प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य ज्ञान (GK) की दृष्टि से “विश्व इतिहास के प्रमुख युद्ध कब और किसके बीच हुए” एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। लगभग सभी प्रमुख परीक्षाओं जैसे UPSC, State PCS, SSC, Banking, Railway, NDA, CDS, CTET तथा विभिन्न राज्य स्तरीय परीक्षाओं में इतिहास से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं जिनमें युद्धों की तिथि, पक्षकार देश, कारण और परिणाम प्रमुख रूप से शामिल होते हैं। इसलिए इन युद्धों का कालक्रम (Chronology) और संबंधित राष्ट्रों की जानकारी अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
इन युद्धों का ज्ञान केवल तथ्यों तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह विश्व मानचित्र (World Map) की समझ को भी सुदृढ़ करता है। जब विद्यार्थी यह जानते हैं कि 1962 का भारत–चीन युद्ध हिमालयी सीमा पर हुआ या 1991 का खाड़ी युद्ध इराक और कुवैत के संदर्भ में था तो वे भौगोलिक स्थिति को भी बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। कई परीक्षाओं में मानचित्र आधारित प्रश्न भी पूछे जाते हैं जिनमें युद्ध-स्थल या संबंधित क्षेत्र की पहचान करनी होती है।
युद्धों की तिथियाँ और पक्षकार देशों की जानकारी समसामयिक घटनाओं को समझने में भी सहायक होती है। प्रतियोगी परीक्षाएँ अक्सर इतिहास और समसामयिक घटनाओं के बीच संबंध स्थापित करने वाले प्रश्न पूछती हैं।
GK की दृष्टि से प्रमुख युद्धों का अध्ययन स्मरण शक्ति और विश्लेषण क्षमता दोनों को बढ़ाता है। जब अभ्यर्थी यह क्रमबद्ध रूप से याद रखते हैं कि कौन-सा युद्ध किस वर्ष हुआ और उसके क्या परिणाम निकले, तो वे वस्तुनिष्ठ (Objective) प्रश्नों के साथ-साथ वर्णनात्मक (Descriptive) उत्तर भी बेहतर ढंग से लिख पाते हैं। विशेष रूप से मुख्य परीक्षा (Mains) या साक्षात्कार (Interview) में युद्धों के कारण और प्रभाव पर विश्लेषणात्मक उत्तर अपेक्षित होते हैं।
मैराथन का युद्ध
मैराथन का युद्ध प्राचीन विश्व के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी जिसने यूनान और फारस के बीच चल रहे संघर्ष को निर्णायक मोड़ दिया। यह युद्ध 490 ईसा पूर्व में यूनानियों और फारसियों के बीच मैराथन के मैदान में लड़ा गया था। इस युद्ध का महत्व केवल एक सैन्य विजय तक सीमित नहीं था बल्कि इसने पश्चिमी सभ्यता, लोकतंत्र और यूनानी आत्मगौरव की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय फारस एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य था जिसके सम्राट डेरियस प्रथम थे। डेरियस अत्यंत पराक्रमी, संगठित और महत्वाकांक्षी शासक था। उसका साम्राज्य पश्चिम में इजियन सागर से लेकर पूर्व में सिंधु नदी तक, उत्तर में सिथियन के मैदानों से लेकर दक्षिण में मिस्र की नील नदी तक फैला हुआ था। इतना विस्तृत साम्राज्य उस युग में किसी भी शासक की असाधारण शक्ति और प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण था।
फारसी साम्राज्य की विस्तारवादी नीति के कारण यूनानी नगर-राज्यों के साथ उसका संघर्ष अनिवार्य हो गया था। एशिया माइनर के आयोनियन नगर-राज्यों ने फारसी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया था जिसमें एथेंस और एरेट्रिया ने उनका समर्थन किया। इस सहायता से क्रोधित होकर डेरियस ने यूनान को दंडित करने का निश्चय किया। उसका उद्देश्य केवल बदला लेना ही नहीं था, बल्कि यूनान को अपने विशाल साम्राज्य का अंग बनाना भी था। उसने पहले एक दूत भेजकर यूनानी नगर-राज्यों से “मिट्टी और पानी” की मांग की जो फारसी अधीनता का प्रतीक था। कई राज्यों ने इसे स्वीकार कर लिया परंतु एथेंस और स्पार्टा ने इसका विरोध किया।
490 ईसा पूर्व में डेरियस ने विशाल सेना के साथ यूनान पर आक्रमण किया। फारसी सेना समुद्र मार्ग से यूनान के पूर्वी तट पर स्थित मैराथन के मैदान में उतरी। यह स्थान रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां से एथेंस तक पहुंचना अपेक्षाकृत सरल था। यूनानी सेना का नेतृत्व एथेंस के सेनानायक मिल्तियाड्स कर रहे थे। यूनानी सेना संख्या में फारसी सेना से कम थी परंतु उनका उत्साह, संगठन और युद्धनीति अत्यंत प्रभावी थी। उन्होंने भारी हथियारों से सुसज्जित होप्लाइट पैदल सैनिकों की सघन पंक्तियों का गठन किया जो फारसी हल्के पैदल सैनिकों पर भारी पड़े।
मैराथन के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच भीषण संघर्ष हुआ। यूनानियों ने अपनी रणनीति से फारसी सेना के मध्य भाग को कमजोर कर किनारों से घेर लिया। इस घेराबंदी के कारण फारसी सेना में भगदड़ मच गई और उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ी। कहा जाता है कि इस युद्ध में हजारों फारसी सैनिक मारे गए जबकि यूनानियों की हानि अपेक्षाकृत कम थी। अंततः फारसी सेना को पीछे हटना पड़ा और डेरियस की यूनान विजय की पहली योजना असफल हो गई।
इस युद्ध का परिणाम अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुआ। मैराथन की विजय ने यूनानियों के आत्मविश्वास को बढ़ाया और यह सिद्ध कर दिया कि विशाल फारसी साम्राज्य को भी पराजित किया जा सकता है। इससे एथेंस की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और आगे चलकर यूनानी सभ्यता के स्वर्ण युग का मार्ग प्रशस्त हुआ। लोकतांत्रिक व्यवस्था, कला, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति यूनान में हुई, उसमें इस विजय का महत्वपूर्ण योगदान था। यदि फारस इस युद्ध में विजयी होता, तो संभवतः यूनानी स्वतंत्रता और लोकतंत्र का विकास बाधित हो जाता।
मैराथन के युद्ध से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि यूनानी सैनिक फीडिप्पिडीज युद्ध के बाद मैराथन से एथेंस तक लगभग 42 किलोमीटर दौड़कर विजय का समाचार देने गया और “हम जीत गए” कहने के बाद गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। इसी घटना की स्मृति में आधुनिक ओलंपिक खेलों में मैराथन दौड़ की शुरुआत हुई जिसकी दूरी लगभग 42.195 किलोमीटर निर्धारित की गई।
हेस्टिंग्स का युद्ध
हेस्टिंग्स का युद्ध इंग्लैंड के इतिहास की एक निर्णायक घटना थी जिसने न केवल शासन परिवर्तन किया बल्कि अंग्रेजी समाज, संस्कृति और भाषा पर भी गहरा प्रभाव डाला। यह युद्ध 14 अक्टूबर 1066 को इंग्लैंड में लड़ा गया था और इसे इतिहास में Battle of Hastings के नाम से जाना जाता है। यह संघर्ष नारमैंडी के ड्यूक William the Conqueror और इंग्लैंड के एंग्लो-सैक्सन राजा Harold Godwinson के बीच हुआ था। इस युद्ध ने इंग्लैंड की नॉर्मन विजय की शुरुआत की और देश की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि जनवरी 1066 में इंग्लैंड के निःसंतान राजा Edward the Confessor की मृत्यु से जुड़ी थी। एडवर्ड की कोई संतान नहीं थी जिससे उनके उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। सिंहासन पर कई दावेदारों ने अपना अधिकार जताया। एडवर्ड की मृत्यु के तुरंत बाद इंग्लैंड के शक्तिशाली कुलीन हेरोल्ड गोडविंसन को राजा घोषित कर दिया गया और उनका राज्याभिषेक कर दिया गया। किंतु नारमैंडी के ड्यूक विलियम का दावा था कि एडवर्ड ने उन्हें पहले ही इंग्लैंड का उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। विलियम का यह भी कहना था कि हेरोल्ड ने पूर्व में उनसे वादा किया था कि वह उनके दावे का समर्थन करेंगे।
स्थिति और जटिल तब हो गई जब हेरोल्ड को एक साथ कई आक्रमणों का सामना करना पड़ा। उनके अपने भाई टॉस्टिग ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया और उसने नॉर्वे के राजा Harald Hardrada के साथ मिलकर इंग्लैंड पर आक्रमण कर दिया। सितंबर 1066 में स्टैमफोर्ड ब्रिज के युद्ध में हेरोल्ड ने नॉर्वेजियन सेना को पराजित कर दिया और हाराल्ड हार्डडा मारा गया। हालांकि इस विजय से हेरोल्ड की सेना थक चुकी थी और उन्हें तुरंत दक्षिण की ओर बढ़ना पड़ा क्योंकि उसी समय विलियम अपनी नॉर्मन सेना के साथ इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर उतर चुके थे।
14 अक्टूबर 1066 को हेस्टिंग्स के निकट दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। हेरोल्ड की सेना मुख्यतः पैदल सैनिकों से बनी थी जिन्होंने ढालों की दीवार बनाकर मजबूत रक्षा पंक्ति तैयार की। दूसरी ओर विलियम की सेना में घुड़सवार सैनिक और प्रशिक्षित धनुर्धर शामिल थे। युद्ध कई घंटों तक चला और अत्यंत रक्तरंजित रहा। प्रारंभ में एंग्लो-सैक्सन सेना ने मजबूती से मोर्चा संभाला, किंतु नॉर्मन सेना की रणनीति और घुड़सवारों के आक्रमण ने धीरे-धीरे संतुलन बदल दिया। परंपरागत विवरण के अनुसार, युद्ध के दौरान हेरोल्ड की आंख में तीर लगने से उनकी मृत्यु हो गई जिसके बाद उनकी सेना का मनोबल टूट गया।
इस युद्ध में विलियम की विजय हुई और उन्होंने इंग्लैंड पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्हें “विलियम द कॉन्करर” के नाम से जाना जाने लगा। 25 दिसंबर 1066 को उनका राज्याभिषेक इंग्लैंड के राजा के रूप में किया गया। इस विजय के परिणामस्वरूप इंग्लैंड में नॉर्मन शासन की स्थापना हुई। नॉर्मन शासकों ने प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए, किलों का निर्माण कराया और सामंती व्यवस्था को मजबूत किया। 1086 में तैयार किया गया “डूम्सडे बुक” इंग्लैंड की भूमि और संपत्ति का विस्तृत सर्वेक्षण था जो विलियम के शासन की प्रशासनिक दक्षता को दर्शाता है।
हेस्टिंग्स के युद्ध का प्रभाव केवल राजनीतिक नहीं था बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई भी था। नॉर्मन शासकों के आने से अंग्रेजी भाषा पर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ा, जिससे आगे चलकर मध्य अंग्रेजी का विकास हुआ। समाज के उच्च वर्ग में फ्रेंच भाषा का उपयोग होने लगा जबकि सामान्य जनता पुरानी अंग्रेजी बोलती रही। इस प्रकार इंग्लैंड की सांस्कृतिक पहचान में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण है कि हेस्टिंग्स का युद्ध 14 अक्टूबर 1066 को हुआ था। यह नारमैंडी के ड्यूक विलियम और इंग्लैंड के राजा हेरोल्ड द्वितीय के बीच लड़ा गया था और इसका परिणाम इंग्लैंड में नॉर्मन शासन की स्थापना के रूप में सामने आया। यह युद्ध इंग्लैंड के इतिहास में एक युगांतकारी घटना सिद्ध हुआ जिसने देश की राजनीतिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विकास की दिशा को सदियों तक प्रभावित किया।
शतवर्षीय युद्ध
शतवर्षीय युद्ध मध्यकालीन यूरोप का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लंबा सैन्य संघर्ष था जो मुख्य रूप से इंग्लैंड और फ्रांस के बीच लड़ा गया। यद्यपि इसका नाम “शतवर्षीय” है लेकिन वास्तव में यह संघर्ष 1337 से 1453 तक लगभग 116 वर्षों तक चला। इतिहासकारों ने यूरोपीय संघर्षों में इतने लंबे समय तक चले इस सैन्य टकराव को एक विशिष्ट ऐतिहासिक कालखंड के रूप में स्वीकार किया और इसे Hundred Years' War नाम दिया। इस युद्ध का मूल कारण फ्रांसीसी सिंहासन पर अधिकार को लेकर विवाद था जिसमें इंग्लैंड के शासकों ने भी अपना दावा प्रस्तुत किया था।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि फ्रांस के राजा चार्ल्स चतुर्थ की 1328 में बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु से जुड़ी थी। फ्रांस में उत्तराधिकार के प्रश्न पर वलॉइस वंश के फिलिप षष्ठ को राजा घोषित किया गया किंतु इंग्लैंड के राजा एडवर्ड तृतीय ने अपनी माता के माध्यम से फ्रांसीसी सिंहासन पर दावा किया। यह राजनीतिक और वंशगत विवाद धीरे-धीरे पूर्ण युद्ध में बदल गया। इंग्लैंड और फ्रांस के बीच पहले से ही गैस्कोनी क्षेत्र को लेकर तनाव था जो फ्रांस में स्थित होने के बावजूद अंग्रेजी नियंत्रण में था। इस प्रकार राजनीतिक, आर्थिक और सामंती कारणों ने मिलकर इस दीर्घकालीन संघर्ष को जन्म दिया।
युद्ध को सामान्यतः तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है। पहला चरण एडवर्डियन युद्ध (1337–1360) कहलाता है, जिसमें इंग्लैंड के राजा एडवर्ड तृतीय ने प्रारंभिक सफलताएँ प्राप्त कीं। 1346 में क्रेसी के युद्ध में अंग्रेजों ने अपनी प्रसिद्ध लंबी धनुष (लॉन्गबो) की सहायता से फ्रांसीसी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। इसके बाद 1356 में पोइटियर्स के युद्ध में फ्रांस के राजा जॉन द्वितीय को बंदी बना लिया गया। इन विजयों के परिणामस्वरूप 1360 में ब्रेटिनी की संधि हुई जिसके तहत इंग्लैंड को फ्रांस में विस्तृत क्षेत्र प्राप्त हुए।
दूसरा चरण कैरोलीन युद्ध (1369–1389) के नाम से जाना जाता है। इस अवधि में फ्रांस ने पुनर्गठन किया और धीरे-धीरे खोए हुए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करना शुरू किया। फ्रांस के नेतृत्व में सुधार हुआ और अंग्रेजों की स्थिति कमजोर पड़ने लगी। इस चरण में युद्ध अनियमित और छिटपुट रूप से चलता रहा किंतु कोई निर्णायक परिणाम सामने नहीं आया।
तीसरा चरण लैंकास्ट्रियन युद्ध (1415–1453) कहलाता है। इस चरण की शुरुआत इंग्लैंड के राजा हेनरी पंचम के आक्रमण से हुई। 1415 में एजिनकोर्ट के युद्ध में अंग्रेजों ने फिर से फ्रांसीसी सेना को पराजित किया। इस विजय के बाद 1420 की ट्रॉयस संधि के अंतर्गत हेनरी पंचम को फ्रांस का उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया। ऐसा प्रतीत होने लगा कि इंग्लैंड फ्रांसीसी सिंहासन पर अधिकार कर लेगा। किंतु परिस्थितियाँ शीघ्र ही बदल गईं।
इस अंतिम चरण में फ्रांस की ओर से एक नई प्रेरणादायक शक्ति उभरी जिसका नाम था Joan of Arc। उन्होंने फ्रांसीसी सेना का मनोबल बढ़ाया और 1429 में ऑरलीयॉं की घेराबंदी को समाप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि बाद में उन्हें पकड़कर मृत्युदंड दिया गया परंतु उनकी प्रेरणा से फ्रांसीसी राष्ट्रवाद सुदृढ़ हुआ। धीरे-धीरे फ्रांसीसी सेना ने अंग्रेजों को पीछे धकेल दिया और 1453 में कास्टिलॉन के युद्ध के साथ संघर्ष का अंत हुआ। इस अंतिम विजय के साथ फ्रांस में House of Valois ने अपना सिंहासन सुरक्षित रखा जबकि इंग्लैंड को फ्रांस में केवल कैलै जैसे कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमटना पड़ा।
शतवर्षीय युद्ध के परिणाम अत्यंत व्यापक थे। फ्रांस में राष्ट्रीय चेतना और केंद्रीकृत राजसत्ता का विकास हुआ। इंग्लैंड में भी राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी जिसने आगे चलकर “वार ऑफ द रोजेज” जैसे गृहयुद्धों को जन्म दिया। सैन्य दृष्टि से भी यह युद्ध महत्वपूर्ण था क्योंकि इस दौरान पारंपरिक सामंती सेना की बजाय पेशेवर सैनिकों और नई तकनीकों का उपयोग बढ़ा। लंबी धनुष, तोपखाने और संगठित पैदल सेना की भूमिका ने युद्ध की प्रकृति को बदल दिया।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह जानना आवश्यक है कि शतवर्षीय युद्ध 1337 से 1453 के बीच इंग्लैंड और फ्रांस के मध्य लड़ा गया था। इसे तीन चरणों एडवर्डियन, कैरोलीन और लैंकास्ट्रियन में विभाजित किया जाता है और अंततः फ्रांस के वलॉइस वंश ने अपना सिंहासन सुरक्षित रखा। यह युद्ध यूरोपीय इतिहास के सबसे लंबे और प्रभावशाली संघर्षों में से एक माना जाता है जिसने मध्यकालीन यूरोप की राजनीतिक संरचना को स्थायी रूप से बदल दिया।
गुलाबों को युद्ध
