “शिथिलता”। हृदय चक्र (Cardiac Cycle) में डायस्टोल वह अवस्था है जब हृदय की मांसपेशियाँ शिथिल होती हैं और हृदय पुनः रक्त से भरता है। इस अवस्था में धमनियों में जो न्यूनतम दबाव बना रहता है वही अनुशीलक रक्त दाब कहलाता है। सामान्यतः यह दबाव 80 मिमी पारे के आसपास होता है जिसे स्वस्थ वयस्कों के लिए आदर्श माना जाता है।

मिमी पारा (mmHg) की इकाई का महत्व

रक्त दाब को मापने के लिए परंपरागत रूप से मिलीमीटर ऑफ मरकरी (mmHg) का प्रयोग किया जाता है।
  • पारा एक घना तरल है,
  • दबाव मापन में इसकी ऊँचाई में परिवर्तन स्पष्ट और विश्वसनीय होता है।
इसी कारण स्फिग्मोमैनोमीटर जैसे उपकरणों में पारे का स्तंभ उपयोग किया जाता रहा है।

सामान्य मान: 80 मिमी पारा क्यों?

सामान्य वयस्क में 80 मिमी पारे का अनुशीलक रक्त दाब इसलिए आदर्श माना जाता है क्योंकि:
  • यह धमनियों में पर्याप्त टोन (Tonus) बनाए रखता है।
  • अंगों तक निरंतर रक्त प्रवाह सुनिश्चित करता है।
  • हृदय पर अनावश्यक दबाव नहीं डालता।
  • गुर्दे, मस्तिष्क और हृदय जैसे संवेदनशील अंगों को क्षति से बचाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों के अनुसार भी 120/80 mmHg (सिस्टोलिक/डायस्टोलिक) को सामान्य रक्त दाब माना गया है।

हृदय चक्र और डायस्टोलिक दबाव

हृदय चक्र को दो प्रमुख चरणों में बाँटा जाता है:
  • सिस्टोल – निलय संकुचन और रक्त का बहिर्वाह।
  • डायस्टोल – निलय शिथिलता और रक्त का भराव।
डायस्टोल के दौरान:
  • महाधमनी और अन्य धमनियाँ संकुचित नहीं होतीं लेकिन उनकी लोच (Elasticity) के कारण रक्त प्रवाह बना रहता है। इसी लोच के कारण डायस्टोलिक दबाव बना रहता है।

धमनियों की लोच और अनुशीलक दबाव

धमनियों की दीवारें लचीली होती हैं। जब हृदय सिस्टोल में रक्त पंप करता है तब ये दीवारें फैलती हैं और ऊर्जा संचित करती हैं। डायस्टोल में यही संचित ऊर्जा धमनियों को सिकुड़ने में सहायता करती है जिससे रक्त प्रवाह जारी रहता है। यदि धमनियों की लोच कम हो जाए (जैसे वृद्धावस्था या एथेरोस्क्लेरोसिस में) तो डायस्टोलिक दबाव प्रभावित हो सकता है।

अनुशीलक रक्त दाब को नियंत्रित करने वाले कारक

हृदय की क्रियाशीलता
  • हृदय जितना प्रभावी ढंग से रक्त को पंप करता है उतना ही संतुलित दबाव बना रहता है।
रक्त-वाहिकाओं का प्रतिरोध
  • छोटी धमनियाँ (आर्टिरिओल्स) रक्त प्रवाह में प्रतिरोध उत्पन्न करती हैं। अधिक प्रतिरोध से डायस्टोलिक दबाव बढ़ सकता है।
रक्त की मात्रा
  • शरीर में रक्त की मात्रा अधिक होने पर दबाव भी बढ़ सकता है।
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र
  • सिम्पैथेटिक और पैरासिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र धमनियों के संकुचन–विस्फारण को नियंत्रित करते हैं।

