इस महान वंश की स्थापना जिस शासक ने की वह था विजयालय चोल। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, चोलवंश का संस्थापक विजयालय था जिसने 9वीं शताब्दी ईस्वी में चोल शक्ति की नींव रखी और एक ऐसे साम्राज्य की आधारशिला डाली जिसने आने वाले सदियों तक भारत और दक्षिण–पूर्व एशिया को प्रभावित किया।
चोलवंश का परिचय
चोलवंश दक्षिण भारत का एक प्राचीन राजवंश था जिसका उल्लेख हमें संगम साहित्य, अभिलेखों और विदेशी यात्रियों के विवरणों में मिलता है। यह वंश मुख्यतः तमिलनाडु क्षेत्र में केंद्रित था और समय के साथ इसने केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा समुद्र पार के क्षेत्रों तक अपना प्रभाव फैलाया।
चोलों की पहचान:
- शक्तिशाली केंद्रीय प्रशासन
- सुदृढ़ नौसेना
- भव्य मंदिर स्थापत्य
- कुशल राजस्व व्यवस्था
इन सभी विशेषताओं की नींव विजयालय चोल के काल में ही पड़ चुकी थी।
विजयालय चोल से पूर्व की राजनीतिक स्थिति
8वीं–9वीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत की राजनीति अस्थिर थी। उस समय:
- पल्लव
- पांड्य
- राष्ट्रकूट जैसे शक्तिशाली राजवंश आपस में संघर्षरत थे।
चोल उस समय एक गौण शक्ति के रूप में विद्यमान थे और पल्लवों के अधीन सामंत की स्थिति में थे। इसी राजनीतिक अस्थिरता और शक्तियों के संघर्ष का लाभ उठाकर विजयालय ने चोल शक्ति के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।
विजयालय चोल: परिचय और पृष्ठभूमि
विजयालय चोल चोल वंश का वह शासक था जिसने बिखरी हुई चोल शक्ति को संगठित किया। उसके विषय में जानकारी हमें:
- ताम्रपत्र अभिलेख
- मंदिर अभिलेख
- स्थानीय परंपराओं से प्राप्त होती है।
विजयालय मूलतः एक सामंत था परंतु उसमें:
- राजनीतिक सूझबूझ
- सैन्य कौशल
- संगठन क्षमता का अद्भुत मेल था।
तंजावुर पर विजय और चोल राज्य की स्थापना
विजयालय की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी तंजावुर (तंजोर) पर अधिकार। उस समय तंजावुर पल्लवों के अधीन था। विजयालय ने पल्लवों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर इस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। यही घटना चोलवंश की वास्तविक स्थापना मानी जाती है।
- राजधानी: तंजावुर
- शासनकाल: लगभग 850 ईस्वी
इस विजय के साथ ही विजयालय ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित किया।
धार्मिक नीति और मंदिर निर्माण
विजयालय चोल शैव धर्म का अनुयायी था। उसने तंजावुर में निशुम्भसूदनी (दुर्गा) मंदिर का निर्माण कराया जो उसकी धार्मिक आस्था और स्थापत्य रुचि का प्रतीक है।
उसकी धार्मिक नीति की विशेषताएँ:
- धार्मिक सहिष्णुता
- मंदिरों को संरक्षण
- ब्राह्मणों और विद्वानों को दान
मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे बल्कि:
- शिक्षा
- अर्थव्यवस्था
- प्रशासन के भी केंद्र थे।
प्रशासनिक व्यवस्था की नींव
यद्यपि विजयालय का शासन क्षेत्र सीमित था फिर भी उसने:
- स्थानीय प्रशासन
- भूमि व्यवस्था
- कर संग्रह की एक ठोस नींव रखी।
उसने ग्राम सभाओं और स्थानीय निकायों को महत्व दिया जो आगे चलकर चोल प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता बने।
सैन्य संगठन और विस्तार नीति
विजयालय की सेना:
- पैदल सेना
- अश्वारोही सेना पर आधारित थी।
उसने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने पड़ोसी शासकों को परास्त किया और चोल सत्ता को मजबूत किया। यद्यपि उसके समय में साम्राज्य बहुत विस्तृत नहीं था लेकिन उसने विस्तार की वह चिंगारी जलाई जिसे उसके उत्तराधिकारियों ने विशाल अग्नि में बदल दिया।
विजयालय का उत्तराधिकार और चोल शक्ति का विस्तार
विजयालय के बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम चोल सिंहासन पर बैठा। आदित्य प्रथम ने:
- पल्लवों को निर्णायक रूप से पराजित किया
- चोल राज्य का विस्तार किया
इस प्रकार विजयालय द्वारा स्थापित नींव पर चोल साम्राज्य का भव्य भवन खड़ा हुआ।
चोल साम्राज्य का उत्कर्ष: विजयालय की विरासत
विजयालय के उत्तराधिकारी:
- परांतक प्रथम
- राजराज चोल प्रथम
- राजेंद्र चोल प्रथम ने चोल साम्राज्य को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
विशेषकर राजराज चोल प्रथम के समय में निर्मित बृहदेश्वर मंदिर चोल स्थापत्य की पराकाष्ठा है जिसकी जड़ें विजयालय की धार्मिक और सांस्कृतिक नीतियों में निहित थीं।
कला और संस्कृति में योगदान की नींव
यद्यपि विजयालय का काल प्रारंभिक था फिर भी:
- मंदिर निर्माण
- मूर्तिकला
- धार्मिक अनुष्ठान के संरक्षण से उसने चोल कला परंपरा की शुरुआत की।
आगे चलकर चोल कांस्य मूर्तियाँ विश्वप्रसिद्ध हुईं।
ऐतिहासिक महत्व
विजयालय चोल का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि:
- उसने एक सुप्त वंश को पुनर्जीवित किया
- राजनीतिक अस्थिरता में अवसर खोजा
- एक दीर्घकालिक साम्राज्य की नींव रखी
यदि विजयालय न होता तो संभवतः चोल साम्राज्य का वह स्वर्णिम युग कभी अस्तित्व में ही न आता।
विजयालय चोल का व्यक्तित्व मूल्यांकन
विजयालय:
- दूरदर्शी
- साहसी
- संगठनकर्ता था।
उसने सीमित संसाधनों में भी दीर्घकालिक सोच के साथ कार्य किया।