गुलाबों का युद्ध 1455 से 1485 ईस्वी के बीच इंग्लैंड में लड़ा गया एक लंबा और रक्तरंजित गृहयुद्ध था जो एक ही शाही वंश प्लांटाजेनेट की दो प्रतिद्वंद्वी शाखाओं लैंकेस्टर और यॉर्क के बीच सिंहासन के अधिकार को लेकर हुआ। इतिहास में इसे Wars of the Roses के नाम से जाना जाता है। इस नाम का संबंध दोनों गुटों के प्रतीकों से है यॉर्क वंश का प्रतीक श्वेत गुलाब (व्हाइट रोज़) और लैंकेस्टर वंश का प्रतीक लाल गुलाब (रेड रोज़) था। हालांकि इन प्रतीकों का व्यापक उपयोग बाद की परंपराओं में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया किंतु उन्होंने इस संघर्ष को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की।
इस युद्ध की पृष्ठभूमि इंग्लैंड की राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर नेतृत्व से जुड़ी थी। उस समय इंग्लैंड के सिंहासन पर Henry VI of England विराजमान थे जो मानसिक रूप से अस्थिर माने जाते थे और प्रभावी शासन करने में असमर्थ थे। उनके शासनकाल में फ्रांस के साथ चल रहे शतवर्षीय युद्ध में इंग्लैंड को पराजयों का सामना करना पड़ा जिससे राजसत्ता की प्रतिष्ठा कमजोर हुई। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए यॉर्क वंश के रिचर्ड, ड्यूक ऑफ यॉर्क ने स्वयं को सिंहासन का अधिक योग्य दावेदार बताया। धीरे-धीरे यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा खुली सैन्य टकराहट में बदल गई।
1455 में सेंट एल्बंस के प्रथम युद्ध के साथ इस संघर्ष की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। आने वाले तीन दशकों में इंग्लैंड के विभिन्न भागों में अनेक युद्ध लड़े गए। प्रारंभिक चरणों में यॉर्किस्ट गुट को सफलता मिली और 1461 में एडवर्ड चतुर्थ ने स्वयं को राजा घोषित किया। किंतु सत्ता का संतुलन बार-बार बदलता रहा। लैंकेस्टर और यॉर्क दोनों गुटों ने अवसर मिलने पर सत्ता पर अधिकार किया जिससे देश में निरंतर अस्थिरता बनी रही। इस संघर्ष में कुलीन वर्ग के अनेक शक्तिशाली परिवार भी शामिल हो गए जिससे यह केवल राजवंशीय विवाद न रहकर व्यापक गृहयुद्ध का रूप ले बैठा।
इस लंबे संघर्ष का अंतिम और निर्णायक चरण 1485 में बोसवर्थ के युद्ध में सामने आया। इस युद्ध में लैंकेस्टर पक्ष का नेतृत्व हेनरी ट्यूडर ने किया, जबकि यॉर्क पक्ष की ओर से रिचर्ड तृतीय युद्धभूमि में उतरे। बोसवर्थ की लड़ाई में Henry VII of England ने रिचर्ड तृतीय को पराजित किया और उनकी मृत्यु हो गई। इस विजय के साथ ही प्लांटाजेनेट वंश का अंत हुआ और ट्यूडर वंश की स्थापना हुई। हेनरी ट्यूडर ने बाद में यॉर्क वंश की एलिज़ाबेथ से विवाह किया, जिससे दोनों प्रतिद्वंद्वी शाखाओं का प्रतीकात्मक एकीकरण हुआ। इसी एकता के प्रतीक के रूप में ट्यूडर गुलाब का निर्माण हुआ जिसमें लाल और सफेद दोनों रंग सम्मिलित थे।
“वार्स ऑफ द रोज़ेज़” नाम का व्यापक उपयोग बाद की शताब्दियों में लोकप्रिय हुआ। 19वीं शताब्दी में प्रसिद्ध साहित्यकार Walter Scott ने अपने उपन्यास “ऐन ऑफ गीयरस्टीन” में इस नाम का प्रयोग किया जिसके बाद यह पद प्रचलन में आया। यद्यपि ऐतिहासिक अभिलेखों में गुलाब के प्रतीकों का उल्लेख पहले भी मिलता है किंतु इस संघर्ष को इसी नाम से व्यापक पहचान बाद में मिली।
गुलाबों के युद्ध के परिणाम इंग्लैंड के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। इस संघर्ष ने सामंती शक्तियों को कमजोर किया और राजसत्ता को अधिक केंद्रीकृत रूप दिया। ट्यूडर वंश के शासन में इंग्लैंड में स्थिरता स्थापित हुई, जिसने आगे चलकर आधुनिक राष्ट्र-राज्य के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। साथ ही, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आंतरिक विभाजन किसी भी राष्ट्र को दीर्घकालिक अस्थिरता की ओर धकेल सकता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह जानना आवश्यक है कि गुलाबों का युद्ध 1455 से 1485 ईस्वी तक लैंकेस्टर और यॉर्क वंशों के बीच इंग्लैंड में लड़ा गया। इसका नाम दोनों पक्षों के गुलाब-प्रतीकों से जुड़ा है और इसका अंत 1485 में बोसवर्थ के युद्ध में हेनरी ट्यूडर की विजय के साथ हुआ जिससे ट्यूडर वंश की स्थापना हुई। यह संघर्ष इंग्लैंड के मध्यकालीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है जिसने देश की राजनीतिक दिशा को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
आंग्ल-स्पेन युद्ध
आंग्ल–स्पेन युद्ध 1585 से 1604 ईस्वी के बीच इंग्लैंड और स्पेन के राज्यों के मध्य चला एक दीर्घकालिक और आंतरायिक संघर्ष था। इतिहास में इसे Anglo-Spanish War के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध कभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं किया गया था किंतु दोनों शक्तियों के बीच राजनीतिक, धार्मिक और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा ने इसे व्यापक सैन्य टकराव का रूप दे दिया। उस समय स्पेन यूरोप की सबसे शक्तिशाली कैथोलिक साम्राज्यवादी शक्ति था जबकि इंग्लैंड प्रोटेस्टेंट सुधार के बाद अपनी स्वतंत्र धार्मिक और राजनीतिक पहचान स्थापित कर रहा था। इस प्रकार यह संघर्ष केवल राजनीतिक प्रभुत्व का नहीं बल्कि धार्मिक मतभेदों का भी प्रतीक था।
इस युद्ध की पृष्ठभूमि 16वीं शताब्दी के यूरोपीय परिदृश्य में निहित थी। स्पेन के सम्राट Philip II of Spain यूरोप में कैथोलिक धर्म के रक्षक माने जाते थे जबकि इंग्लैंड की रानी Elizabeth I ने प्रोटेस्टेंट धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्थापित किया। इंग्लैंड द्वारा डच विद्रोहियों को समर्थन देना स्पेन को अत्यंत अस्वीकार्य था क्योंकि स्पेनिश नीदरलैंड उसके अधीन था। 1585 में इंग्लैंड ने औपचारिक रूप से डच प्रतिरोध का समर्थन किया और रॉबर्ट डुडले, अर्ल ऑफ लीसेस्टर के नेतृत्व में सेना भेजी। यही इस संघर्ष की प्रत्यक्ष शुरुआत मानी जाती है।
1587 में अंग्रेजी नौसेना ने कादिज़ पर साहसिक आक्रमण किया जिसे “सिंगिंग द किंग ऑफ स्पेन’स बीयर्ड” कहा गया। इस अभियान में स्पेन के कई जहाज नष्ट हुए और उसकी आक्रमण योजना को क्षति पहुँची। इसके बावजूद 1588 में स्पेन ने इंग्लैंड पर आक्रमण के लिए विशाल नौसैनिक बेड़ा भेजा जिसे इतिहास में Spanish Armada कहा जाता है। इस बेड़े का उद्देश्य इंग्लैंड पर आक्रमण कर रानी एलिज़ाबेथ को हटाना था। किंतु अंग्रेजी नौसेना की रणनीति, तेज जहाजों और प्रतिकूल मौसम के कारण स्पेनिश अरमाडा को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। यह घटना इंग्लैंड की समुद्री शक्ति के उदय का प्रतीक बनी।
हालाँकि 1589 में इंग्लैंड ने प्रत्याक्रमण करते हुए तथाकथित “इंग्लिश आर्मडा” भेजी परंतु यह अभियान असफल रहा और अंग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद युद्ध विभिन्न मोर्चों नीदरलैंड, फ्रांस और आयरलैंड में जारी रहा। दोनों पक्षों ने समुद्री लूट, उपनिवेशों पर हमले और अप्रत्यक्ष युद्धनीतियों का सहारा लिया। यह संघर्ष धीरे-धीरे एक गतिरोध की स्थिति में पहुँच गया जहाँ कोई भी पक्ष निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका।
17वीं शताब्दी के आरंभ तक दोनों देशों की आर्थिक और सैन्य शक्ति पर इस लंबे संघर्ष का प्रभाव पड़ चुका था। अंततः 1604 में लंदन की संधि के माध्यम से इस युद्ध का समापन हुआ। इस संधि में इंग्लैंड के नए राजा James VI and I और स्पेन के नए राजा Philip III of Spain के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। समझौते के अनुसार इंग्लैंड ने स्पेनिश नीदरलैंड में अपने प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की और दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हुई।
आंग्ल–स्पेन युद्ध के परिणाम दूरगामी सिद्ध हुए। स्पेन की अपराजेयता की छवि को गंभीर आघात पहुँचा और इंग्लैंड एक उभरती समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित हुआ। इस संघर्ष ने यूरोप में शक्ति संतुलन को बदला और आगे चलकर इंग्लैंड के औपनिवेशिक विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। साथ ही, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक मतभेद और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ किस प्रकार लंबे समय तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को जन्म दे सकती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह जानना आवश्यक है कि यह युद्ध 1585 से 1604 ईस्वी तक इंग्लैंड और स्पेन के बीच चला, 1588 में स्पेनिश अरमाडा की पराजय इसकी प्रमुख घटना थी और इसका अंत 1604 की लंदन संधि से हुआ।
जिब्राल्टर बे का युद्ध
जिब्राल्टर बे का युद्ध 25 अप्रैल 1607 को लड़ा गया एक महत्वपूर्ण नौसैनिक संघर्ष था जो डच गणराज्य और स्पेन (तथा उसके सहयोगी पुर्तगाल) के बीच चल रहे लंबे अस्सी वर्षीय युद्ध का हिस्सा था। इतिहास में इसे Battle of Gibraltar के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध उस समय हुआ जब नीदरलैंड स्पेनिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा था। 1568 से आरंभ हुआ अस्सी वर्षीय युद्ध डचों और स्पेनिश क्राउन के बीच राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर लड़ा जा रहा था।
1607 में डच बेड़े ने जिब्राल्टर की खाड़ी में स्थित स्पेनिश नौसेना पर अचानक आक्रमण किया। यह हमला रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत साहसिक और योजनाबद्ध था। डच बेड़े का नेतृत्व अनुभवी एडमिरल जैकब वान हीम्सकर्क कर रहे थे जिन्होंने स्पेनिश जहाजों को आश्चर्यचकित कर दिया। उस समय स्पेनिश बेड़े का नेतृत्व डॉन जुआन अल्वारेज़ डे एविला कर रहे थे। स्पेनिश प्रमुख जहाज “सैन ऑगस्टिन” की कमान उनके पुत्र के हाथ में थी जबकि अन्य प्रमुख जहाजों में “नुएस्ट्रा सेन्योरा दे ला वेगा” और “माद्रे दे दियोस” शामिल थे। ये जहाज स्पेन की समुद्री शक्ति का प्रतिनिधित्व करते थे और भूमध्यसागर तथा अटलांटिक मार्गों पर प्रभुत्व बनाए रखने में महत्वपूर्ण थे।
युद्ध के दौरान डच जहाजों ने तीव्र आक्रमण कर स्पेनिश बेड़े को घेर लिया। आग्नेयास्त्रों और तोपों के प्रचंड प्रहार से स्पेनिश जहाजों को भारी क्षति पहुँची। कुछ जहाजों में आग लग गई और वे नष्ट हो गए। यह संघर्ष कुछ ही घंटों में निर्णायक सिद्ध हुआ क्योंकि स्पेनिश बेड़ा लगभग पूरी तरह पराजित हो गया। डॉन जुआन अल्वारेज़ डे एविला भी इस युद्ध में मारे गए। यद्यपि डच एडमिरल हीम्सकर्क भी युद्ध के दौरान मारे गए फिर भी उनकी रणनीति और साहस ने डचों को ऐतिहासिक विजय दिलाई।
इस विजय का प्रभाव केवल सैन्य नहीं था बल्कि राजनीतिक भी था। जिब्राल्टर बे की इस लड़ाई ने स्पेन की नौसैनिक प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचाया और डच गणराज्य की समुद्री शक्ति को सुदृढ़ किया। इस सफलता ने डचों की स्वतंत्रता की मांग को और अधिक वैधता प्रदान की। अंततः 1609 में बारह वर्षीय युद्धविराम (ट्वेल्व इयर्स ट्रूस) की स्थापना हुई जिसके अंतर्गत डच गणराज्य को स्पेन द्वारा वास्तविक मान्यता प्राप्त हुई। यह मान्यता डच स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी और आगे चलकर 1648 की वेस्टफेलिया संधि में नीदरलैंड की पूर्ण स्वतंत्रता को स्वीकार किया गया।
जिब्राल्टर की इस नौसैनिक लड़ाई ने यह सिद्ध किया कि समुद्री शक्ति यूरोपीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। डच गणराज्य ने व्यापारिक मार्गों और उपनिवेशों पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया जिससे वह 17वीं शताब्दी में एक प्रमुख समुद्री और व्यापारिक शक्ति के रूप में उभरा। दूसरी ओर, स्पेन की समुद्री श्रेष्ठता को चुनौती मिली और उसकी वैश्विक प्रभुत्व की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि जिब्राल्टर बे का युद्ध 25 अप्रैल 1607 को डचों और स्पेन (तथा पुर्तगाल) के बीच हुआ था। यह अस्सी वर्षीय युद्ध का हिस्सा था और इसके परिणामस्वरूप डच गणराज्य को स्पेन से वास्तविक मान्यता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह संघर्ष यूरोपीय इतिहास में नौसैनिक युद्धों के महत्व और स्वतंत्रता आंदोलनों की सफलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।
सप्तवर्षीय युद्ध
सप्तवर्षीय युद्ध 1756 से 1763 ईस्वी के बीच लड़ा गया एक व्यापक और वैश्विक संघर्ष था जिसे अनेक इतिहासकार आधुनिक अर्थों में प्रथम “विश्वयुद्ध” भी मानते हैं। यद्यपि इसका प्रारंभिक टकराव 1754 से ही आरंभ हो चुका था किंतु 1756 से 1763 के बीच इसकी तीव्रता सर्वाधिक रही। इस युद्ध में उस समय की प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ दो बड़े गुटों में विभाजित होकर आमने-सामने थीं। एक ओर ब्रिटेन और प्रशिया थे जबकि दूसरी ओर ऑस्ट्रिया और फ्रांस के साथ रूस, स्वीडन तथा अन्य सहयोगी शक्तियाँ शामिल थीं। इतिहास में इसे Seven Years' War के नाम से जाना जाता है।
इस युद्ध की पृष्ठभूमि यूरोप में शक्ति संतुलन और उपनिवेशों के नियंत्रण को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा में निहित थी। ऑस्ट्रिया सिलेसिया क्षेत्र को पुनः प्राप्त करना चाहता था जिसे प्रशिया ने पहले के संघर्षों में छीन लिया था। दूसरी ओर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच उत्तरी अमेरिका, भारत और अन्य उपनिवेशों में व्यापारिक व साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा तेज हो चुकी थी। 18वीं शताब्दी के मध्य में कूटनीतिक क्रांति (Diplomatic Revolution) के तहत पारंपरिक शत्रु और मित्र बदल गए। ऑस्ट्रिया ने फ्रांस से गठबंधन कर लिया जबकि ब्रिटेन ने प्रशिया का साथ दिया। इससे युद्ध का स्वरूप और व्यापक हो गया।
यूरोप में प्रशिया के राजा फ्रेडरिक द्वितीय ने ऑस्ट्रिया, रूस और फ्रांस जैसी शक्तियों का सामना किया। सिलेसिया और जर्मन प्रदेशों में अनेक निर्णायक युद्ध हुए। प्रशिया ने अपनी सैन्य दक्षता और अनुशासन के बल पर स्वयं को शक्तिशाली यूरोपीय राज्य के रूप में स्थापित किया। इसी संदर्भ में इस संघर्ष को तृतीय सिलेसियन युद्ध भी कहा जाता है क्योंकि इसका एक प्रमुख उद्देश्य सिलेसिया पर अधिकार बनाए रखना था।
उत्तरी अमेरिका में यह संघर्ष ब्रिटेन और फ्रांस के बीच उपनिवेशों के नियंत्रण को लेकर लड़ा गया जहाँ इसे French and Indian War के नाम से जाना जाता है। यहाँ ब्रिटिश उपनिवेशों और फ्रांसीसी सेनाओं के साथ उनके मूल अमेरिकी सहयोगियों के बीच युद्ध हुआ। अंततः ब्रिटेन ने कनाडा सहित अधिकांश फ्रांसीसी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इस विजय ने उत्तरी अमेरिका में ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित किया किंतु साथ ही ब्रिटेन पर भारी आर्थिक बोझ भी डाला जिसने आगे चलकर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार की।
भारत में यही संघर्ष Third Carnatic War के रूप में सामने आया जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ। इस चरण में रॉबर्ट क्लाइव और अन्य ब्रिटिश अधिकारियों ने निर्णायक सफलताएँ प्राप्त कीं। 1763 की पेरिस संधि के बाद भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और ब्रिटिश प्रभुत्व की नींव मजबूत हुई। इस प्रकार भारतीय इतिहास में सप्तवर्षीय युद्ध का विशेष महत्व है क्योंकि इसने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।
