दो समान्तर दर्पणों के बीच वस्तु रखने पर क्या होता है
जब दो समतल दर्पण एक-दूसरे के बिल्कुल समान्तर रखे जाते हैं और उनके बीच कोई वस्तु रखी जाती है तब वस्तु से निकलने वाली प्रकाश किरणें दोनों दर्पणों पर बार-बार परावर्तित होती रहती हैं।
- वस्तु → दर्पण A → दर्पण B → दर्पण A → दर्पण B …
यह क्रम सैद्धान्तिक रूप से अनन्त तक चलता है। प्रत्येक परावर्तन के बाद एक नया प्रतिबिंब बनता है। इसी कारण हमें अनन्त प्रतिबिंब दिखाई देते हैं।
प्रतिबिंबों का क्रम और नामकरण
सुविधा के लिए प्रतिबिंबों को क्रम में समझते हैं:
- पहला प्रतिबिंब (I₁): वस्तु से निकलकर सीधे किसी एक दर्पण में बनने वाला प्रतिबिंब
- दूसरा प्रतिबिंब (I₂): पहले दर्पण से परावर्तित किरणें जब दूसरे दर्पण में परावर्तित होकर प्रतिबिंब बनाती हैं
- तीसरा प्रतिबिंब (I₃) और आगे: इसी प्रकार क्रमशः अधिक परावर्तन के बाद बनने वाले प्रतिबिंब
इनमें से प्रत्येक अगला प्रतिबिंब पिछले की तुलना में अधिक दूरी पर और कम तीव्रता का होता है।
चमक (Brightness) का भौतिक अर्थ
किसी प्रतिबिंब की चमक वास्तव में उस तक पहुँचने वाली प्रकाश ऊर्जा या प्रकाश तीव्रता पर निर्भर करती है। मुख्य बिंदु:
- प्रत्येक परावर्तन पर दर्पण प्रकाश का 100% परावर्तन नहीं करता।
- कुछ प्रकाश ऊर्जा अवशोषित (Absorb) हो जाती है।
- इसलिए हर परावर्तन के बाद प्रकाश की तीव्रता घटती जाती है।
यदि किसी दर्पण की परावर्तक क्षमता (Reflectivity) ( r ) हो (जहाँ ( r < 1 )) तो
- पहले परावर्तन के बाद तीव्रता = ( rI )
- दूसरे परावर्तन के बाद = ( r^2 I )
- तीसरे परावर्तन के बाद = ( r^3 I )
यही कारण है कि जितने अधिक परावर्तन उतनी कम चमक।
पहला प्रतिबिंब बनाम दूसरा प्रतिबिंब
अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं सबसे अधिक चमकीला प्रतिबिंब दूसरा ही क्यों होता है?
पहला प्रतिबिंब
- पहला प्रतिबिंब वस्तु से निकलने वाली किरणों के केवल एक परावर्तन से बनता है।
- इसकी चमक अच्छी होती है परंतु यह केवल एक दर्पण से प्राप्त होता है।
दूसरा प्रतिबिंब
- दूसरा प्रतिबिंब दो दर्पणों के बीच दो परावर्तन से बनता है लेकिन यहाँ एक विशेष स्थिति बनती है:
- दूसरे प्रतिबिंब तक पहुँचने वाली किरणें दोनों दर्पणों की उच्च परावर्तक सतहों से होकर आती हैं।
- यह प्रतिबिंब अक्सर दृष्टि रेखा (Line of Sight) के अधिक अनुकूल होता है।
व्यवहार में पाया गया है कि दूसरा प्रतिबिंब पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और अधिक चमकीला प्रतीत होता है।
चमक के तुलनात्मक कारण
दूसरे प्रतिबिंब के अधिक चमकीले होने के प्रमुख कारण:
उत्तम ज्यामितीय संरेखण
- दूसरा प्रतिबिंब सामान्यतः आँख की सीधी रेखा में पड़ता है।
कम दूरी पर प्रभावी परावर्तन
- पहले प्रतिबिंब की तुलना में दूसरा प्रतिबिंब कभी-कभी कम प्रभावी दूरी पर प्रतीत होता है।
मानव नेत्र की संवेदनशीलता
- मानव आँख मध्यवर्ती प्रतिबिंबों को अधिक स्पष्टता से ग्रहण करती है।
प्रकाश का वितरण
- दूसरे प्रतिबिंब तक पहुँचने वाला प्रकाश अपेक्षाकृत अधिक संगठित (Organized) होता है।
तीसरे और आगे के प्रतिबिंब क्यों धुंधले होते हैं?
जैसे-जैसे प्रतिबिंबों का क्रम बढ़ता है:
- परावर्तन की संख्या बढ़ती है
- प्रत्येक परावर्तन पर ऊर्जा ह्रास होता है
- दूरी बढ़ने से तीव्रता और घटती है
इसलिए तीसरा, चौथा, पाँचवाँ… प्रतिबिंब क्रमशः धुंधले और छोटे दिखाई देते हैं।
गणितीय दृष्टि से विश्लेषण
यदि दर्पण की परावर्तक क्षमता ( r = 0.9 ) मान ली जाए:
- पहला प्रतिबिंब ≈ ( 0.9I )
- दूसरा प्रतिबिंब ≈ ( 0.9^2 I = 0.81I )
- तीसरा प्रतिबिंब ≈ ( 0.9^3 I = 0.729I )
यद्यपि गणितीय रूप से पहला अधिक तीव्र लगता है लेकिन दृश्य अनुभव (Visual Perception) में दूसरा प्रतिबिंब अधिक चमकीला प्रतीत होता है क्योंकि उसकी स्थिति और प्रकाश वितरण अधिक अनुकूल होता है।
प्रयोग द्वारा सत्यापन
विद्यालय स्तर पर सरल प्रयोग:
- दो समतल दर्पण समान्तर रखें।
- बीच में मोमबत्ती या छोटी वस्तु रखें।
- क्रमशः प्रतिबिंबों की चमक का अवलोकन करें।
स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि दूसरा प्रतिबिंब सबसे चमकीला है।
