भरतनाट्यम को मूल रूप से किस नाम से जाना जाता था?

Sanjay Yadav
भरतनाट्यम को मूल रूप से सादिर अट्टम के नाम से जाना जाता था। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा अत्यंत समृद्ध, बहुरंगी और गहन दार्शनिक आधार पर टिकी हुई है। इन्हीं शास्त्रीय नृत्य रूपों में भरतनाट्यम का विशेष स्थान है। आज भरतनाट्यम विश्वभर में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुका है परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि इस नृत्य शैली को मूल रूप से सादिर अट्टम (Sadir Attam) के नाम से जाना जाता था। समय के साथ सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण इसका नाम, स्वरूप और प्रस्तुति शैली विकसित होती गई और अंततः यह “भरतनाट्यम” के नाम से प्रतिष्ठित हुआ।

भरतनाट्यम को मूल रूप से सादिर अट्टम के नाम से जाना जाता था।

सादिर अट्टम: उद्गम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्राचीन परंपरा से संबंध
  • भरतनाट्यम की जड़ें प्राचीन भारतीय ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मिलती हैं जिसे भरतमुनि द्वारा रचित माना जाता है। इस ग्रंथ में नृत्य, संगीत और अभिनय के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन है। सादिर अट्टम भी इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित मंदिर-नृत्य परंपरा का एक जीवंत रूप था।
  • दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के मंदिरों में यह नृत्य देवदासी परंपरा से जुड़ा हुआ था। देवदासियाँ मंदिरों में देवताओं की सेवा के लिए समर्पित महिलाएँ होती थीं जो नृत्य और संगीत के माध्यम से पूजा-अर्चना करती थीं।
‘सादिर’ शब्द का अर्थ
  • ‘सादिर’ शब्द तमिल भाषा से आया है जिसका अर्थ है ‘प्रस्तुति’ या ‘अभिनय’। ‘अट्टम’ का अर्थ है ‘नृत्य’। इस प्रकार सादिर अट्टम का शाब्दिक अर्थ हुआ अभिनय-प्रधान नृत्य प्रस्तुति।

मंदिर परंपरा और देवदासी व्यवस्था

सादिर अट्टम मुख्यतः मंदिरों में प्रस्तुत किया जाता था। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं था बल्कि धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग था। देवदासियाँ भगवान के समक्ष नृत्य प्रस्तुत करती थीं विशेष रूप से शिव के नटराज रूप की आराधना में। चोल, पांड्य और विजयनगर साम्राज्य के काल में मंदिरों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। इस दौरान सादिर अट्टम को भी संरक्षण मिला और यह कला अत्यंत विकसित हुई।

चोल काल और नटराज की उपासना

चोल राजाओं के शासनकाल में शिव के नटराज रूप की पूजा अत्यंत लोकप्रिय हुई। तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर और चिदंबरम का नटराज मंदिर इस परंपरा के केंद्र थे। नटराज की प्रतिमा में शिव को सृष्टि, स्थिति और संहार के प्रतीकात्मक नृत्य करते हुए दर्शाया गया है। सादिर अट्टम इसी दिव्य नृत्य की मानवीय अभिव्यक्ति था।

औपनिवेशिक काल और पतन

सामाजिक आलोचना

19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान देवदासी प्रथा को सामाजिक दृष्टि से संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। मिशनरियों और सुधारकों ने इसे अनैतिक करार दिया। परिणामस्वरूप सादिर अट्टम की प्रतिष्ठा गिरने लगी।

एंटी-नौच आंदोलन

ब्रिटिश काल में ‘एंटी-नौच’ आंदोलन चला जिसका उद्देश्य मंदिर-नृत्य परंपरा को समाप्त करना था। इससे सादिर अट्टम लगभग विलुप्ति की कगार पर पहुँच गया।

एंटी-नौच आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में उभरा एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन था जिसका गहरा प्रभाव दक्षिण भारत की मंदिर-नृत्य परंपराओं, विशेष रूप से सादिर अट्टम (जिसे बाद में भरतनाट्यम कहा गया) पर पड़ा। ‘नौच’ शब्द अंग्रेज़ी में भारतीय नृत्य-प्रदर्शन के लिए प्रयुक्त होता था जो मूलतः ‘नाच’ से बना है। ब्रिटिश औपनिवेशिक समाज में इस शब्द का प्रयोग प्रायः देवदासी परंपरा से जुड़े नृत्य के लिए किया जाता था। एंटी-नौच आंदोलन का उद्देश्य इस परंपरा को समाप्त करना था क्योंकि इसे अनैतिक, अशोभनीय और सामाजिक पतन का कारण बताया गया।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए उस समय के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ को देखना आवश्यक है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हो चुका था। पश्चिमी शिक्षा, ईसाई मिशनरियों की सक्रियता और विक्टोरियन नैतिक मूल्यों का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। ईसाई मिशनरियों ने देवदासी प्रथा को सामाजिक बुराई के रूप में प्रस्तुत किया और इसे धार्मिक अंधविश्वास तथा नैतिक पतन से जोड़ा। उनके लेखों और भाषणों में मंदिर-नृत्य को वेश्यावृत्ति के समान बताया गया। इससे शिक्षित भारतीय मध्यमवर्ग पर भी प्रभाव पड़ा और अनेक सामाजिक सुधारकों ने इस परंपरा की आलोचना प्रारंभ कर दी।