इसके अतिरिक्त स्वीडन और प्रशिया के बीच हुए संघर्ष को पोमेरानियन युद्ध कहा गया। पश्चिमी अफ्रीकी समुद्रतट, कैरेबियन द्वीपों और फिलीपींस में भी इस युद्ध के प्रभाव दिखाई दिए। समुद्री मार्गों और व्यापारिक केंद्रों पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश नौसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः 1763 में पेरिस की संधि और ह्यूबर्टसबर्ग की संधि के साथ युद्ध का समापन हुआ। इन संधियों के परिणामस्वरूप ब्रिटेन एक प्रमुख वैश्विक औपनिवेशिक शक्ति बनकर उभरा, जबकि प्रशिया ने यूरोप में अपनी स्थिति सुदृढ़ की।
सप्तवर्षीय युद्ध के परिणाम अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुए। इसने यूरोप में शक्ति संतुलन को पुनः परिभाषित किया, औपनिवेशिक साम्राज्यों की दिशा तय की और भविष्य के अनेक संघर्षों की पृष्ठभूमि तैयार की। ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति पर पड़े दबाव ने उपनिवेशों पर कर लगाने की नीति को जन्म दिया जिससे अमेरिकी क्रांति की नींव पड़ी। प्रशिया का उदय जर्मन एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस प्रकार यह युद्ध केवल सात वर्षों तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसके प्रभाव दशकों तक विश्व राजनीति और साम्राज्यवाद पर दिखाई दिए।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह जानना आवश्यक है कि सप्तवर्षीय युद्ध 1756 से 1763 के बीच ब्रिटेन एवं प्रशिया बनाम ऑस्ट्रिया एवं फ्रांस के बीच लड़ा गया, इसे विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है और इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन एक प्रमुख वैश्विक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ। यह संघर्ष 18वीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक निर्णायक अध्याय माना जाता है।
बंकर हिल का युद्ध
बंकर हिल का युद्ध अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण संघर्षों में से एक था। यह युद्ध 17 जून 1775 को बोस्टन के निकट मैसाचुसेट्स के चार्ल्सटन प्रायद्वीप में लड़ा गया। यद्यपि इसे सामान्यतः “बंकर हिल का युद्ध” कहा जाता है परंतु वास्तविक और सबसे तीव्र लड़ाई निकटवर्ती ब्रीड हिल पर हुई थी। यह संघर्ष American Revolutionary War के आरंभिक चरण में बोस्टन की घेराबंदी के दौरान हुआ। उस समय अमेरिकी उपनिवेशों और ब्रिटिश शासन के बीच तनाव चरम पर था और लेक्सिंगटन तथा कॉनकॉर्ड की घटनाओं के बाद सशस्त्र संघर्ष खुलकर सामने आ चुका था।
ब्रिटिश सेना बोस्टन शहर पर नियंत्रण बनाए रखना चाहती थी क्योंकि यह एक प्रमुख बंदरगाह था और समुद्री मार्गों से उन्हें सैनिकों तथा रसद की आपूर्ति मिलती थी। उपनिवेशवादियों को सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना ब्रीड हिल और बंकर हिल पर कब्जा करने की योजना बना रही है जिससे उन्हें सामरिक लाभ मिल सके। इन पहाड़ियों पर नियंत्रण का अर्थ था बोस्टन और उसके बंदरगाहों की निगरानी तथा रक्षा पर प्रभुत्व स्थापित करना। अमेरिकी मिलिशिया ने इस रणनीतिक महत्व को समझते हुए रातों-रात ब्रीड हिल पर किलेबंदी कर ली और अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
17 जून की सुबह ब्रिटिश सेना ने अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। ब्रिटिश सैनिक अनुशासित और प्रशिक्षित थे जबकि अमेरिकी मिलिशिया अपेक्षाकृत कम प्रशिक्षित थी। इसके बावजूद अमेरिकी सैनिकों ने दृढ़ता और साहस का परिचय दिया। उन्होंने तब तक गोलीबारी न करने का आदेश दिया जब तक कि शत्रु बहुत निकट न आ जाए जिससे उनकी सीमित गोला-बारूद का प्रभावी उपयोग हो सके। ब्रिटिश सेना ने कई बार सीधा आक्रमण किया और प्रत्येक बार उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ी। अंततः जब अमेरिकियों का बारूद समाप्त होने लगा तब ब्रिटिश सैनिकों ने ब्रीड हिल पर कब्जा कर लिया।
यद्यपि युद्ध का सामरिक परिणाम ब्रिटिश विजय के रूप में सामने आया परंतु यह विजय अत्यंत महंगी सिद्ध हुई। ब्रिटिश सेना को भारी जनहानि का सामना करना पड़ा जबकि अमेरिकी हानि अपेक्षाकृत कम थी। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि उपनिवेशवादी सेना ब्रिटिश नियमित सेना का सामना कर सकती है और उन्हें गंभीर क्षति पहुँचा सकती है। इससे अमेरिकी सैनिकों का मनोबल बढ़ा और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।
बंकर हिल का युद्ध बोस्टन की घेराबंदी के व्यापक संदर्भ में हुआ जो अंततः मार्च 1776 में समाप्त हुई जब ब्रिटिश सेना को शहर खाली करना पड़ा। इस संघर्ष ने यह सिद्ध कर दिया कि अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम केवल एक विद्रोह नहीं, बल्कि संगठित और दृढ़ संकल्प से लड़ा जा रहा युद्ध था। इस युद्ध के बाद उपनिवेशों में स्वतंत्रता की भावना और भी प्रबल हुई और 1776 में स्वतंत्रता की घोषणा का मार्ग प्रशस्त हुआ।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि बंकर हिल का युद्ध 17 जून 1775 को बोस्टन के निकट हुआ, यह अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक चरण का प्रमुख संघर्ष था और यद्यपि ब्रिटिश सेना ने अंततः पहाड़ी पर कब्जा किया, फिर भी उन्हें भारी हानि उठानी पड़ी। इस प्रकार यह युद्ध अमेरिकी क्रांतिकारी संघर्ष में एक प्रेरणादायक और निर्णायक घटना के रूप में याद किया जाता है।
सरतोगा का युद्ध
Battle of Saratoga अमेरिकी क्रांति के इतिहास में एक ऐसा निर्णायक अध्याय है जिसने न केवल युद्ध की दिशा बदली बल्कि विश्व राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डाला। यह युद्ध सितंबर और अक्टूबर 1777 में लड़ा गया जब तेरह उपनिवेशों के निवासी ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्षरत थे। यह संघर्ष American Revolutionary War के दूसरे वर्ष के दौरान हुआ और इसमें दो प्रमुख लड़ाइयाँ शामिल थीं जो लगभग अठारह दिनों के अंतराल पर लड़ी गईं। इन लड़ाइयों ने महाद्वीपीय सेना को निर्णायक विजय दिलाई और यह विजय क्रांतिकारी युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई।
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन और उसके अमेरिकी उपनिवेशों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा था। कराधान, प्रतिनिधित्व के अभाव और राजनीतिक अधिकारों के मुद्दों ने उपनिवेशों में असंतोष को जन्म दिया। 1775 में युद्ध की शुरुआत के बाद ब्रिटिश सेना ने न्यूयॉर्क और उसके आसपास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की योजना बनाई। 1777 में ब्रिटिश रणनीति का उद्देश्य न्यू इंग्लैंड को अन्य उपनिवेशों से अलग करना था क्योंकि न्यू इंग्लैंड को विद्रोह का केंद्र माना जाता था। इस योजना के अंतर्गत ब्रिटिश जनरल John Burgoyne को कनाडा से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए हडसन नदी के मार्ग से अल्बानी तक पहुँचना था जबकि अन्य ब्रिटिश सेनाओं को भी समन्वित रूप से आगे बढ़ना था। परंतु यह योजना पूर्ण समन्वय के अभाव में विफल सिद्ध हुई।
सरतोगा क्षेत्र, जो वर्तमान न्यूयॉर्क राज्य में स्थित है, सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। हडसन नदी के निकट स्थित यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग था। सितंबर 1777 में पहली मुठभेड़ फ्रीमैन फार्म के निकट हुई। महाद्वीपीय सेना का नेतृत्व जनरल Horatio Gates के हाथों में था, जबकि Benedict Arnold ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहली लड़ाई में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हुआ यद्यपि वे मैदान में डटे रहे। दूसरी निर्णायक मुठभेड़ अक्टूबर में बेमिस हाइट्स के पास हुई जिसमें अमेरिकी सेनाओं ने ब्रिटिश सेना को घेर लिया और उनकी आपूर्ति तथा सहायता के मार्गों को अवरुद्ध कर दिया।
ब्रिटिश सेना की स्थिति दिन-प्रतिदिन कमजोर होती गई। आपूर्ति की कमी, स्थानीय समर्थन का अभाव और अमेरिकी सेनाओं की दृढ़ता ने ब्रिटिश सैनिकों को निराश कर दिया। अंततः 17 अक्टूबर 1777 को जनरल बर्गॉयन ने आत्मसमर्पण कर दिया। लगभग छह हजार ब्रिटिश सैनिकों का आत्मसमर्पण एक असाधारण घटना थी जिसने विश्व को यह संकेत दिया कि अमेरिकी उपनिवेश केवल विद्रोही नहीं बल्कि संगठित और सक्षम सैन्य शक्ति भी हैं। इस आत्मसमर्पण को अक्सर “कन्वेंशन ऑफ सरतोगा” कहा जाता है जिसने ब्रिटिश प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचाया।
सरतोगा की विजय का प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। यह विजय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। फ्रांस, जो पहले से ही ब्रिटेन का प्रतिद्वंद्वी था, अमेरिकी संघर्ष के प्रति सहानुभूति रखता था, परंतु वह खुलकर समर्थन देने से हिचक रहा था। सरतोगा की सफलता ने फ्रांस को यह विश्वास दिलाया कि अमेरिकी उपनिवेश वास्तव में ब्रिटेन को चुनौती दे सकते हैं। परिणामस्वरूप 1778 में फ्रांस ने अमेरिका के साथ औपचारिक गठबंधन किया और युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लिया। फ्रांसीसी सहायता सैनिकों, नौसेना और आर्थिक संसाधनों के रूप में अमेरिकी विजय के लिए निर्णायक सिद्ध हुई।
इस युद्ध ने अमेरिकी जनता के मनोबल को भी अत्यधिक ऊँचा किया। इससे पहले कई पराजयों के कारण महाद्वीपीय सेना के सैनिकों का उत्साह कम हो गया था, परंतु सरतोगा की विजय ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि स्वतंत्रता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इस युद्ध ने नेतृत्व की क्षमता, संगठन और स्थानीय मिलिशिया की भूमिका को भी उजागर किया। स्थानीय किसानों और स्वयंसेवकों ने ब्रिटिश सेना की आपूर्ति लाइनों को बाधित किया और उन्हें जंगलों तथा दुर्गम भूभाग में उलझाए रखा।
रणनीतिक दृष्टि से सरतोगा का युद्ध यह दर्शाता है कि समन्वय और संचार की कमी किसी भी सैन्य योजना को विफल कर सकती है। ब्रिटिश सेनाओं के बीच तालमेल का अभाव उनकी पराजय का एक प्रमुख कारण था। दूसरी ओर, अमेरिकी नेतृत्व ने परिस्थितियों का लाभ उठाकर दुश्मन को अलग-थलग कर दिया। भूगोल का कुशल उपयोग, स्थानीय समर्थन और सैनिकों का मनोबल इस विजय के आधार स्तंभ थे।
इतिहासकारों के अनुसार सरतोगा की विजय के बिना अमेरिकी स्वतंत्रता की प्राप्ति संभवतः बहुत कठिन होती। इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन सुनिश्चित किया जिसने अंततः 1781 में यॉर्कटाउन की निर्णायक विजय और 1783 की पेरिस संधि का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार सरतोगा का युद्ध केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदलने वाला निर्णायक मोड़ था।
आज सरतोगा का क्षेत्र ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित है, जहाँ पर्यटक और इतिहास प्रेमी उस स्थल को देख सकते हैं जिसने आधुनिक अमेरिका के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह युद्ध इस बात का प्रतीक है कि संगठित प्रयास, दृढ़ संकल्प और रणनीतिक बुद्धिमत्ता के माध्यम से एक शक्तिशाली साम्राज्य को भी चुनौती दी जा सकती है। सरतोगा की गूँज आज भी स्वतंत्रता, साहस और आत्मनिर्णय के आदर्शों में सुनाई देती है, और यह घटना विश्व इतिहास में उन निर्णायक क्षणों में गिनी जाती है जिन्होंने राष्ट्रों की नियति को बदल दिया।
पिरामिड का युद्ध
Battle of the Pyramids अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लड़ा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध था जिसने न केवल मिस्र के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित किया बल्कि यूरोपीय सामरिक इतिहास में भी एक नई दिशा प्रदान की। यह युद्ध 21 जुलाई 1798 को मिस्र में फ्रांसीसी आक्रमण के दौरान लड़ा गया। इस संघर्ष में एक ओर फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व Napoleon Bonaparte कर रहे थे जबकि दूसरी ओर मिस्र के शासक वर्ग के रूप में स्थापित मामलुक सरदारों की सेना थी जो नाममात्र रूप से उस्मानी साम्राज्य के अधीन थी। इस युद्ध को एम्बाबा की लड़ाई के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह नील नदी के पश्चिमी तट पर एम्बाबा क्षेत्र में लड़ा गया था जहाँ से गीज़ा के पिरामिड स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे।
अठारहवीं शताब्दी के अंत तक मिस्र पर मामलुक अमीरों का प्रभावी नियंत्रण था यद्यपि औपचारिक रूप से वह उस्मानी साम्राज्य का हिस्सा था। फ्रांस और ब्रिटेन के बीच वैश्विक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में मिस्र का सामरिक महत्व अत्यधिक बढ़ गया था। फ्रांस के लिए मिस्र पर अधिकार स्थापित करना ब्रिटेन के भारत से व्यापारिक संपर्क को बाधित करने का एक साधन था। इसी उद्देश्य से नेपोलियन ने 1798 में मिस्र अभियान प्रारंभ किया। फ्रांसीसी सेना आधुनिक हथियारों, अनुशासन और संगठित प्रशिक्षण से सुसज्जित थी जबकि मामलुक सेना अपनी घुड़सवार शक्ति और व्यक्तिगत वीरता के लिए प्रसिद्ध थी।
युद्ध से कुछ दिन पहले फ्रांसीसी और मामलुक सेनाओं के बीच झड़पें हो चुकी थीं जिनमें से एक को चोब्राकिट की लड़ाई कहा जाता है। इन प्रारंभिक संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामलुक घुड़सवार सेना तीव्र आक्रमण करने में सक्षम थी परंतु आधुनिक पैदल सेना की संगठित रणनीति के सामने उन्हें कठिनाई हो सकती थी। 21 जुलाई 1798 को निर्णायक संघर्ष हुआ। नेपोलियन ने अपनी सेना को पारंपरिक पंक्ति में तैनात करने के बजाय “डिवीजनल स्क्वायर” रणनीति अपनाई। इस रणनीति के अंतर्गत सैनिकों को बड़े वर्गाकार गठन में व्यवस्थित किया गया जिनके चारों ओर संगीनों से लैस पैदल सैनिक खड़े रहते थे और अंदर तोपखाना तथा रसद सुरक्षित रखी जाती थी। यह गठन विशेष रूप से घुड़सवार आक्रमणों को रोकने के लिए प्रभावी था।
मामलुक घुड़सवार सेना ने अपनी पारंपरिक शैली में तीव्र और साहसिक आक्रमण किया। उनके योद्धा शानदार परिधानों, तेज घोड़ों और तलवारबाज़ी के कौशल के लिए विख्यात थे। परंतु फ्रांसीसी वर्गाकार संरचना और संगठित तोपखाने की मारक क्षमता के सामने उनका आक्रमण विफल हो गया। जब भी मामलुक सैनिक वर्ग के निकट आते, उन्हें चारों दिशाओं से गोलियों और तोपों की बौछार का सामना करना पड़ता। परिणामस्वरूप भारी संख्या में मामलुक सैनिक मारे गए या नील नदी में कूदकर भागने का प्रयास करते हुए डूब गए। कुछ ही घंटों में युद्ध का परिणाम स्पष्ट हो गया फ्रांसीसी सेना ने निर्णायक विजय प्राप्त की।
इस विजय के बाद काहिरा पर फ्रांसीसी नियंत्रण स्थापित हो गया। यह केवल एक सैन्य जीत नहीं थी बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। नेपोलियन ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था कि “इन पिरामिडों की चोटी से चालीस सदियों का इतिहास तुम्हें देख रहा है।” यह कथन इस युद्ध को प्रतीकात्मक महत्ता प्रदान करता है। पिरामिडों की पृष्ठभूमि में लड़ा गया यह युद्ध प्राचीन मिस्र की सभ्यता और आधुनिक यूरोपीय शक्ति के टकराव का प्रतीक बन गया।