आयु और अनुशीलक रक्त दाब

  • बाल्यावस्था: डायस्टोलिक दबाव अपेक्षाकृत कम।
  • युवावस्था: लगभग 80 mmHg आदर्श।
  • वृद्धावस्था: धमनियों की कठोरता के कारण कभी-कभी परिवर्तन।
हालाँकि हल्के उतार-चढ़ाव सामान्य हैं परंतु लंबे समय तक असामान्यता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है।

कम अनुशीलक रक्त दाब (Hypotension)

यदि डायस्टोलिक रक्त दाब 60 mmHg से कम हो जाए तो इसे निम्न रक्त दाब माना जाता है।
लक्षण:
  • चक्कर आना
  • कमजोरी
  • धुंधला दिखना
  • बेहोशी
कारण:
  • निर्जलीकरण
  • अत्यधिक रक्तस्राव
  • हार्मोनल असंतुलन

अधिक अनुशीलक रक्त दाब (Hypertension)

यदि डायस्टोलिक रक्त दाब लगातार 90 mmHg या उससे अधिक रहे तो इसे उच्च रक्त दाब माना जाता है।
जोखिम:
  • हृदय रोग
  • स्ट्रोक
  • गुर्दा क्षति
  • दृष्टि समस्याएँ

अनुशीलक रक्त दाब और अंगों का स्वास्थ्य

डायस्टोलिक दबाव विशेष रूप से:
  • हृदय की कोरोनरी धमनियों,
  • मस्तिष्क,
  • गुर्दों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इन अंगों को निरंतर रक्त आपूर्ति की आवश्यकता होती है।

रक्त दाब मापन की विधियाँ

रक्त दाब मापने के लिए सामान्यतः स्फिग्मोमैनोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
प्रक्रिया में:
  • कफ को भुजा पर बाँधा जाता है,
  • हवा भरकर धमनी को अस्थायी रूप से दबाया जाता है,
  • फिर हवा निकालते समय स्टेथोस्कोप से ध्वनियाँ सुनी जाती हैं।
  • ध्वनि समाप्त होने का बिंदु डायस्टोलिक दबाव दर्शाता है।

जीवनशैली और 80 mmHg का संतुलन

सामान्य अनुशीलक रक्त दाब बनाए रखने के लिए:
  • संतुलित आहार
  • नमक का सीमित सेवन
  • नियमित व्यायाम
  • तनाव प्रबंधन
  • पर्याप्त नींद अत्यंत आवश्यक हैं।

आहार का प्रभाव

फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज और कम वसा युक्त आहार धमनियों को स्वस्थ रखते हैं जिससे डायस्टोलिक दबाव संतुलित रहता है।

तनाव और मानसिक स्वास्थ्य

दीर्घकालिक तनाव सिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर देता है जिससे रक्त-वाहिकाएँ संकुचित होती हैं और डायस्टोलिक दबाव बढ़ सकता है।

व्यायाम का योगदान

नियमित व्यायाम:
  • धमनियों की लोच बढ़ाता है,
  • हृदय की क्षमता सुधारता है,
  • डायस्टोलिक दबाव को सामान्य रखने में सहायक होता है।

आधुनिक जीवनशैली की चुनौतियाँ

तेज-तर्रार जीवन, असंतुलित भोजन, शारीरिक निष्क्रियता और डिजिटल तनाव के कारण आज उच्च रक्त दाब की समस्या बढ़ रही है जिसमें डायस्टोलिक दबाव की भूमिका प्रमुख है।

सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

उच्च या निम्न डायस्टोलिक रक्त दाब केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्या है। समय पर जाँच और जागरूकता से इससे होने वाली जटिलताओं को रोका जा सकता है।

नियमित जाँच का महत्व

नियमित रक्त दाब मापन से:
  • प्रारंभिक अवस्था में ही असामान्यता का पता चलता है,
  • जीवनशैली में समय रहते सुधार किया जा सकता है।

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