देवदासी परंपरा का मूल उद्देश्य मंदिरों में देवताओं की सेवा करना था। देवदासियाँ संगीत और नृत्य में निपुण होती थीं तथा वे धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग थीं। दक्षिण भारत के चोल, पांड्य और विजयनगर काल में इन्हें राजकीय संरक्षण प्राप्त था। परंतु समय के साथ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों और संरक्षण की कमी के कारण इस परंपरा में विकृतियाँ भी आईं। कुछ स्थानों पर देवदासियों की स्थिति कमजोर हुई और उनका जीवन शोषण का शिकार बनने लगा। इसी पृष्ठभूमि में एंटी-नौच आंदोलन को नैतिक समर्थन मिला।

ब्रिटिश समाज में विक्टोरियन नैतिकता अत्यंत कठोर थी। सार्वजनिक नृत्य और स्त्री-प्रदर्शन को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने भारतीय मंदिर-नृत्य को देखा, तो उन्होंने इसे अपनी नैतिक कसौटी पर परखा और अस्वीकार्य पाया। अनेक अंग्रेज़ लेखकों और प्रशासकों ने इस परंपरा की आलोचना की और इसे समाप्त करने की आवश्यकता बताई। धीरे-धीरे यह दृष्टिकोण भारतीय शिक्षित वर्ग में भी फैल गया। सामाजिक सुधार के नाम पर देवदासी प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाए गए।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मद्रास प्रेसीडेंसी में देवदासी प्रथा को समाप्त करने की मांग तेज़ हो गई। समाचारपत्रों, सभाओं और सामाजिक संगठनों के माध्यम से यह प्रचारित किया गया कि मंदिर-नृत्य भारतीय समाज के नैतिक उत्थान में बाधक है। कई भारतीय सुधारकों ने भी इसे सामाजिक सुधार का आवश्यक कदम माना। परिणामस्वरूप देवदासियों के मंदिरों में नृत्य करने पर रोक लगाने के प्रयास शुरू हुए। धीरे-धीरे सरकारी स्तर पर भी इस दिशा में कदम उठाए गए।

एंटी-नौच आंदोलन का प्रभाव केवल देवदासी प्रथा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे शास्त्रीय नृत्य की परंपरा भी प्रभावित हुई। सादिर अट्टम, जो मंदिरों और राजदरबारों में प्रस्तुत किया जाता था, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा गिर गई। शिक्षित समाज ने इसे अपनाने से परहेज़ किया। कई कलाकारों को अपनी कला त्यागनी पड़ी या गुप्त रूप से अभ्यास करना पड़ा। इससे नृत्य की परंपरा लगभग विलुप्ति की कगार पर पहुँच गई।

हालाँकि एंटी-नौच आंदोलन के पीछे सामाजिक सुधार की भावना भी थी, परंतु इसमें औपनिवेशिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह स्पष्ट दिखाई देते हैं। भारतीय नृत्य परंपरा को उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भ से अलग करके केवल नैतिक दृष्टि से आँका गया। इससे कला के मूल स्वरूप को क्षति पहुँची। कई विद्वानों का मत है कि यदि यह आंदोलन न होता, तो सादिर अट्टम की परंपरा बिना बाधा के विकसित होती रहती। वहीं कुछ अन्य इतिहासकार मानते हैं कि इस आंदोलन ने अंततः नृत्य को नए रूप में पुनर्संगठित होने का अवसर भी दिया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जब राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ, तब भारतीय संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया भी शुरू हुई। इसी समय कुछ विद्वानों और कलाकारों ने यह महसूस किया कि मंदिर-नृत्य को पूर्णतः समाप्त करना उचित नहीं है। उन्होंने इसे शुद्ध, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कला के रूप में पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। इस पुनरुद्धार में अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों ने भूमिका निभाई। उदाहरणस्वरूप, रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने इस नृत्य को नए सामाजिक सम्मान के साथ मंच पर प्रस्तुत किया। इसी प्रकार ई कृष्ण अय्यर ने भी सादिर की रक्षा और पुनर्जीवन के लिए अभियान चलाया। उन्होंने तर्क दिया कि यह कला भारतीय सांस्कृतिक धरोहर है और इसे नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।