युद्ध के परिणामस्वरूप मामलुक शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा। यद्यपि उस्मानी साम्राज्य ने बाद में फ्रांसीसियों के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रयास किया, परंतु इस लड़ाई ने मिस्र में सत्ता संतुलन को बदल दिया। फ्रांसीसी विजय ने यूरोप में नेपोलियन की प्रतिष्ठा को और बढ़ा दिया। इस अभियान के साथ वैज्ञानिकों और विद्वानों का एक बड़ा दल भी मिस्र आया, जिन्होंने वहाँ की प्राचीन सभ्यता का अध्ययन किया। इसी अभियान के दौरान रोसेटा स्टोन की खोज हुई जिसने बाद में मिस्री चित्रलिपि को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रणनीतिक दृष्टि से पिरामिडों की लड़ाई आधुनिक सैन्य इतिहास में वर्गाकार संरचना की प्रभावशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसने यह सिद्ध किया कि अनुशासन, सामूहिक रणनीति और आधुनिक हथियार पारंपरिक वीरता और व्यक्तिगत कौशल पर भारी पड़ सकते हैं। यह युद्ध यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार और मध्य-पूर्वी राजनीति के जटिल संबंधों को भी उजागर करता है।
यद्यपि फ्रांसीसी सेना ने भूमि पर विजय प्राप्त की परंतु बाद में ब्रिटिश नौसेना ने नील नदी की लड़ाई में फ्रांसीसी बेड़े को नष्ट कर दिया जिससे मिस्र में फ्रांसीसी स्थिति कमजोर हो गई। फिर भी पिरामिडों की लड़ाई इतिहास में एक निर्णायक क्षण के रूप में दर्ज है। इसने न केवल मिस्र की राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि नेपोलियन के सैन्य कौशल और रणनीतिक प्रतिभा को भी उजागर किया।
इस प्रकार पिरामिड का युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं था बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, सामरिक नवाचार और सभ्यताओं के ऐतिहासिक टकराव का प्रतीक था। 21 जुलाई 1798 की यह लड़ाई आज भी सैन्य इतिहास में उस उदाहरण के रूप में याद की जाती है जहाँ संगठित रणनीति और आधुनिक तकनीक ने परंपरागत सैन्य शक्ति को परास्त कर दिया और इतिहास की धारा को नई दिशा प्रदान की।
नील नदी का युद्ध
1798 ई. में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच लड़ा गया नील नदी का युद्ध अठारहवीं शताब्दी के प्रमुख नौसैनिक संघर्षों में से एक था। यह युद्ध फ्रांसीसी क्रांति के बाद चल रहे व्यापक यूरोपीय संघर्षों की पृष्ठभूमि में हुआ जब फ्रांस अपने प्रभाव को भूमध्यसागरीय क्षेत्र में फैलाने का प्रयास कर रहा था। फ्रांस की महत्वाकांक्षा केवल यूरोप तक सीमित नहीं थी बल्कि वह मिस्र के माध्यम से भारत तक ब्रिटिश व्यापारिक मार्गों को चुनौती देना चाहता था। इसी रणनीति के अंतर्गत जनरल Napoleon Bonaparte के नेतृत्व में एक विशाल फ्रांसीसी अभियान दल टूलॉन से रवाना होकर मिस्र की ओर बढ़ा। इस अभियान का उद्देश्य मिस्र पर अधिकार स्थापित करना और ब्रिटिश साम्राज्य की समुद्री शक्ति को कमजोर करना था।
नील की लड़ाई 1 से 3 अगस्त 1798 के बीच मिस्र के तट पर अबूकिर बे में लड़ी गई। यह स्थान नील डेल्टा के निकट भूमध्य सागर के किनारे स्थित था। फ्रांसीसी बेड़ा वाइस-एडमिरल François-Paul Brueys d'Aigalliers के नेतृत्व में लंगर डाले हुए था। फ्रांसीसी जहाजों ने तट के समीप एक रक्षात्मक पंक्ति बना ली थी ताकि ब्रिटिश बेड़े के आक्रमण से बचा जा सके। दूसरी ओर ब्रिटिश शाही नौसेना का नेतृत्व रियर-एडमिरल Horatio Nelson कर रहे थे जो पहले से ही फ्रांसीसी बेड़े की खोज में भूमध्यसागर में सक्रिय थे।
जब ब्रिटिश बेड़े को फ्रांसीसी जहाजों के ठिकाने का पता चला तो नेल्सन ने अत्यंत साहसिक और अप्रत्याशित रणनीति अपनाई। उन्होंने पारंपरिक तरीके से सीधे सामने से हमला करने के बजाय फ्रांसीसी पंक्ति के दोनों ओर से आक्रमण किया। कुछ ब्रिटिश जहाज फ्रांसीसी बेड़े और तट के बीच से होकर गुजरे जिससे फ्रांसीसी जहाज दो तरफ से घिर गए। यह रणनीति उस समय के नौसैनिक युद्धों में असाधारण मानी जाती थी। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी जहाजों पर भीषण गोलाबारी हुई और वे प्रभावी ढंग से जवाब देने में असमर्थ रहे।
इस युद्ध का सबसे नाटकीय क्षण तब आया जब फ्रांसीसी प्रमुख युद्धपोत ‘ल’ओरियॉं’ में भीषण विस्फोट हुआ। इस विस्फोट ने युद्ध का रुख पूरी तरह ब्रिटिश पक्ष में मोड़ दिया। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि उसकी गूंज दूर-दूर तक सुनी गई। फ्रांसीसी बेड़े को भारी क्षति पहुँची; उनके अधिकांश जहाज नष्ट या कब्जे में ले लिए गए। केवल कुछ ही जहाज बच निकलने में सफल हुए।
नील के युद्ध में ब्रिटिश विजय निर्णायक थी। इसने भूमध्यसागर में ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता को स्थापित कर दिया और फ्रांसीसी अभियान को गंभीर झटका पहुंचाया। यद्यपि नेपोलियन मिस्र में अपनी स्थल सेना के साथ आगे बढ़े, परंतु समुद्री सहायता के अभाव में उनका अभियान अलग-थलग पड़ गया। फ्रांस और मिस्र के बीच संपर्क लगभग टूट गया जिससे नेपोलियन की दीर्घकालिक योजनाएँ बाधित हुईं।
इस युद्ध का व्यापक प्रभाव यूरोपीय राजनीति पर भी पड़ा। ब्रिटेन की इस विजय ने अन्य यूरोपीय शक्तियों का मनोबल बढ़ाया और फ्रांस के विरुद्ध गठबंधनों को प्रोत्साहित किया। नेल्सन की प्रतिष्ठा में अत्यधिक वृद्धि हुई और वे ब्रिटेन में राष्ट्रीय नायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। नील की लड़ाई ने यह सिद्ध कर दिया कि समुद्री शक्ति किसी भी साम्राज्य की रणनीतिक सफलता में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इतिहासकारों के अनुसार, यह युद्ध केवल एक नौसैनिक संघर्ष नहीं था बल्कि साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की टकराहट का प्रतीक भी था। यदि फ्रांस इस युद्ध में विजयी होता, तो संभवतः मिस्र और आगे एशिया में उसका प्रभाव और अधिक बढ़ सकता था। परंतु ब्रिटिश विजय ने भूमध्यसागर में शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में कर लिया। इस प्रकार 1798 का नील नदी का युद्ध विश्व इतिहास की दिशा बदलने वाले निर्णायक क्षणों में गिना जाता है जिसने न केवल फ्रांसीसी अभियान को सीमित किया बल्कि ब्रिटिश नौसैनिक प्रभुत्व की नींव को भी और अधिक सुदृढ़ किया।
ट्रफ़ैलगर का युद्ध
ट्रफ़ैलगर का युद्ध 21 अक्टूबर 1805 ई. को लड़ा गया एक ऐतिहासिक समुद्री संघर्ष था जिसने यूरोप के शक्ति-संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। यह युद्ध ब्रिटिश नौसेना और फ्रांस–स्पेन की संयुक्त नौसेना के बीच अटलांटिक महासागर में स्पेन के दक्षिण-पश्चिमी तट के निकट ट्रफ़ैलगर के पास हुआ। उस समय Napoleon Bonaparte फ्रांस का सम्राट बन चुका था और उसकी महत्वाकांक्षा केवल यूरोप तक सीमित नहीं थी; वह इंग्लैंड को पराजित कर समुद्री प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। उसकी विश्व-विजय योजना में सबसे बड़ी बाधा इंग्लैंड था जिसकी नौसैनिक शक्ति अत्यंत सुदृढ़ और संगठित थी।
इंग्लैंड भी फ्रांस की बढ़ती शक्ति से चिंतित था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री William Pitt the Younger ने 1805 में फ्रांस के विरुद्ध यूरोपीय शक्तियों का एक तृतीय गुट (थर्ड कोएलिशन) संगठित किया। इस गठबंधन का उद्देश्य नेपोलियन की विस्तारवादी नीति को रोकना था। नेपोलियन ने इंग्लैंड पर आक्रमण की योजना बनाई और इसके लिए उसे अंग्रेजी नौसेना को कमजोर करना आवश्यक लगा। उसने फ्रांस और स्पेन की संयुक्त नौसेना को ब्रिटिश बेड़े से टकराने के लिए तैयार किया।
ब्रिटिश नौसेना का नेतृत्व एडमिरल Horatio Nelson कर रहे थे जो पहले ही अपनी असाधारण समुद्री रणनीतियों के लिए प्रसिद्ध हो चुके थे। फ्रांस और स्पेन की संयुक्त नौसेना का नेतृत्व एडमिरल Pierre-Charles Villeneuve के हाथों में था। संयुक्त बेड़ा संख्या में ब्रिटिश बेड़े से बड़ा था किंतु संगठन, प्रशिक्षण और रणनीति के मामले में ब्रिटिश नौसेना अधिक सक्षम सिद्ध हुई।
ट्रफ़ैलगर के युद्ध में नेल्सन ने पारंपरिक समुद्री युद्ध-नीति से हटकर एक नवीन रणनीति अपनाई। सामान्यतः उस समय युद्धपोत समानांतर पंक्तियों में खड़े होकर गोलाबारी करते थे परंतु नेल्सन ने अपने बेड़े को दो स्तंभों में विभाजित कर सीधे शत्रु पंक्ति को भेदने का निर्णय लिया। इस साहसिक कदम से संयुक्त फ्रांसीसी-स्पेनी बेड़ा अव्यवस्थित हो गया और ब्रिटिश जहाजों को निकट दूरी से भीषण प्रहार करने का अवसर मिल गया।
युद्ध अत्यंत उग्र था। ब्रिटिश जहाज ‘एचएमएस विक्ट्री’ पर सवार नेल्सन स्वयं अग्रिम पंक्ति में थे। युद्ध के दौरान उन्हें गोली लगी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। किंतु उनकी रणनीति सफल रही और संयुक्त बेड़े के अनेक जहाज या तो डूब गए या ब्रिटिशों द्वारा कब्जे में ले लिए गए। अंततः फ्रांस और स्पेन की संयुक्त नौसेना को करारी पराजय का सामना करना पड़ा।
ट्रफ़ैलगर की विजय ने ब्रिटेन को समुद्रों का निर्विवाद स्वामी बना दिया। इस युद्ध के बाद नेपोलियन की इंग्लैंड पर आक्रमण की योजना व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई। यद्यपि नेपोलियन ने यूरोप में कई स्थलीय विजय प्राप्त कीं, परंतु समुद्र पर उसका प्रभुत्व स्थापित नहीं हो सका। दूसरी ओर, नेल्सन की मृत्यु ने उन्हें ब्रिटेन का राष्ट्रीय नायक बना दिया और उनकी वीरता की गाथा इतिहास में अमर हो गई।
इस युद्ध का प्रभाव दूरगामी था। ब्रिटिश नौसैनिक शक्ति लगभग एक शताब्दी तक विश्व में सर्वोच्च बनी रही, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को अत्यधिक बल मिला। यूरोप में शक्ति-संतुलन भी प्रभावित हुआ और नेपोलियन को अपनी रणनीति मुख्यतः महाद्वीपीय युद्धों तक सीमित करनी पड़ी। ट्रफ़ैलगर का युद्ध केवल एक समुद्री संघर्ष नहीं था, बल्कि यह उस युग के साम्राज्यवादी संघर्षों का प्रतीक था, जिसने विश्व राजनीति की दिशा को दीर्घकाल तक प्रभावित किया।
नेपोलियन का युद्ध
नेपोलियन का युद्ध 1803 से 1815 ई. के बीच लड़े गए उन व्यापक संघर्षों की श्रृंखला को संदर्भित करता है जिनमें Napoleon Bonaparte (नेपोलियन प्रथम) के नेतृत्व में फ्रांसीसी साम्राज्य और उसके सहयोगी यूरोप की विभिन्न शक्तियों से भिड़े। ये युद्ध फ्रांसीसी क्रांति के बाद उत्पन्न राजनीतिक, वैचारिक और क्षेत्रीय विवादों से जन्मे थे। क्रांति ने यूरोप की पारंपरिक राजशाही व्यवस्थाओं को चुनौती दी थी और नेपोलियन के उदय के साथ फ्रांस ने स्वयं को एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, यूरोपीय राजतंत्र फ्रांस की विस्तारवादी नीति और क्रांतिकारी विचारों के प्रसार से भयभीत थे।
इन युद्धों में मुख्य विरोधी शक्ति United Kingdom थी जिसने फ्रांस के विरुद्ध गठबंधनों को वित्तीय और सामरिक सहायता प्रदान की। ब्रिटेन की नौसैनिक शक्ति अत्यंत प्रबल थी जबकि फ्रांस स्थलीय युद्धों में अपनी उत्कृष्ट सेना और नेतृत्व के कारण सफल हो रहा था। इन संघर्षों के दौरान यूरोप की शक्तियाँ समय-समय पर अलग-अलग गठबंधनों में संगठित हुईं। इन्हें प्रायः विभिन्न “गठबंधन युद्धों” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
तीसरे गठबंधन (1805) में ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया और रूस ने फ्रांस के विरुद्ध मोर्चा खोला। इसी काल में ट्राफलगर का प्रसिद्ध समुद्री युद्ध हुआ जिसमें ब्रिटेन ने समुद्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जबकि उसी वर्ष ऑस्टरलिट्ज़ के युद्ध में नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया और रूस को पराजित कर अपनी सैन्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया। चौथे गठबंधन (1806–07) में प्रशा और रूस फ्रांस के विरुद्ध आए किंतु जेना और फ्रीडलैंड की लड़ाइयों में फ्रांस को सफलता मिली। इसके परिणामस्वरूप यूरोप के बड़े हिस्से पर फ्रांसीसी प्रभाव स्थापित हो गया।
पांचवें गठबंधन (1809) में ऑस्ट्रिया ने पुनः चुनौती दी, परंतु वाग्राम के युद्ध में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इस समय तक नेपोलियन का प्रभाव चरम पर था। उसने अनेक राज्यों में अपने रिश्तेदारों या सहयोगियों को शासक नियुक्त कर दिया था और महाद्वीपीय प्रणाली के माध्यम से ब्रिटेन को आर्थिक रूप से कमजोर करने का प्रयास किया। किंतु यह नीति अंततः उलटी पड़ी, क्योंकि इससे यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी हानि हुई और असंतोष बढ़ा।
छठे गठबंधन (1813–14) के दौरान रूस, प्रशा, ऑस्ट्रिया और अन्य शक्तियाँ एकजुट हो गईं। 1812 में रूस पर नेपोलियन का अभियान उसकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुआ। कठोर सर्दी, लंबी आपूर्ति रेखाएँ और रूसी प्रतिरोध के कारण उसकी विशाल सेना नष्टप्राय हो गई। इसके बाद 1813 में लाइपज़िग के “राष्ट्रों के युद्ध” में फ्रांस को निर्णायक हार मिली। 1814 में पेरिस पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार हो गया और नेपोलियन को पदत्याग कर एल्बा द्वीप भेज दिया गया।
हालाँकि 1815 में नेपोलियन एल्बा से लौटकर पुनः सत्ता में आया, जिसे “सौ दिन” कहा जाता है। सातवें गठबंधन के अंतर्गत ब्रिटेन और उसके सहयोगियों ने अंतिम संघर्ष में उसे पराजित किया। 1815 में वाटरलू के युद्ध में उसकी निर्णायक हार हुई जिसके बाद उसे सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया जहाँ उसका शेष जीवन व्यतीत हुआ।
नेपोलियन युद्धों का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। इन संघर्षों ने यूरोप के राजनीतिक मानचित्र को बदल दिया और राष्ट्रवाद की भावना को प्रोत्साहित किया। फ्रांसीसी प्रभुत्व की एक संक्षिप्त अवधि अवश्य आई, किंतु अंततः यूरोपीय शक्तियों ने संतुलन स्थापित कर लिया। 1815 में वियना कांग्रेस के माध्यम से यूरोप में नई व्यवस्था स्थापित की गई जिसका उद्देश्य शक्ति-संतुलन बनाए रखना और भविष्य में बड़े युद्धों को रोकना था।
इस प्रकार 1803 से 1815 तक चले नेपोलियन युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं थे बल्कि वे राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक परिवर्तन के वाहक भी बने। इन युद्धों ने आधुनिक यूरोप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नई दिशा निर्धारित की।नेपोलियन का युद्ध 1803 से 1815 ई. के बीच लड़े गए उन व्यापक संघर्षों की श्रृंखला को संदर्भित करता है जिनमें Napoleon Bonaparte (नेपोलियन प्रथम) के नेतृत्व में फ्रांसीसी साम्राज्य और उसके सहयोगी यूरोप की विभिन्न शक्तियों से भिड़े। ये युद्ध फ्रांसीसी क्रांति के बाद उत्पन्न राजनीतिक, वैचारिक और क्षेत्रीय विवादों से जन्मे थे। क्रांति ने यूरोप की पारंपरिक राजशाही व्यवस्थाओं को चुनौती दी थी और नेपोलियन के उदय के साथ फ्रांस ने स्वयं को एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, यूरोपीय राजतंत्र फ्रांस की विस्तारवादी नीति और क्रांतिकारी विचारों के प्रसार से भयभीत थे।
इन युद्धों में मुख्य विरोधी शक्ति United Kingdom थी जिसने फ्रांस के विरुद्ध गठबंधनों को वित्तीय और सामरिक सहायता प्रदान की। ब्रिटेन की नौसैनिक शक्ति अत्यंत प्रबल थी जबकि फ्रांस स्थलीय युद्धों में अपनी उत्कृष्ट सेना और नेतृत्व के कारण सफल हो रहा था। इन संघर्षों के दौरान यूरोप की शक्तियाँ समय-समय पर अलग-अलग गठबंधनों में संगठित हुईं। इन्हें प्रायः विभिन्न “गठबंधन युद्धों” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
तीसरे गठबंधन (1805) में ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया और रूस ने फ्रांस के विरुद्ध मोर्चा खोला। इसी काल में ट्राफलगर का प्रसिद्ध समुद्री युद्ध हुआ जिसमें ब्रिटेन ने समुद्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जबकि उसी वर्ष ऑस्टरलिट्ज़ के युद्ध में नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया और रूस को पराजित कर अपनी सैन्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया। चौथे गठबंधन (1806–07) में प्रशा और रूस फ्रांस के विरुद्ध आए किंतु जेना और फ्रीडलैंड की लड़ाइयों में फ्रांस को सफलता मिली। इसके परिणामस्वरूप यूरोप के बड़े हिस्से पर फ्रांसीसी प्रभाव स्थापित हो गया।
