भवभूति द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक उत्तररामचरितम् संस्कृत साहित्य की अमर कृतियों में गिना जाता है। यह नाटक रामकथा के उत्तरकांड पर आधारित है और उसमें करुण रस, त्याग, कर्तव्य और मानवीय संवेदनाओं की गहन अभिव्यक्ति मिलती है।
भवभूति : जीवन और व्यक्तित्व
भवभूति का जन्म लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी में माना जाता है। उनका जन्मस्थान विदर्भ प्रदेश (वर्तमान महाराष्ट्र क्षेत्र) बताया जाता है। भवभूति का वास्तविक नाम श्रीकंठ माना जाता है जबकि ‘भवभूति’ उनका साहित्यिक नाम था। वे एक विद्वान ब्राह्मण परिवार से संबंधित थे और उन्होंने वेद, उपनिषद, मीमांसा, व्याकरण तथा काव्यशास्त्र का गहन अध्ययन किया था।
भवभूति कन्नौज के राजा यशोवर्मन के आश्रित कवि थे। राजाश्रय के कारण उन्हें अपने साहित्यिक प्रतिभा के विकास का अवसर मिला। भवभूति का व्यक्तित्व गंभीर, दार्शनिक और भावुक था। वे जीवन को केवल सौंदर्य की दृष्टि से नहीं बल्कि नैतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी देखते थे। यही कारण है कि उनके नाटकों में करुणा, त्याग और आंतरिक पीड़ा का विशेष स्थान है।
भवभूति का साहित्यिक योगदान
भवभूति को संस्कृत नाटक परंपरा में करुण रस का सम्राट कहा जाता है। उनके प्रमुख नाटक हैं:
- मालती माधव
- महावीरचरितम्
- उत्तररामचरितम्
इन तीनों नाटकों में भवभूति की भावात्मक गहराई, चरित्र-चित्रण की सजीवता और संस्कृत भाषा पर उनकी अद्भुत पकड़ स्पष्ट दिखाई देती है। जहाँ महावीरचरितम् राम के वीर रूप को प्रस्तुत करता है वहीं उत्तररामचरितम् राम के जीवन के उस पक्ष को उजागर करता है जहाँ त्याग, पीड़ा और करुणा प्रमुख हैं।
उत्तररामचरितम् : नाम और विषयवस्तु
‘उत्तररामचरितम्’ का शाब्दिक अर्थ है राम के उत्तरकालीन जीवन का चरित्र। यह नाटक रामायण के उत्तरकांड पर आधारित है। इसमें राम के राज्याभिषेक के बाद का जीवन, सीता का वनवास, लव-कुश का जन्म, सीता-त्याग और अंततः राम-सीता का भावनात्मक पुनर्मिलन चित्रित किया गया है।
यह नाटक कुल सात अंकों (अंकों/अध्यों) में विभक्त है। प्रत्येक अंक मानवीय संवेदना, दार्शनिक चिंतन और करुण रस से परिपूर्ण है।
उत्तररामचरितम् की कथावस्तु (संक्षिप्त अंकवार विवेचन)
प्रथम अंक
- राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में सुख-शांति है परंतु जनता के बीच सीता की शुद्धता को लेकर संदेह उत्पन्न होता है। राम, जो आदर्श राजा हैं, लोकमत के दबाव में मानसिक द्वंद्व से गुजरते हैं।
द्वितीय अंक
- राम और सीता के बीच भावनात्मक संवाद होता है। राम सीता के प्रति अपने प्रेम और कर्तव्य के बीच फंसे हुए दिखाई देते हैं। यह अंक करुण रस की भूमिका तैयार करता है।
तृतीय अंक
- सीता को वनवास भेज दिया जाता है। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक है। राम का अंतर्मन टूट चुका है किंतु वे राजा के कर्तव्य को प्राथमिकता देते हैं।
चतुर्थ अंक
- वाल्मीकि आश्रम में सीता का निवास, लव-कुश का जन्म और उनका पालन-पोषण दिखाया गया है। यहाँ मातृत्व और त्याग का अद्भुत चित्रण है।
पंचम अंक
- लव-कुश का अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोकना और राम के पुत्रों के रूप में उनका परिचय। यह अंक वीर और करुण रस का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।
षष्ठ अंक
- राम को सीता की निष्कलंकता का ज्ञान होता है। आत्मग्लानि और पश्चाताप का भाव गहराता है।
सप्तम अंक
- राम और सीता का भावनात्मक मिलन होता है। यद्यपि यह मिलन स्थायी नहीं है परंतु करुण रस की पराकाष्ठा इसी अंक में देखने को मिलती है।
उत्तररामचरितम् में रस-निरूपण
भवभूति का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है करुण रस। उत्तररामचरितम् को करुण रस का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है। राम का आंतरिक संघर्ष, सीता का वनवास, माता-पुत्र का विरह, और अंततः आत्मिक पीड़ा इन सभी के माध्यम से भवभूति ने करुण रस को शिखर तक पहुँचाया है। हालाँकि वीर, शृंगार और शांत रस के भी अंश मिलते हैं परंतु प्रधान रस करुण ही है।
चरित्र-चित्रण
राम
- भवभूति के राम केवल वीर योद्धा नहीं बल्कि संवेदनशील मनुष्य हैं। वे प्रेम, कर्तव्य और लोकमर्यादा के बीच संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं।
सीता
- सीता का चरित्र त्याग, सहनशीलता और करुणा का प्रतीक है। भवभूति की सीता मौन पीड़ा की प्रतिमूर्ति है।
लव-कुश
- लव-कुश के माध्यम से भवभूति ने बाल-साहस, वीरता और पितृ-गौरव का सुंदर चित्रण किया है।
भाषा और शैली
भवभूति की भाषा गंभीर, संस्कृतनिष्ठ और भावप्रधान है। उनके संवादों में अलंकार, उपमा, रूपक और भावपूर्ण शब्दावली का प्रयोग मिलता है। कालिदास की भाषा जहाँ कोमल और सौंदर्यप्रधान है वहीं भवभूति की भाषा गहन, गंभीर और भावुक है।
दार्शनिक और नैतिक दृष्टि
उत्तररामचरितम् केवल एक नाटक नहीं बल्कि जीवन-दर्शन है। इसमें राजा और व्यक्ति के कर्तव्य, समाज और व्यक्तिगत सुख के द्वंद्व, तथा त्याग की महत्ता को दर्शाया गया है। भवभूति यह स्पष्ट करते हैं कि आदर्श जीवन में सुख से अधिक कर्तव्य और नैतिकता का महत्व होता है।
साहित्यिक महत्व
- संस्कृत नाटक परंपरा में करुण रस का सर्वोत्तम उदाहरण
- रामकथा का मानवीय और संवेदनशील प्रस्तुतीकरण
- चरित्र-चित्रण में मनोवैज्ञानिक गहराई
- भाषा और भाव का अद्भुत संतुलन
आलोचनात्मक दृष्टि
कुछ आलोचक मानते हैं कि उत्तररामचरितम् अत्यधिक करुणात्मक है और उसमें नाटकीय गति धीमी हो जाती है। परंतु यही इसकी विशेषता भी है क्योंकि भवभूति का उद्देश्य मनोरंजन से अधिक भाव-जागरण है।