एंटी-नौच आंदोलन के परिणामस्वरूप देवदासी प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगाए गए। मद्रास देवदासी (निषेध) अधिनियम जैसे कानूनों ने मंदिरों में देवदासियों की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया। इससे एक सामाजिक व्यवस्था का अंत हुआ, परंतु इसके साथ ही एक प्राचीन कला परंपरा भी संकट में पड़ गई। बाद में जब इस नृत्य को ‘भरतनाट्यम’ नाम दिया गया और इसे मंदिरों से निकालकर सार्वजनिक मंच पर लाया गया, तब यह नए स्वरूप में पुनर्जीवित हुआ। इस प्रक्रिया में नृत्य की प्रस्तुति शैली, वेशभूषा और विषय-वस्तु में भी परिवर्तन किए गए ताकि यह आधुनिक समाज के लिए स्वीकार्य बन सके।

एंटी-नौच आंदोलन को एक जटिल ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा जाना चाहिए। यह केवल नैतिक सुधार का प्रयास नहीं था, बल्कि इसमें औपनिवेशिक सत्ता, सांस्कृतिक संघर्ष और भारतीय समाज के आत्म-संघर्ष के तत्व भी शामिल थे। एक ओर इसने देवदासी प्रथा की सामाजिक समस्याओं को उजागर किया, तो दूसरी ओर इसने कला और परंपरा के संरक्षण के प्रश्न को भी जन्म दिया। यह आंदोलन भारतीय समाज के उस संक्रमणकाल का प्रतीक है, जब परंपरा और आधुनिकता के बीच तीव्र टकराव हो रहा था।

आज जब भरतनाट्यम विश्वभर में सम्मानित शास्त्रीय नृत्य के रूप में प्रतिष्ठित है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि इसके इतिहास में एंटी-नौच आंदोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आंदोलन ने न केवल एक सामाजिक व्यवस्था को समाप्त किया, बल्कि कला के स्वरूप को भी परिवर्तित किया। इससे उत्पन्न चुनौतियों ने अंततः नृत्य को नए आयाम दिए और उसे व्यापक सामाजिक स्वीकृति दिलाई। इस प्रकार एंटी-नौच आंदोलन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने परंपरा, नैतिकता और कला के संबंधों पर गहन विचार-विमर्श को जन्म दिया और भारतीय समाज को आत्ममंथन का अवसर प्रदान किया।

पुनरुद्धार आंदोलन और नाम परिवर्तन

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कुछ कला-प्रेमियों और विद्वानों ने इस नृत्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।

रुक्मिणी देवी अरुंडेल
  • उन्होंने इस नृत्य को सामाजिक सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1936 में उन्होंने ‘कलाक्षेत्र’ की स्थापना की जहाँ इस नृत्य को व्यवस्थित रूप से सिखाया गया।
बालासरस्वती
  • उन्होंने पारंपरिक शैली को संरक्षित रखा और सादिर की अभिव्यक्ति-प्रधान परंपरा को जीवित रखा।
नाम परिवर्तन
  • सादिर अट्टम का नाम बदलकर “भरतनाट्यम” रखा गया। ‘भरत’ शब्द को ‘भाव, राग और ताल’ का संक्षिप्त रूप भी माना जाता है।

भरतनाट्यम की संरचना

भरतनाट्यम की प्रस्तुति क्रमबद्ध होती है:
  • अलारिप्पु
  • जतीस्वरम
  • शबदम
  • वर्णम
  • पदम
  • तिल्लाना
इन सभी चरणों में नृत्य, संगीत और अभिनय का संतुलित संयोजन होता है।

तकनीकी पक्ष

मुद्राएँ
  • हस्तमुद्राएँ कथ्य को अभिव्यक्त करती हैं।
अरा मंडी
  • यह विशिष्ट अर्ध-बैठी हुई मुद्रा भरतनाट्यम की पहचान है।
अभिनय
  • अभिनय चार प्रकार का होता है जैसे आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक।

संगीत और वेशभूषा

भरतनाट्यम में कर्नाटक संगीत का प्रयोग होता है। वेशभूषा में विशेष प्लीटेड साड़ी, आभूषण और घुंघरू शामिल होते हैं।

सामाजिक पुनर्स्थापन

नाम परिवर्तन के बाद भरतनाट्यम को उच्च वर्गीय समाज में स्वीकृति मिली। इसे मंचीय कला के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। धीरे-धीरे यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुआ।

वैश्विक पहचान

आज भरतनाट्यम विश्वभर में सिखाया और प्रस्तुत किया जाता है। भारतीय प्रवासी समुदाय ने इसे विदेशों में लोकप्रिय बनाया है।

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