पांचवें गठबंधन (1809) में ऑस्ट्रिया ने पुनः चुनौती दी, परंतु वाग्राम के युद्ध में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इस समय तक नेपोलियन का प्रभाव चरम पर था। उसने अनेक राज्यों में अपने रिश्तेदारों या सहयोगियों को शासक नियुक्त कर दिया था और महाद्वीपीय प्रणाली के माध्यम से ब्रिटेन को आर्थिक रूप से कमजोर करने का प्रयास किया। किंतु यह नीति अंततः उलटी पड़ी, क्योंकि इससे यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को भी हानि हुई और असंतोष बढ़ा।
छठे गठबंधन (1813–14) के दौरान रूस, प्रशा, ऑस्ट्रिया और अन्य शक्तियाँ एकजुट हो गईं। 1812 में रूस पर नेपोलियन का अभियान उसकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुआ। कठोर सर्दी, लंबी आपूर्ति रेखाएँ और रूसी प्रतिरोध के कारण उसकी विशाल सेना नष्टप्राय हो गई। इसके बाद 1813 में लाइपज़िग के “राष्ट्रों के युद्ध” में फ्रांस को निर्णायक हार मिली। 1814 में पेरिस पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार हो गया और नेपोलियन को पदत्याग कर एल्बा द्वीप भेज दिया गया।
हालाँकि 1815 में नेपोलियन एल्बा से लौटकर पुनः सत्ता में आया, जिसे “सौ दिन” कहा जाता है। सातवें गठबंधन के अंतर्गत ब्रिटेन और उसके सहयोगियों ने अंतिम संघर्ष में उसे पराजित किया। 1815 में वाटरलू के युद्ध में उसकी निर्णायक हार हुई जिसके बाद उसे सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया जहाँ उसका शेष जीवन व्यतीत हुआ।
नेपोलियन युद्धों का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। इन संघर्षों ने यूरोप के राजनीतिक मानचित्र को बदल दिया और राष्ट्रवाद की भावना को प्रोत्साहित किया। फ्रांसीसी प्रभुत्व की एक संक्षिप्त अवधि अवश्य आई, किंतु अंततः यूरोपीय शक्तियों ने संतुलन स्थापित कर लिया। 1815 में वियना कांग्रेस के माध्यम से यूरोप में नई व्यवस्था स्थापित की गई जिसका उद्देश्य शक्ति-संतुलन बनाए रखना और भविष्य में बड़े युद्धों को रोकना था।
इस प्रकार 1803 से 1815 तक चले नेपोलियन युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं थे बल्कि वे राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक परिवर्तन के वाहक भी बने। इन युद्धों ने आधुनिक यूरोप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नई दिशा निर्धारित की।
वाटरलू का युद्ध
वाटरलू का युद्ध 18 जून 1815 को लड़ा गया वह ऐतिहासिक संघर्ष था जिसने यूरोप के राजनीतिक भविष्य को निर्णायक रूप से बदल दिया। यह युद्ध Napoleon Bonaparte के नेतृत्व वाली फ्रांसीसी सेना और मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेनाओं के बीच हुआ। मित्र पक्ष का नेतृत्व ब्रिटेन के ड्यूक Arthur Wellesley (वेलिंगटन) तथा प्रशा के सेनापति Gebhard Leberecht von Blücher (ब्लुचर) कर रहे थे। यह नेपोलियन का अंतिम और निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ।
1815 में एल्बा द्वीप से लौटकर नेपोलियन ने पुनः सत्ता संभाली जिसे “सौ दिन” का काल कहा जाता है। उसने शीघ्र ही अपनी सेना संगठित की और यूरोप की उन शक्तियों का सामना करने का निश्चय किया जो उसे पुनः सत्ता से हटाना चाहती थीं। उसके विरुद्ध ब्रिटेन, प्रशा, रूस, ऑस्ट्रिया तथा अन्य यूरोपीय राज्यों ने गठबंधन बना लिया। यद्यपि वाटरलू के मैदान में मुख्यतः ब्रिटिश और प्रशियन सेनाएँ ही प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में सम्मिलित थीं परंतु उनके पीछे व्यापक यूरोपीय समर्थन था।
वाटरलू बेल्जियम के निकट एक छोटा-सा स्थान था जहाँ नेपोलियन ने वेलिंगटन की सेना को निर्णायक रूप से पराजित करने का प्रयास किया, इससे पहले कि ब्लुचर की प्रशियन सेना आकर उनसे मिल सके। प्रारंभ में फ्रांसीसी सेना ने तीव्र आक्रमण किए और ब्रिटिश पंक्तियों को तोड़ने का प्रयास किया। दिनभर भीषण संघर्ष चलता रहा। वर्षा के कारण मैदान कीचड़युक्त हो गया था जिससे तोपखाने की गति प्रभावित हुई। फिर भी नेपोलियन को विश्वास था कि वह विजय प्राप्त कर लेगा।
युद्ध का निर्णायक मोड़ तब आया जब ब्लुचर की प्रशियन सेना समय पर पहुँच गई और फ्रांसीसी सेना के एक भाग पर पीछे से आक्रमण किया। अब फ्रांसीसी सेना दो ओर से घिर गई। मित्र राष्ट्रों की संयुक्त शक्ति के सामने नेपोलियन की सेना टिक न सकी और अंततः उसे पराजय का सामना करना पड़ा। यह पराजय इतनी पूर्ण थी कि नेपोलियन की पुनः सत्ता स्थापित करने की आशा सदा के लिए समाप्त हो गई।
युद्ध में हारने के बाद नेपोलियन ने आत्मसमर्पण कर दिया। मित्र राष्ट्रों ने उसे पुनः एल्बा भेजने के बजाय अधिक सुरक्षित और दूरस्थ स्थान पर निर्वासित करने का निर्णय लिया। उसे अटलांटिक महासागर के दूरस्थ द्वीप Saint Helena भेज दिया गया जहाँ वह कड़े निगरानी में रखा गया। वहीं 5 मई 1821 को 52 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।
वाटरलू का युद्ध केवल एक सैन्य पराजय नहीं था बल्कि एक युग का अंत था। नेपोलियन की पराजय के साथ ही फ्रांसीसी प्रभुत्व की आकांक्षा समाप्त हो गई और यूरोप में शक्ति-संतुलन की नई व्यवस्था स्थापित हुई। इसके पश्चात वियना कांग्रेस द्वारा यूरोप की राजनीतिक सीमाएँ पुनर्गठित की गईं। इस युद्ध ने ब्रिटेन की प्रतिष्ठा को और ऊँचा उठाया तथा प्रशा को भी यूरोप की प्रमुख शक्तियों में स्थान दिलाया।
इस प्रकार वाटरलू का युद्ध इतिहास में उस निर्णायक क्षण के रूप में स्मरण किया जाता है जहाँ एक महान सेनानायक की महत्वाकांक्षा का अंत हुआ और यूरोप में लगभग चार दशकों से चले आ रहे युद्धों का पटाक्षेप हुआ।
क्रीमिया का युद्ध
क्रीमिया का युद्ध जुलाई 1853 से सितंबर 1855 तक चला एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संघर्ष था जो मुख्यतः काला सागर के आसपास और विशेष रूप से क्रीमिया प्रायद्वीप में लड़ा गया। इस युद्ध में एक ओर Russian Empire था जबकि दूसरी ओर United Kingdom, France, Ottoman Empire तथा सार्डीनिया का राज्य एक संयुक्त मोर्चे के रूप में सम्मिलित थे। यह युद्ध यूरोप की शक्ति-संतुलन की राजनीति, धार्मिक विवादों और राष्ट्रवादी भावनाओं के जटिल मिश्रण का परिणाम था।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में पूर्वी प्रश्न प्रमुख था जो उस समय के यूरोप में एक गंभीर राजनीतिक समस्या बन चुका था। ओटोमन साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर हो रहा था और रूस स्वयं को स्लाव जातियों तथा रूढ़िवादी ईसाइयों का संरक्षक मानते हुए बाल्कन क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। स्लाववादी राष्ट्रीयता की भावना ने रूस की विस्तारवादी नीति को प्रेरित किया। दूसरी ओर, ब्रिटेन और फ्रांस को आशंका थी कि यदि रूस ने तुर्की के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तो वह भूमध्यसागर और एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार कर लेगा, जिससे यूरोपीय शक्ति-संतुलन बिगड़ जाएगा।
युद्ध की शुरुआत तब हुई जब रूस ने ओटोमन साम्राज्य के अधीनस्थ प्रदेशों में हस्तक्षेप किया। तुर्की ने इसका विरोध किया और संघर्ष प्रारंभ हो गया। शीघ्र ही ब्रिटेन और फ्रांस ने तुर्की के समर्थन में युद्ध में प्रवेश किया। 1854 में सार्डीनिया भी मित्र राष्ट्रों के पक्ष में शामिल हुआ। युद्ध का मुख्य क्षेत्र क्रीमिया बना जहाँ सेवास्तोपोल जैसे महत्वपूर्ण रूसी नौसैनिक अड्डों को निशाना बनाया गया।
इस युद्ध की कई घटनाएँ इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। बालाक्लावा की लड़ाई और ‘चार्ज ऑफ द लाइट ब्रिगेड’ जैसी घटनाएँ साहस और रणनीतिक भूलों दोनों का उदाहरण मानी जाती हैं। सेवास्तोपोल की घेराबंदी लगभग एक वर्ष तक चली और इसमें अत्यधिक जनहानि हुई। युद्ध के दौरान सैनिकों को भीषण सर्दी, बीमारी और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं का सामना करना पड़ा। इसी युद्ध में आधुनिक नर्सिंग सेवा की नींव रखने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने अपनी सेवाएँ दीं जिससे सैन्य चिकित्सा व्यवस्था में सुधार हुआ।
यद्यपि यह युद्ध अत्यंत रक्तरंजित था परंतु इसके परिणाम अपेक्षाकृत सीमित रहे। 1856 में पेरिस की संधि के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि के अंतर्गत रूस को काला सागर में अपने सैन्य जहाज रखने पर प्रतिबंध स्वीकार करना पड़ा और उसे कुछ क्षेत्रों से पीछे हटना पड़ा। फिर भी, युद्ध ने किसी भी पक्ष को निर्णायक विजय नहीं दी। इसीलिए कई इतिहासकार इसे अत्यधिक खर्चीला और अनिर्णायक संघर्ष मानते हैं।
क्रीमिया का युद्ध आधुनिक युद्धकला के इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें टेलीग्राफ, रेलमार्ग और आधुनिक हथियारों का प्रयोग हुआ, जिससे युद्ध की प्रकृति में परिवर्तन आया। साथ ही, युद्ध संवाददाताओं की रिपोर्टिंग ने पहली बार जनता को युद्ध की वास्तविकताओं से अवगत कराया।
अंततः यह युद्ध यूरोप की राजनीति में अस्थायी संतुलन तो स्थापित कर सका, परंतु बाल्कन क्षेत्र की समस्याएँ बनी रहीं जो आगे चलकर प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने वाली परिस्थितियों में परिवर्तित हुईं। क्रीमिया का युद्ध इस प्रकार एक ऐसा संघर्ष था जिसने तत्कालीन यूरोपीय शक्ति-राजनीति की सीमाओं और विरोधाभासों को उजागर किया किंतु भारी जनहानि के बावजूद स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं कर सका।
अफीम युद्ध
अफ़ीम युद्ध उन्नीसवीं सदी के मध्य में चीन और मुख्यतः ब्रिटेन के बीच लड़े गए दो महत्वपूर्ण युद्धों को कहा जाता है जिनका मूल कारण व्यापारिक असंतुलन और अफ़ीम का अवैध आयात था। प्रथम अफ़ीम युद्ध 1839 से 1842 तक चला और द्वितीय अफ़ीम युद्ध 1856 से 1860 तक। इन युद्धों के समय चीन पर Qing dynasty का शासन था जबकि ब्रिटेन एक औद्योगिक शक्ति के रूप में एशिया में अपने व्यापारिक हितों का विस्तार कर रहा था।
उन्नीसवीं शताब्दी में चीन और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंधों में असंतुलन था। चीन से चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तनों की भारी माँग थी परंतु चीन यूरोपीय वस्तुओं को कम स्वीकार करता था। परिणामस्वरूप ब्रिटेन से बड़ी मात्रा में चाँदी चीन जा रही थी। इस घाटे को पूरा करने के लिए ब्रिटेन ने भारत में उत्पादित अफ़ीम को चीन में अवैध रूप से बेचने की नीति अपनाई। इससे चीन में नशे की समस्या गंभीर हो गई और सामाजिक-आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ।
चीन सरकार ने अफ़ीम के आयात पर रोक लगाने का प्रयास किया। 1839 में चीनी अधिकारी लिन ज़ेशु ने कैंटन (गुआंगझोउ) में अफ़ीम की बड़ी खेप को जब्त कर नष्ट कर दिया। इस घटना को ब्रिटेन ने अपने व्यापारिक हितों पर आघात माना और युद्ध छिड़ गया। ब्रिटेन की आधुनिक नौसैनिक शक्ति और उन्नत हथियारों के सामने चीन की पारंपरिक सेना टिक न सकी। 1842 में प्रथम अफ़ीम युद्ध का अंत हुआ और चीन को Treaty of Nanking पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस संधि के तहत चीन ने हांगकांग ब्रिटेन को सौंप दिया, पाँच बंदरगाह व्यापार के लिए खोल दिए और भारी क्षतिपूर्ति देने पर सहमति दी।
द्वितीय अफ़ीम युद्ध 1856 में पुनः प्रारंभ हुआ। इस बार ब्रिटेन के साथ France भी शामिल हो गया। संघर्ष का कारण व्यापारिक अधिकारों का विस्तार और राजनयिक प्रतिनिधियों को बीजिंग में स्थायी रूप से रहने की अनुमति प्राप्त करना था। इस युद्ध में भी चीन को पराजय झेलनी पड़ी और 1858 में Treaty of Tientsin तथा 1860 में बीजिंग की संधियों के माध्यम से और अधिक रियायतें देनी पड़ीं। इन संधियों के परिणामस्वरूप विदेशी शक्तियों को चीन में व्यापक व्यापारिक और राजनयिक अधिकार मिले तथा अफ़ीम व्यापार को वैधता प्राप्त हुई।
अफ़ीम युद्धों के परिणाम चीन के लिए अत्यंत अपमानजनक सिद्ध हुए। इन्हें चीन के “अपमान का शताब्दी” काल की शुरुआत माना जाता है जब विदेशी शक्तियों ने उसकी संप्रभुता को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इन युद्धों ने चीन की आंतरिक राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव डाला और आगे चलकर अनेक विद्रोहों तथा सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की।
इस प्रकार अफ़ीम युद्ध केवल व्यापारिक विवाद नहीं थे, बल्कि वे साम्राज्यवाद, आर्थिक लालच और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के प्रतीक थे। इन संघर्षों ने एशिया में यूरोपीय प्रभाव को सुदृढ़ किया और चीन की पारंपरिक व्यवस्था को झकझोर दिया जिसके दूरगामी परिणाम आधुनिक विश्व इतिहास में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
स्पेन-अमेरिका युद्ध
स्पेन-अमेरिका युद्ध 1898 ई. में स्पेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच लड़ा गया एक महत्वपूर्ण सशस्त्र संघर्ष था जिसने न केवल कैरेबियाई क्षेत्र बल्कि प्रशांत महासागर की राजनीति को भी बदल दिया। यह युद्ध अपेक्षाकृत अल्पकालिक था किंतु इसके परिणाम अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुए। उस समय क्यूबा स्पेन का उपनिवेश था और वहाँ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चल रहा था। अमेरिकी जनता और मीडिया क्यूबा के विद्रोहियों के प्रति सहानुभूति रखती थी जिससे अमेरिका और स्पेन के संबंध तनावपूर्ण हो गए।
युद्ध की तात्कालिक शुरुआत हवाना बंदरगाह में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस मेन के 15 फरवरी 1898 को हुए विस्फोट से हुई। इस घटना में सैकड़ों अमेरिकी नाविक मारे गए। यद्यपि बाद में विस्फोट के कारणों पर विवाद बना रहा, उस समय अमेरिकी प्रेस ने इसे स्पेन की साजिश के रूप में प्रस्तुत किया और “रिमेम्बर द मेन” का नारा लोकप्रिय हुआ। परिणामस्वरूप अप्रैल 1898 में अमेरिका ने स्पेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
युद्ध दो प्रमुख क्षेत्रों में लड़ा गया कैरेबियाई सागर और प्रशांत महासागर। कैरेबियाई क्षेत्र में अमेरिकी सेनाओं ने क्यूबा और प्यूर्टो रिको में अभियान चलाया। सैन जुआन हिल की लड़ाई विशेष रूप से प्रसिद्ध हुई, जहाँ अमेरिकी बलों ने निर्णायक विजय प्राप्त की। दूसरी ओर, प्रशांत क्षेत्र में मनीला की खाड़ी की लड़ाई में अमेरिकी नौसेना ने स्पेनिश बेड़े को परास्त कर फिलीपींस पर नियंत्रण स्थापित किया।
स्पेन की सैन्य शक्ति उस समय कमजोर पड़ चुकी थी जबकि अमेरिका एक उभरती हुई औद्योगिक और सैन्य शक्ति बन चुका था। कुछ ही महीनों में स्पेन पराजित हो गया। दिसंबर 1898 में पेरिस की संधि के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि के तहत स्पेन ने क्यूबा पर अपना नियंत्रण छोड़ दिया और प्यूर्टो रिको, गुआम तथा फिलीपींस को अमेरिका को सौंप दिया।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका एक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में उभरा और कैरेबियाई क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ गया। फिलीपींस के अधिग्रहण के बाद वहाँ स्वतंत्रता की मांग तेज हुई जिससे फिलीपीन-अमेरिकी युद्ध प्रारंभ हुआ। इस प्रकार स्पेन-अमेरिका युद्ध ने अमेरिका की विदेश नीति को विस्तारवादी दिशा दी और उसे विश्व राजनीति में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया।
स्पेन के लिए यह युद्ध उसके औपनिवेशिक साम्राज्य के पतन का प्रतीक बना। लैटिन अमेरिका और एशिया में उसकी शेष उपनिवेशी सत्ता समाप्त हो गई। वहीं अमेरिका के लिए यह युद्ध उसके वैश्विक उदय का प्रारंभिक चरण सिद्ध हुआ। इस प्रकार 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध विश्व इतिहास में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और शक्ति-संतुलन के एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
रूस-जापान युद्ध
रूस तथा जापान के मध्य 1904–1905 के दौरान लड़ा गया युद्ध आधुनिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संघर्ष था जिसे Russo-Japanese War के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध मुख्यतः मंचूरिया और कोरिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के प्रश्न को लेकर हुआ था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जापान तीव्र गति से औद्योगिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभर रहा था जबकि रूस पूर्वी एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता था। दोनों देशों की महत्वाकांक्षाएँ एक-दूसरे से टकराईं और अंततः युद्ध छिड़ गया।
संघर्ष की शुरुआत फरवरी 1904 में हुई जब जापान ने बिना औपचारिक घोषणा के पोर्ट आर्थर स्थित रूसी नौसैनिक अड्डे पर अचानक हमला कर दिया। यह कदम रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत साहसिक था और इससे रूस की पूर्वी एशियाई नौसेना को भारी क्षति पहुँची। युद्ध के दौरान कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ी गईं जिनमें पोर्ट आर्थर की घेराबंदी और मुक्डेन की लड़ाई उल्लेखनीय हैं। समुद्र में 1905 की त्सुशिमा की लड़ाई निर्णायक सिद्ध हुई जहाँ जापानी नौसेना ने रूसी बाल्टिक बेड़े को पूरी तरह पराजित कर दिया।
जापान की विजय ने विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया क्योंकि पहली बार किसी एशियाई शक्ति ने एक यूरोपीय महाशक्ति को आधुनिक युद्ध में परास्त किया था। इस जीत के परिणामस्वरूप जापान को मंचूरिया में प्रभाव तथा कोरिया पर नियंत्रण प्राप्त हुआ। 1905 की पोर्ट्समाउथ संधि के माध्यम से रूस ने जापान के अधिकारों को स्वीकार किया। इससे जापान को विश्व मंच पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में मान्यता मिली और वह एशिया में साम्राज्यवादी शक्ति बनकर उभरा।
रूस के लिए यह पराजय अत्यंत अपमानजनक थी। युद्ध ने उसकी सैन्य और प्रशासनिक कमजोरियों को उजागर कर दिया। ज़ार निकोलस द्वितीय की सरकार पहले से ही भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट से जूझ रही थी। इस हार के बाद जनता में असंतोष तीव्र हो गया। श्रमिकों, सैनिकों और किसानों के बीच विद्रोह की भावना फैलने लगी, जिसका परिणाम 1905 की रूसी क्रांति के रूप में सामने आया। यद्यपि यह क्रांति तत्काल सफल नहीं हुई किंतु इसने रूस में भविष्य के राजनीतिक परिवर्तनों की नींव रखी।
रूस-जापान युद्ध का प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं था। इसने एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशित देशों में भी नई आशा जगाई कि यूरोपीय शक्तियाँ अजेय नहीं हैं। जापान की सफलता ने एशियाई राष्ट्रवाद को प्रेरणा दी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया।
इस प्रकार 1904–1905 का यह युद्ध न केवल क्षेत्रीय प्रभुत्व की लड़ाई था बल्कि यह विश्व इतिहास में एक मोड़ सिद्ध हुआ। जापान की अप्रत्याशित विजय ने उसे वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया जबकि रूस की पराजय ने उसके भीतर राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया जिसने आगे चलकर 1917 की क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की।
बाल्कन युद्ध
बाल्कन युद्ध 1912–13 ई. में बाल्कन देशों और तुर्की के बीच लड़े गए दो परस्पर संबंधित युद्धों की श्रृंखला थी जिसने दक्षिण-पूर्वी यूरोप की राजनीतिक संरचना को गहराई से बदल दिया। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक Ottoman Empire यूरोप में अपनी शक्ति खो चुका था किंतु उसके अधीन अब भी कई ऐसे क्षेत्र थे जहाँ बुल्गार, सर्ब, यूनानी और अन्य जातीय समुदाय रहते थे। यद्यपि Bulgaria, Greece, Serbia और Montenegro स्वतंत्र हो चुके थे फिर भी उनकी जातीय आबादी के बड़े हिस्से ओटोमन शासन के अधीन थे।
1912 में इन राज्यों ने मिलकर बाल्कन लीग का गठन किया जिसका उद्देश्य ओटोमन साम्राज्य को यूरोप से लगभग पूरी तरह बाहर निकालना था। प्रथम बाल्कन युद्ध 8 अक्टूबर 1912 को प्रारंभ हुआ जब लीग के सदस्य देशों ने तुर्की पर संयुक्त आक्रमण किया। बाल्कन लीग की सेनाओं ने त्वरित और प्रभावी सैन्य अभियान चलाया। बुल्गारिया की सेना ने थ्रेस क्षेत्र में निर्णायक प्रगति की और एड्रियनोपल (एडिर्ने) जैसे महत्वपूर्ण किलों पर कब्जा कर लिया। सर्बिया और ग्रीस ने मैसेडोनिया और अन्य क्षेत्रों में ओटोमन सेना को पराजित किया।
लगभग आठ महीनों तक चले इस संघर्ष के बाद 30 मई 1913 को लंदन की संधि पर हस्ताक्षर हुए जिसके परिणामस्वरूप ओटोमन साम्राज्य ने बाल्कन में अपने अधिकांश यूरोपीय क्षेत्रों को खो दिया। इससे बाल्कन देशों का क्षेत्रफल और प्रभाव दोनों बढ़े किंतु विजय के साथ ही नए विवाद भी जन्म ले चुके थे। सबसे बड़ा विवाद मैसेडोनिया के विभाजन को लेकर था।
द्वितीय बाल्कन युद्ध 16 जून 1913 को आरंभ हुआ जब बुल्गारिया अपने हिस्से से असंतुष्ट होकर अपने पूर्व सहयोगियों सर्बिया और ग्रीस पर आक्रमण कर बैठा। इस बार परिस्थिति बदल चुकी थी। सर्बिया और ग्रीस ने मिलकर बुल्गारिया का सामना किया और शीघ्र ही रोमानिया तथा ओटोमन साम्राज्य भी बुल्गारिया के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गए। परिणामस्वरूप बुल्गारिया को पराजय का सामना करना पड़ा और उसे बुखारेस्ट की संधि के माध्यम से अपने दावे त्यागने पड़े।
बाल्कन युद्धों के परिणाम दूरगामी थे। ओटोमन साम्राज्य का यूरोप में प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और बाल्कन क्षेत्र में नए राष्ट्रवादी उत्साह का संचार हुआ। किंतु सीमाओं के पुनर्निर्धारण से असंतोष और प्रतिद्वंद्विता भी बढ़ी, विशेषकर सर्बिया और ऑस्ट्रिया-हंगरी के बीच तनाव तीव्र हो गया। यही तनाव आगे चलकर 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि बना।
इस प्रकार 1912–13 के बाल्कन युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं थे बल्कि वे यूरोप की व्यापक राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक थे। इन युद्धों ने शक्ति-संतुलन को बदल दिया, राष्ट्रवाद को प्रबल किया और विश्व इतिहास को एक ऐसे मार्ग पर अग्रसर किया जिसने शीघ्र ही पूरे विश्व को महायुद्ध की विभीषिका में झोंक दिया।
स्पेन का गृहयुद्ध
स्पेन का गृहयुद्ध 1936 से 1939 ई. के बीच लड़ा गया एक भीषण आंतरिक संघर्ष था जिसने स्पेन की राजनीति, समाज और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। यह युद्ध मुख्यतः स्पेन के रिपब्लिकन गुट और राष्ट्रवादी गुट के बीच हुआ। रिपब्लिकन पक्ष में वामपंथी, समाजवादी, साम्यवादी तथा उदारवादी शक्तियाँ शामिल थीं जबकि राष्ट्रवादी पक्ष का नेतृत्व जनरल Francisco Franco कर रहे थे जिनका झुकाव दक्षिणपंथी और फासीवादी विचारधाराओं की ओर था।
1931 में स्पेन में राजतंत्र का अंत हुआ और एक गणतांत्रिक सरकार की स्थापना हुई। नई सरकार ने भूमि सुधार, चर्च के प्रभाव में कमी तथा सेना में परिवर्तन जैसे कदम उठाए जिससे समाज के परंपरावादी और धनी वर्गों में असंतोष फैल गया। 1936 में हुए आम चुनावों में वामपंथी दलों के ‘पॉपुलर फ्रंट’ की विजय हुई जिसके बाद राजनीतिक तनाव और अधिक बढ़ गया। उसी वर्ष जुलाई में सेना के एक हिस्से ने विद्रोह कर दिया जो शीघ्र ही पूर्ण गृहयुद्ध में बदल गया।
इस युद्ध को अक्सर लोकतंत्र और फासीवाद के बीच संघर्ष के रूप में देखा जाता है क्योंकि राष्ट्रवादी गुट को नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली का समर्थन प्राप्त था जबकि रिपब्लिकनों को सोवियत संघ और अंतरराष्ट्रीय ब्रिगेडों से सहायता मिली। किंतु अनेक इतिहासकारों के अनुसार यह संघर्ष वास्तव में वामपंथी क्रांतिकारियों और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों के बीच सत्ता और विचारधारा की लड़ाई था। यह केवल राजनीतिक सत्ता का प्रश्न नहीं था बल्कि सामाजिक ढाँचे, धार्मिक प्रभाव और आर्थिक व्यवस्था के स्वरूप पर भी टकराव था।
युद्ध के दौरान कई भीषण घटनाएँ हुईं। 1937 में जर्मन वायुसेना द्वारा गुएर्निका नगर पर की गई बमबारी ने विश्व को झकझोर दिया। यह घटना आधुनिक युद्ध की क्रूरता का प्रतीक बन गई। राजधानी मैड्रिड और अन्य प्रमुख शहर लंबे समय तक संघर्ष का केंद्र बने रहे। तीन वर्षों तक चले इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए या विस्थापित हुए।
अंततः 1939 में राष्ट्रवादी सेनाओं ने निर्णायक विजय प्राप्त की। रिपब्लिकन सरकार का पतन हुआ और फ्रैंको ने सत्ता संभाली। इसके बाद स्पेन में एक तानाशाही शासन स्थापित हुआ जो 1975 में फ्रैंको की मृत्यु तक लगभग 36 वर्षों तक चला। इस अवधि में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई और विरोधियों का दमन किया गया।
स्पेन का गृहयुद्ध केवल राष्ट्रीय संघर्ष नहीं था; यह उस समय यूरोप में उभर रही वैचारिक ध्रुवीकरण की झलक भी था। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले यह संघर्ष मानो आने वाले व्यापक युद्ध का पूर्वाभ्यास सिद्ध हुआ। इस युद्ध ने स्पेन की सामाजिक संरचना को विभाजित कर दिया और उसकी स्मृतियाँ आज भी राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई हैं।
इस प्रकार 1936–39 का स्पेन का गृहयुद्ध आधुनिक यूरोपीय इतिहास का एक निर्णायक अध्याय है, जिसमें विचारधाराओं की टकराहट, सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा और सत्ता की संघर्षपूर्ण राजनीति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
स्वेज नहर का युद्ध
स्वेज नहर का युद्ध 1956 में मिस्र तथा ब्रिटेन, फ्रांस और इज़राइल के बीच लड़ा गया एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संघर्ष था जिसे प्रायः स्वेज संकट के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध की पृष्ठभूमि में मिस्र के राष्ट्रपति Gamal Abdel Nasser द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा थी। स्वेज नहर भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग है जिसके माध्यम से यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार होता है। पहले यह नहर ब्रिटिश और फ्रांसीसी हितों के नियंत्रण में थी जिससे उन्हें आर्थिक और सामरिक लाभ प्राप्त होता था।
26 जुलाई 1956 को नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनका उद्देश्य नहर से होने वाली आय का उपयोग मिस्र के विकास, विशेषकर असवान बांध परियोजना, के लिए करना था। इस कदम से ब्रिटेन और फ्रांस अत्यंत नाराज़ हुए क्योंकि उनकी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति पर सीधा प्रभाव पड़ा। दूसरी ओर इज़राइल भी मिस्र से अपने संबंधों को लेकर तनाव में था, विशेषकर सिनाई प्रायद्वीप और गाज़ा क्षेत्र को लेकर।
अक्टूबर 1956 में इज़राइल ने सिनाई क्षेत्र पर आक्रमण किया। इसके तुरंत बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र को युद्धविराम का अल्टीमेटम दिया और नहर की सुरक्षा के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप शुरू कर दिया। संयुक्त आक्रमण के परिणामस्वरूप मिस्र के कई हिस्सों में भीषण संघर्ष हुआ। यद्यपि सैन्य दृष्टि से आक्रमणकारी देशों को प्रारंभिक सफलता मिली किंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति उनके विरुद्ध जाती दिखाई दी।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस संकट में सक्रिय भूमिका निभाई। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने इस आक्रमण का विरोध किया जिससे ब्रिटेन और फ्रांस पर भारी कूटनीतिक दबाव पड़ा। अंततः संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण आक्रमणकारी सेनाओं को मिस्र से हटना पड़ा। यह घटना शीत युद्ध के दौर में शक्ति-संतुलन की राजनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।
स्वेज संकट के परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण थे। मिस्र की स्थिति मजबूत हुई और नासिर अरब जगत में एक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे। ब्रिटेन और फ्रांस की वैश्विक प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा, जिससे स्पष्ट हुआ कि वे अब पूर्ववत महाशक्ति नहीं रहे। इस संकट ने मध्य-पूर्व की राजनीति को भी नई दिशा दी और संयुक्त राष्ट्र की शांति-रक्षा भूमिका को सुदृढ़ किया।
इस प्रकार 1956 का स्वेज नहर युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं था बल्कि यह उपनिवेशवाद के अंत, राष्ट्रवाद के उदय और शीत युद्ध की कूटनीति का प्रतीक था। इसने विश्व राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दिया जिसमें पुरानी औपनिवेशिक शक्तियों का प्रभाव घटता गया और नवस्वतंत्र राष्ट्रों की भूमिका बढ़ती गई।
वियतनाम युद्ध
वियतनाम युद्ध 1957 से 1975 ई. के बीच चला एक लंबा और विनाशकारी संघर्ष था जिसमें मुख्यतः उत्तरी वियतनाम और दक्षिणी वियतनाम की सेनाएँ आमने-सामने थीं जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम के समर्थन में सक्रिय सैन्य हस्तक्षेप किया। इस युद्ध की पृष्ठभूमि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की औपनिवेशिक और शीत युद्ध की राजनीति में निहित थी। पहले वियतनाम फ्रांस का उपनिवेश था किंतु स्वतंत्रता आंदोलन के परिणामस्वरूप फ्रांसीसी शासन को चुनौती मिली। मई 1954 में डियेन बिएन फू के निर्णायक युद्ध में वियत मिन्ह की विजय के साथ फ्रांस की पराजय हुई और जुलाई 1954 की जिनीवा संधि के अंतर्गत वियतनाम को अस्थायी रूप से दो भागों में विभाजित कर दिया गया।
उत्तरी वियतनाम पर साम्यवादी नेता Ho Chi Minh का नियंत्रण था जबकि दक्षिणी वियतनाम में बाओ दाई और बाद में अन्य नेतृत्व के अधीन सरकार स्थापित हुई। संधि में 1956 में आम चुनाव कराकर देश के पुनः एकीकरण का प्रावधान था किंतु शीत युद्ध की परिस्थितियों और वैचारिक टकराव के कारण यह चुनाव नहीं हो सका। परिणामस्वरूप उत्तर और दक्षिण के बीच तनाव बढ़ता गया और धीरे-धीरे संघर्ष पूर्ण युद्ध में बदल गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने साम्यवाद के प्रसार को रोकने की नीति के तहत दक्षिण वियतनाम को आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य सहायता देना शुरू किया। 1960 के दशक में अमेरिकी सैनिकों की संख्या तेजी से बढ़ी और युद्ध तीव्र हो गया। गुरिल्ला युद्ध शैली अपनाने वाली वियतकांग और उत्तरी वियतनामी सेनाओं ने अमेरिकी बलों को भारी चुनौती दी। घने जंगलों, कठिन भूगोल और स्थानीय समर्थन के कारण अमेरिका को निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।
युद्ध के दौरान अमेरिका ने ‘एजेंट ऑरेंज’ नामक रासायनिक पदार्थ का प्रयोग किया जिसमें डायोक्सिन तत्व शामिल था। इसका उद्देश्य जंगलों को नष्ट कर शत्रु की छिपने की क्षमता समाप्त करना था, किंतु इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम अत्यंत गंभीर रहे। लाखों नागरिक और सैनिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हुए तथा पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुँची। यह रासायनिक प्रयोग युद्ध के इतिहास में एक विवादास्पद और दुखद अध्याय बन गया।
1968 का टेट आक्रमण युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तरी वियतनाम की शक्ति अभी भी अक्षुण्ण है। अमेरिकी जनता में युद्ध के प्रति असंतोष बढ़ने लगा और देश के भीतर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। अंततः 1973 में पेरिस शांति समझौते के बाद अमेरिकी सेनाएँ वियतनाम से हटने लगीं।
1975 में उत्तरी वियतनाम की सेनाओं ने सैगॉन पर कब्जा कर लिया और दक्षिणी वियतनाम का पतन हो गया। इसके साथ ही वियतनाम का पुनः एकीकरण साम्यवादी शासन के अधीन हुआ। यह युद्ध अमेरिका के लिए एक कठिन और विवादास्पद अनुभव सिद्ध हुआ जबकि वियतनाम के लिए यह स्वतंत्रता और एकीकरण का प्रतीक बना, यद्यपि इसकी कीमत अत्यंत भारी थी।
इस प्रकार वियतनाम युद्ध शीत युद्ध काल का एक महत्वपूर्ण संघर्ष था जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सैन्य रणनीति और जनमत की शक्ति को नए रूप में प्रस्तुत किया। यह युद्ध न केवल दो देशों के बीच संघर्ष था बल्कि विचारधाराओं, औपनिवेशिक विरासत और वैश्विक शक्ति-संतुलन की टकराहट का प्रतीक भी था।
कोरिया का युद्ध
कोरिया का युद्ध 1950 से 1953 के बीच लड़ा गया एक भीषण संघर्ष था जो शीत युद्ध काल का पहला बड़ा सशस्त्र टकराव माना जाता है। इसका आरंभ 25 जून 1950 को हुआ जब North Korea ने अचानक South Korea पर आक्रमण कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोरिया को 38वें समानांतर रेखा पर दो भागों में विभाजित कर दिया गया था। उत्तरी भाग पर साम्यवादी शासन स्थापित हुआ जबकि दक्षिणी भाग में पश्चिम समर्थित सरकार बनी। यह विभाजन अस्थायी माना गया था किंतु वैचारिक मतभेदों और शीत युद्ध की राजनीति के कारण यह स्थायी रूप ले बैठा।
युद्ध के प्रारंभिक चरण में उत्तरी कोरिया की सेना ने तेजी से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए सियोल सहित कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। दक्षिण कोरिया को बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले सैन्य सहायता भेजी गई जिसमें प्रमुख भूमिका United States ने निभाई। अमेरिकी जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में इंचोन में साहसिक समुद्री उतराई की गई जिससे युद्ध की दिशा कुछ समय के लिए दक्षिण के पक्ष में बदल गई।
इसके बाद संयुक्त राष्ट्र की सेनाएँ उत्तर की ओर बढ़ीं और यालू नदी के निकट तक पहुँच गईं। यह स्थिति China के लिए चिंताजनक थी जिसने बड़ी संख्या में सैनिक भेजकर युद्ध में प्रवेश किया। चीन के हस्तक्षेप से संघर्ष फिर संतुलित हो गया और मोर्चा लगभग उसी 38वें समानांतर के आसपास स्थिर हो गया जहाँ से युद्ध प्रारंभ हुआ था। सोवियत संघ ने भी उत्तर को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया।
तीन वर्षों तक चले इस युद्ध में भीषण लड़ाइयाँ हुईं और लाखों सैनिक तथा नागरिक मारे गए। अंततः 27 जुलाई 1953 को युद्धविराम समझौता हुआ परंतु कोई औपचारिक शांति संधि नहीं हुई। इस कारण तकनीकी रूप से दोनों कोरिया आज भी युद्ध की स्थिति में माने जाते हैं। 38वें समानांतर के आसपास एक असैनिकीकृत क्षेत्र (DMZ) स्थापित किया गया जो आज भी दोनों देशों के बीच सीमा का कार्य करता है।
कोरियाई युद्ध का परिणाम निर्णायक नहीं था किंतु इसके प्रभाव व्यापक रहे। यह संघर्ष शीत युद्ध की वैचारिक प्रतिस्पर्धा का प्रत्यक्ष उदाहरण बना जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद आमने-सामने थे। युद्ध ने एशिया में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को स्थायी बना दिया और क्षेत्रीय राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया।
इस प्रकार 1950–53 का कोरिया युद्ध केवल दो राष्ट्रों के बीच संघर्ष नहीं था बल्कि वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मंच भी था। यह युद्ध बिना स्पष्ट विजय के समाप्त हुआ किंतु जन-धन की भारी हानि और स्थायी तनाव की विरासत छोड़ गया जो आज भी कोरियाई प्रायद्वीप की राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
अरब-इजरायल युद्ध
अरब–इजरायल संघर्ष बीसवीं शताब्दी के मध्य में पश्चिम एशिया की राजनीति का केंद्र बना रहा। 1956 में हुआ पहला प्रमुख संघर्ष, जिसे सामान्यतः स्वेज संकट के रूप में भी जाना जाता है, मिस्र और इज़रायल के बीच तनाव से उत्पन्न हुआ था। उस समय मिस्र के राष्ट्रपति नासिर द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद क्षेत्रीय परिस्थितियाँ अत्यंत तनावपूर्ण हो गईं। इज़रायल ने मिस्र के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाया जबकि ब्रिटेन और फ्रांस ने भी हस्तक्षेप किया। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण आक्रमणकारी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा परंतु इस संघर्ष ने अरब–इजरायल प्रतिद्वंद्विता को और गहरा कर दिया।
1967 में छिड़े छह-दिवसीय युद्ध में स्थिति निर्णायक रूप से बदली। इस युद्ध में Israel ने Jordan, Syria और Egypt की संयुक्त सेनाओं को पराजित कर दिया। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप इज़रायल ने पश्चिमी किनारा (वेस्ट बैंक), पूर्वी येरुशलम, गाज़ा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप तथा गोलन पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया। विशेष रूप से गोलन पहाड़ियाँ सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थीं क्योंकि वहाँ से उत्तरी इज़रायल के क्षेत्रों पर निगरानी रखी जा सकती थी।
1973 में दूसरा बड़ा संघर्ष हुआ जिसे योम किप्पुर युद्ध के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध उस समय प्रारंभ हुआ जब मिस्र और सीरिया ने यहूदी पर्व योम किप्पुर के दिन इज़रायल पर अचानक हमला किया। प्रारंभिक चरण में अरब सेनाओं को कुछ सफलता मिली किंतु शीघ्र ही इज़रायल ने पलटवार कर स्थिति अपने नियंत्रण में ले ली। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना अत्यंत कठिन है।
इन युद्धों के परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया की सीमाएँ और शक्ति-संतुलन बदल गया। इज़रायल की सैन्य क्षमता विश्व के सामने स्पष्ट रूप से उभरी जबकि अरब देशों में राजनीतिक और सैन्य पुनर्गठन की आवश्यकता महसूस की गई। 1973 के युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति ने शांति प्रयासों को गति दी जिसके परिणामस्वरूप बाद में मिस्र और इज़रायल के बीच कैंप डेविड समझौता संभव हो सका।
इस प्रकार 1956 और 1973 के अरब–इजरायल युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं थे बल्कि वे व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रवाद और सुरक्षा चिंताओं का परिणाम थे। इन युद्धों ने पश्चिम एशिया की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया और आज भी उस क्षेत्र के विवादों की जड़ें इन्हीं घटनाओं में देखी जा सकती हैं।
भारत–चीन युद्ध
भारत–चीन युद्ध 1962 ई. में भारत और चीन के बीच लड़ा गया एक सीमित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था जिसने दोनों देशों के संबंधों को गहराई से प्रभावित किया। यह युद्ध मुख्यतः हिमालयी सीमा विवाद के कारण हुआ विशेषकर अक्साई चिन क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी सीमा क्षेत्र (तत्कालीन नेफा, वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) को लेकर। उस समय भारत के प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru थे जबकि चीन में कम्युनिस्ट नेतृत्व सुदृढ़ स्थिति में था।
सीमा विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल में खींची गई रेखाओं में थीं जिन पर दोनों देशों की व्याख्याएँ भिन्न थीं। भारत मैकमोहन रेखा को अपनी पूर्वी सीमा मानता था जबकि चीन उसे स्वीकार नहीं करता था। पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चिन पर भी दोनों देशों का दावा था। चीन ने इस क्षेत्र से होकर शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने के लिए एक सड़क का निर्माण किया, जिससे तनाव और बढ़ गया।
अक्टूबर 1962 में संघर्ष खुलकर सामने आया। यह युद्ध अत्यंत कठोर और दुर्गम परिस्थितियों में लड़ा गया। अधिकांश लड़ाइयाँ लगभग 4,250 मीटर (14,000 फीट) से अधिक ऊँचाई पर हुईं। ऐसे वातावरण में ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक ठंड और दुर्गम भू-भाग ने दोनों पक्षों के सैनिकों के सामने भारी चुनौतियाँ प्रस्तुत कीं। रसद आपूर्ति, हथियारों की ढुलाई और संचार व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
इस युद्ध की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि दोनों पक्षों ने न तो नौसेना का और न ही वायु सेना का उपयोग किया। संघर्ष मुख्यतः थल सेना तक सीमित रहा। चीनी सेना ने संगठित और योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण किया तथा कई मोर्चों पर भारतीय सेना को पीछे हटना पड़ा। विशेष रूप से अक्साई चिन क्षेत्र में चीन को बढ़त मिली। पूर्वी क्षेत्र में भी तवांग और अन्य स्थानों पर चीनी सेना ने तेजी से प्रगति की।
नवंबर 1962 में चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की और अपने सैनिकों को कुछ क्षेत्रों से पीछे हटाया किंतु अक्साई चिन पर उसका नियंत्रण बना रहा। इस युद्ध में भारत को पराजय का सामना करना पड़ा जिसने उसकी रक्षा नीति और सैन्य तैयारी पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। इसके बाद भारत ने अपनी सैन्य संरचना को सुदृढ़ करने और सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए व्यापक कदम उठाए।
भारत–चीन युद्ध का प्रभाव केवल सैन्य पराजय तक सीमित नहीं था; इसने एशिया की राजनीति और भारत की विदेश नीति को भी प्रभावित किया। भारत ने रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई रणनीतिक साझेदारियाँ विकसित कीं। वहीं चीन ने अपनी सीमा नीति को सुदृढ़ किया।
भारत-पाकिस्तान युद्ध
भारत–पाकिस्तान युद्ध 1965 और 1971 ई. दक्षिण एशिया के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष रहे जिन्होंने क्षेत्रीय राजनीति, सीमाओं और शक्ति-संतुलन को गहराई से प्रभावित किया। 1965 का युद्ध मुख्यतः कश्मीर विवाद और सीमा झड़पों से उत्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत अप्रैल 1965 में कच्छ के रण क्षेत्र में हुई झड़पों से मानी जाती है जहाँ पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन डेजर्ट हॉक’ के अंतर्गत सैन्य गतिविधियाँ शुरू कीं। भारत ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाया किंतु पाकिस्तान ने इसे भारत की कमजोरी समझते हुए कश्मीर में स्थिति को अस्थिर करने की योजना बनाई।
5 अगस्त 1965 को पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा (LOC) पार कर घुसपैठ की और कश्मीर में विद्रोह भड़काने का प्रयास किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापक युद्ध छिड़ गया। पंजाब और कश्मीर के मोर्चों पर भीषण लड़ाइयाँ हुईं। भारतीय सेना ने लाहौर और सियालकोट क्षेत्रों में भी जवाबी कार्रवाई की। युद्ध में दोनों पक्षों को भारी क्षति हुई। अंततः संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से सितंबर 1965 में संघर्ष विराम लागू हुआ। 1966 में ताशकंद समझौते के माध्यम से दोनों देशों ने युद्ध-पूर्व स्थिति बहाल करने पर सहमति व्यक्त की।
1971 का युद्ध परिस्थितियों की दृष्टि से भिन्न था। यह संघर्ष पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में राजनीतिक संकट और दमन से उत्पन्न हुआ। 1970 के आम चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को बहुमत मिला किंतु सत्ता हस्तांतरण में देरी और सैन्य कार्रवाई के कारण व्यापक असंतोष फैल गया। लाखों शरणार्थी भारत की सीमा में प्रवेश करने लगे जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।
3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया जिसके बाद पूर्ण युद्ध आरंभ हो गया। भारतीय सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान में तीव्र और संगठित अभियान चलाया। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। 6 दिसंबर 1971 को भारत ने बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी थी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया।
युद्ध के बाद दोनों देशों ने 1972 में शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसी काल में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के प्रमुख नेता के रूप में उभरे और शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति बने।
इन दोनों युद्धों ने दक्षिण एशिया की राजनीति पर स्थायी प्रभाव डाला। 1965 का संघर्ष जहाँ कश्मीर विवाद की जटिलता को उजागर करता है वहीं 1971 का युद्ध मानवीय संकट और आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रतीक बन गया। इन घटनाओं ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित किया और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को नई दिशा दी।
छ: दिवसीय युद्ध
छः दिवसीय युद्ध 1967 ई. में इज़रायल तथा मिस्र, सीरिया और जॉर्डन के बीच लड़ा गया एक निर्णायक और तीव्र संघर्ष था जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। यह युद्ध 5 जून से 10 जून 1967 तक केवल छह दिनों में समाप्त हो गया किंतु इसके परिणाम दूरगामी और स्थायी सिद्ध हुए।
युद्ध की पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय तनाव, सीमा विवाद और सैन्य तैयारियाँ शामिल थीं। मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने सिनाय प्रायद्वीप में अपनी सेना तैनात की और संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना को हटाने की मांग की। साथ ही तिरान जलडमरूमध्य को इज़रायली जहाजों के लिए बंद कर दिया गया जिसे इज़रायल ने अपने विरुद्ध युद्ध की घोषणा के समान माना। दूसरी ओर सीरिया और जॉर्डन ने भी इज़रायल के विरुद्ध सैन्य सहयोग बढ़ाया।
5 जून 1967 को इज़रायल ने पूर्व-आक्रमण (preemptive strike) की रणनीति अपनाते हुए मिस्र के हवाई अड्डों पर अचानक हमला किया। इस आक्रमण में मिस्र की वायुसेना को भारी क्षति पहुँची जिससे इज़रायल को आकाशीय नियंत्रण मिल गया। इसके बाद इज़रायली सेनाओं ने तीव्र गति से सिनाय प्रायद्वीप की ओर बढ़ते हुए मिस्री सेना को पीछे धकेल दिया। कुछ ही दिनों में सिनाय और गाज़ा पट्टी इज़रायल के नियंत्रण में आ गए।
पूर्वी मोर्चे पर जॉर्डन के साथ भी संघर्ष हुआ। इज़रायल ने पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) और पूर्वी येरुशलम पर कब्जा कर लिया। यह घटना ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि येरुशलम का पुराना शहर लंबे समय से विवाद का विषय रहा था। उत्तर में सीरिया के साथ भीषण लड़ाई के बाद इज़रायल ने गोलन पहाड़ियों पर अधिकार कर लिया जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
छः दिनों के भीतर युद्ध समाप्त हो गया और इज़रायल ने अपने क्षेत्रफल को लगभग तीन गुना बढ़ा लिया। उसने सिनाय प्रायद्वीप, गाज़ा पट्टी, पश्चिमी तट और सीरिया की गोलन चोटियों पर कब्जा कर लिया। इस विजय ने इज़रायल की सैन्य क्षमता को विश्व के सामने स्थापित किया किंतु साथ ही अरब देशों में गहरा असंतोष और अपमान की भावना भी उत्पन्न हुई।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 242 पारित किया जिसमें कब्जाए गए क्षेत्रों से इज़रायली वापसी और सभी राज्यों की संप्रभुता के सम्मान की बात कही गई। हालांकि, इन मुद्दों का स्थायी समाधान आज तक नहीं हो सका है।
छः दिवसीय युद्ध केवल एक सैन्य विजय नहीं था बल्कि यह मध्य-पूर्व के दीर्घकालिक संघर्षों की नई शुरुआत भी था। इसने क्षेत्रीय राजनीति, सुरक्षा चिंताओं और अरब–इज़रायल संबंधों को दशकों तक प्रभावित किया और आज भी उसके प्रभाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
योम किप्पर युद्ध
योम किप्पुर युद्ध 1973 ई., जिसे रमजान युद्ध या अक्टूबर युद्ध भी कहा जाता है, 6 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 1973 तक लड़ा गया एक महत्वपूर्ण अरब–इज़रायल संघर्ष था। यह युद्ध Israel और अरब देशों के गठबंधन, विशेषकर Egypt तथा Syria के बीच हुआ। 6 अक्टूबर का दिन यहूदियों का पवित्र पर्व योम किप्पुर था और इसी दिन मिस्र तथा सीरिया ने अचानक हमला कर दिया जिससे इज़रायल प्रारंभिक चरण में चौंक गया।
यह युद्ध मुख्यतः दो मोर्चों पर लड़ा गया दक्षिण में सिनाई प्रायद्वीप और उत्तर में गोलान पहाड़ियाँ। ये दोनों क्षेत्र 1967 के छह-दिवसीय युद्ध में इज़रायल द्वारा कब्जा किए गए थे। मिस्र का मुख्य उद्देश्य स्वेज नहर के पूर्वी तट पर अपनी सेना को स्थापित कर एक मजबूत आधार बनाना था ताकि शेष सिनाई की वापसी के लिए कूटनीतिक दबाव बनाया जा सके। 6 अक्टूबर को मिस्र की सेनाओं ने स्वेज नहर पार कर सफलतापूर्वक इज़रायली रक्षा पंक्तियों को तोड़ दिया। इसी समय सीरिया ने गोलान मोर्चे पर आक्रमण किया।
युद्ध के शुरुआती दिनों में अरब सेनाओं को उल्लेखनीय सफलता मिली। मिस्र ने नहर पार कर कई पुल बनाए और अपनी सेनाएँ पूर्वी तट पर उतार दीं। सीरिया ने भी गोलान क्षेत्र में बढ़त हासिल की। किंतु कुछ दिनों बाद इज़रायल ने अपने आरक्षित सैनिकों को संगठित कर पलटवार किया। गोलान मोर्चे पर इज़रायल ने सीरियाई सेना को पीछे धकेल दिया और दमिश्क के निकट तक पहुँच गया। दक्षिण में भी इज़रायली सेनाओं ने स्वेज नहर पार कर मिस्री तीसरी सेना को घेर लिया।
यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं था बल्कि शीत युद्ध की राजनीति से भी जुड़ा था। अमेरिका ने इज़रायल को सैन्य सहायता प्रदान की जबकि सोवियत संघ ने मिस्र और सीरिया का समर्थन किया। इससे वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ गया। अंततः संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से 22 अक्टूबर को युद्धविराम की घोषणा की गई जिसे कुछ दिनों बाद पूर्ण रूप से लागू किया गया।
युद्ध का परिणाम स्पष्ट विजय के रूप में किसी एक पक्ष के पक्ष में नहीं गया किंतु राजनीतिक दृष्टि से इसके प्रभाव महत्वपूर्ण रहे। मिस्र ने यह सिद्ध किया कि वह इज़रायल के विरुद्ध प्रभावी सैन्य कार्रवाई करने में सक्षम है जिससे उसके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई। यही युद्ध आगे चलकर मिस्र और इज़रायल के बीच शांति वार्ता की पृष्ठभूमि बना जिसके परिणामस्वरूप 1978 का कैंप डेविड समझौता संभव हुआ और सिनाई प्रायद्वीप अंततः मिस्र को लौटा दिया गया।
ईरान-इराक युद्ध
ईरान और इराक़ के बीच 1980 से 1988 तक चला युद्ध बीसवीं शताब्दी के सबसे लंबी अवधि के पारंपरिक युद्धों में से एक था। यह संघर्ष मुख्यतः सीमा-विवाद और क्षेत्रीय प्रभुत्व की महत्वाकांक्षा से उत्पन्न हुआ। दोनों देशों के बीच शत्त-अल-अरब जलमार्ग को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। 1975 की अल्जीयर्स संधि के माध्यम से सीमा विवाद को सुलझाने का प्रयास किया गया था किंतु इराक़ इस समझौते से संतुष्ट नहीं था।
1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई जिसके परिणामस्वरूप शाह का शासन समाप्त हुआ और Ruhollah Khomeini के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। क्रांति के तुरंत बाद ईरान राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अस्थिर स्थिति में था। इराक़ के राष्ट्रपति Saddam Hussein ने इसे अवसर के रूप में देखा और सितंबर 1980 में ईरान पर आक्रमण कर दिया। उनका उद्देश्य सीमा विवाद का समाधान अपने पक्ष में करना और क्षेत्र में इराक़ की शक्ति को स्थापित करना था।
युद्ध के प्रारंभिक चरण में इराक़ी सेना ने ईरान के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया किंतु शीघ्र ही ईरान ने प्रतिरोध संगठित किया और पलटवार किया। युद्ध धीरे-धीरे स्थिर मोर्चों और लंबी खाइयों वाले संघर्ष में बदल गया जिसमें भारी जन-धन की हानि हुई। दोनों पक्षों ने रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता उत्पन्न हुई। यह संघर्ष “टैंकर युद्ध” के रूप में भी जाना गया क्योंकि फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों को निशाना बनाया गया।
युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों ने औपचारिक रूप से स्वयं को तटस्थ बताया किंतु हथियारों और सैन्य सामग्री के माध्यम से इराक़ को सहायता दी गई। दूसरी ओर, ईरान को भी विभिन्न स्रोतों से अप्रत्यक्ष समर्थन मिला। इस संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ा दी। लेबनान में शिया संगठन Hezbollah का उदय इसी व्यापक क्षेत्रीय उथल-पुथल के संदर्भ में हुआ जो आगे चलकर मध्य-पूर्व की राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति बना।
आठ वर्षों तक चले इस भीषण युद्ध में लाखों सैनिक और नागरिक मारे गए या घायल हुए। आर्थिक दृष्टि से दोनों देशों को भारी क्षति उठानी पड़ी। अंततः 1988 में संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम लागू हुआ। युद्ध का कोई स्पष्ट विजेता नहीं था; सीमा लगभग युद्ध-पूर्व स्थिति में ही रही। इस प्रकार यह संघर्ष अनिर्णीत समाप्त हुआ।
ईरान–इराक़ युद्ध ने क्षेत्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। इसने इराक़ को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1990 में कुवैत पर आक्रमण और खाड़ी युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई। वहीं ईरान ने अपनी क्रांतिकारी पहचान को सुदृढ़ किया और क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखा। यह युद्ध आज भी मध्य-पूर्व की अस्थिरता और शक्ति-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
खाड़ी युद्ध
खाड़ी युद्ध 1991 ई. उस समय प्रारंभ हुआ जब Iraq ने 2 अगस्त 1990 को कुवैत पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। इराक़ के राष्ट्रपति Saddam Hussein ने कुवैत पर तेल उत्पादन को लेकर विवाद और आर्थिक कारणों का हवाला देते हुए यह कदम उठाया। कुवैत पर कब्ज़े के साथ ही इराक़ ने उसे अपना 19वां प्रांत घोषित कर दिया। इस आक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चिंतित कर दिया क्योंकि इससे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक तेल आपूर्ति दोनों पर खतरा उत्पन्न हो गया।
संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ की कार्रवाई की निंदा की और उसे कुवैत से तुरंत सेना हटाने का आदेश दिया। जब इराक़ ने इस निर्देश की अवहेलना की तब संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में 39 देशों का एक सैन्य गठबंधन गठित किया गया। यह गठबंधन संयुक्त राष्ट्र द्वारा अधिकृत था और इसका उद्देश्य इराकी सेना को कुवैत से बाहर निकालना था। इस व्यापक सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ के नाम से जाना गया।
जनवरी 1991 में गठबंधन सेनाओं ने हवाई हमलों की शुरुआत की। इराक़ के सैन्य ठिकानों, संचार नेटवर्क और रक्षा प्रणाली को लक्षित किया गया। आधुनिक तकनीक और सटीक हथियारों के प्रयोग ने इस युद्ध को तकनीकी दृष्टि से अत्यंत उन्नत बना दिया। कुछ ही सप्ताहों में इराक़ की सैन्य क्षमता कमजोर पड़ गई। इसके बाद फरवरी 1991 में जमीनी अभियान शुरू हुआ जिसमें गठबंधन बलों ने तीव्र गति से कुवैत को मुक्त करा लिया।
युद्ध लगभग छह सप्ताह में समाप्त हो गया। इराक़ी सेना को भारी नुकसान हुआ और उसे कुवैत से पीछे हटना पड़ा। इस संघर्ष को कभी-कभी “प्रथम खाड़ी युद्ध” भी कहा जाता है क्योंकि इसके बाद 2003 में इराक़ के विरुद्ध एक और बड़ा युद्ध हुआ। सद्दाम हुसैन ने इसे “सभी युद्धों की माँ” कहा था किंतु परिणाम उसके विपरीत रहा।
यद्यपि सैन्य दृष्टि से गठबंधन को शीघ्र सफलता मिली परंतु युद्ध के बाद क्षेत्र में अस्थिरता बनी रही। इराक़ पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और उसकी सैन्य शक्ति को सीमित कर दिया गया। इस युद्ध ने मध्य-पूर्व की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया और अमेरिका की वैश्विक सैन्य नेतृत्व की भूमिका को सुदृढ़ किया।
इस प्रकार 1991 का खाड़ी युद्ध केवल कुवैत की मुक्ति का अभियान नहीं था बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, सामूहिक सुरक्षा और आधुनिक युद्धक तकनीक का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना। इसके प्रभाव आज भी मध्य-पूर्व की राजनीति और वैश्विक कूटनीति में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
अमेरिका-अफगानिस्तान युद्ध
अमेरिका–अफगानिस्तान युद्ध 2001 में प्रारंभ हुआ और लगभग दो दशकों तक चला जिसे अमेरिका के इतिहास का सबसे लंबा युद्ध माना जाता है। 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हुए आतंकी हमलों के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति George W. Bush ने आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक अभियान की घोषणा की। इन हमलों के लिए जिम्मेदार संगठन अल-कायदा को अफगानिस्तान में शरण देने का आरोप Taliban शासन पर लगाया गया।
अक्टूबर 2001 में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के तहत अफगानिस्तान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। प्रारंभिक चरण में तालिबान शासन शीघ्र ही गिर गया और काबुल सहित प्रमुख शहरों पर अमेरिका समर्थित बलों का नियंत्रण स्थापित हो गया। किंतु इसके बाद संघर्ष गुरिल्ला युद्ध के रूप में जारी रहा जिसमें तालिबान ने पुनर्गठन कर अमेरिकी और अफगान सरकारी बलों के विरुद्ध लंबे समय तक लड़ाई जारी रखी।
इस युद्ध में अमेरिका को भारी मानवीय और आर्थिक लागत चुकानी पड़ी। लगभग 7,000 अमेरिकी सैनिक मारे गए और 50,000 से अधिक घायल हुए। इसके अतिरिक्त अफगान नागरिकों और सुरक्षा बलों की भी बड़ी संख्या में जानें गईं। आर्थिक दृष्टि से भी यह युद्ध अत्यंत महंगा सिद्ध हुआ। अमेरिका पर कुल राष्ट्रीय ऋण का एक बड़ा हिस्सा अफगान युद्ध से संबंधित खर्चों से जुड़ा रहा जो खरबों डॉलर के बराबर था।
युद्ध केवल सैन्य अभियान तक सीमित नहीं था; इसमें राष्ट्र-निर्माण, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना और सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण का प्रयास भी शामिल था। किंतु लगातार अस्थिरता, भ्रष्टाचार और विद्रोही हमलों के कारण स्थायी शांति स्थापित करना कठिन सिद्ध हुआ। 2019 एक प्रतीकात्मक वर्ष माना गया क्योंकि 9/11 के बाद जन्मा कोई अमेरिकी युवा सेना में भर्ती होकर अफगानिस्तान में सेवा दे सकता था। यह दर्शाता है कि यह संघर्ष कितनी लंबी अवधि तक चला।
फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ, जिसके बाद अमेरिकी सेनाओं की वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही तालिबान ने पुनः अफगानिस्तान पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस प्रकार लगभग बीस वर्षों के बाद युद्ध का समापन हुआ किंतु इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव आज भी क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देते हैं।
अमेरिका–अफगानिस्तान युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, वैश्विक सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप की नीतियों पर गहरा प्रभाव डाला। यह युद्ध आधुनिक इतिहास में एक ऐसे संघर्ष के रूप में दर्ज है, जिसने शक्ति, धैर्य और कूटनीति की सीमाओं को उजागर किया तथा यह दिखाया कि सैन्य विजय के बाद भी स्थायी शांति स्थापित करना कितना जटिल कार्य है।
द्वितीय खाड़ी युद्ध
द्वितीय खाड़ी युद्ध 2003 ई. में अमेरिका और इराक के बीच लड़ा गया एक प्रमुख सैन्य संघर्ष था जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। यह युद्ध 20 मार्च से 1 मई 2003 तक के आक्रमण चरण के साथ प्रारंभ हुआ और इराक युद्ध की औपचारिक शुरुआत का संकेत बना। इस अभियान का नेतृत्व United States ने किया जिसमें United Kingdom, Australia और Poland की सेनाएँ भी शामिल थीं। इस सैन्य कार्रवाई को “ऑपरेशन इराकी फ्रीडम” नाम दिया गया।
इस युद्ध की पृष्ठभूमि में यह आरोप था कि इराक के राष्ट्रपति Saddam Hussein के पास व्यापक विनाश के हथियार (WMD) हैं और उनका शासन आतंकवादी संगठनों को समर्थन दे रहा है। अमेरिका ने तर्क दिया कि वैश्विक सुरक्षा के हित में इराकी शासन को हटाना आवश्यक है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के भीतर इस मुद्दे पर व्यापक मतभेद थे और कई देशों ने इस सैन्य हस्तक्षेप का विरोध किया।
आक्रमण की शुरुआत “शॉक एंड ऑ” नामक व्यापक हवाई हमलों से हुई जिनका उद्देश्य इराकी सैन्य क्षमता और संचार तंत्र को शीघ्र ही निष्क्रिय करना था। इसके बाद जमीनी सेना ने कुवैत से इराक की ओर बढ़ते हुए तीव्र गति से राजधानी बगदाद की ओर प्रगति की। लगभग 21 दिनों के भीतर गठबंधन सेनाओं ने बगदाद पर कब्जा कर लिया। अप्रैल 2003 में सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराया जाना इस शासन के अंत का प्रतीक बना।
1 मई 2003 को अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रमुख सैन्य अभियान की समाप्ति की घोषणा की। यद्यपि प्रारंभिक सैन्य चरण शीघ्र समाप्त हो गया परंतु इसके बाद इराक में लंबे समय तक विद्रोह, सांप्रदायिक हिंसा और अस्थिरता बनी रही। सद्दाम हुसैन को बाद में गिरफ्तार किया गया और 2006 में उन्हें मृत्युदंड दिया गया।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप इराक की बाथ पार्टी की सरकार का अंत हो गया और देश में राजनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। किंतु शासन परिवर्तन के बाद उत्पन्न सत्ता-शून्यता ने उग्रवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया। क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन भी प्रभावित हुआ और मध्य-पूर्व में अस्थिरता की नई लहर देखी गई।
द्वितीय खाड़ी युद्ध केवल एक सैन्य अभियान नहीं था बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, सुरक्षा नीति और वैश्विक राजनीति में गहरे विवाद का विषय बन गया। व्यापक विनाश के हथियारों के दावों की पुष्टि न होने से इस हस्तक्षेप की वैधता पर भी प्रश्न उठे। इस प्रकार 2003 का इराक युद्ध आधुनिक इतिहास में एक ऐसे संघर्ष के रूप में दर्ज है जिसने सत्ता परिवर्तन तो किया परंतु स्थायी शांति स्थापित करने की चुनौती को और जटिल बना दिया।
