छऊ नृत्य के तीन प्रमुख उपप्रकार हैं पुरुलिया छऊ, मयूरभंज छऊ और सरायकेला छऊ। इन तीनों शैलियों में समान मूल तत्व होने के बावजूद शैली, वेशभूषा, मुखौटे, प्रस्तुति और नृत्य तकनीक में उल्लेखनीय अंतर पाया जाता है। यही विविधता इसे और अधिक आकर्षक बनाती है।
छऊ नृत्य का उद्भव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
छऊ नृत्य की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों के बीच विभिन्न मत हैं किंतु सामान्यतः यह माना जाता है कि इसका विकास प्राचीन युद्धकला, लोक परंपरा और धार्मिक अनुष्ठानों से हुआ है। “छऊ” शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के “छाया” या “छद्म” शब्द से मानी जाती है जिसका अर्थ है आवरण या मुखौटा।
यह नृत्य विशेष रूप से चैत्र पर्व और रामनवमी के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं के साथ-साथ लोककथाओं और प्रकृति आधारित विषयों को भी दर्शाया जाता है।
सन् 2010 में यूनेस्को ने छऊ नृत्य को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और भी बढ़ गई।
छऊ नृत्य की सामान्य विशेषताएँ
- वीर रस प्रधान प्रस्तुति
- युद्धकला और मार्शल आर्ट से प्रेरित गतियाँ
- शक्तिशाली शारीरिक मुद्राएँ
- ढोल, धुमसा, शहनाई आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग
- मुखौटों और आकर्षक वेशभूषा का उपयोग (कुछ शैलियों में)
हालाँकि तीनों उपप्रकारों में इन विशेषताओं की अभिव्यक्ति अलग-अलग रूप में देखने को मिलती है।
पुरुलिया छऊ
पुरुलिया छऊ का संबंध पश्चिम बंगाल के Purulia जिले से है। यह शैली अपनी रंग-बिरंगी वेशभूषा और विशाल मुखौटों के लिए प्रसिद्ध है।
प्रमुख विशेषताएँ
- बड़े और आकर्षक मुखौटे
- अत्यंत रंगीन और भव्य पोशाक
- ऊर्जावान और उछाल भरी गतियाँ
- पौराणिक कथाओं का मंचन
पुरुलिया छऊ में कलाकार भारी और अलंकृत मुखौटे पहनते हैं जो देवताओं, राक्षसों और पशु-पक्षियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन मुखौटों को स्थानीय कारीगरों द्वारा विशेष तकनीक से बनाया जाता है।
विषय-वस्तु:
- रामायण, महाभारत, दुर्गा पूजा, महिषासुर मर्दिनी आदि कथाएँ प्रमुख रूप से प्रस्तुत की जाती हैं।
मयूरभंज छऊ
मयूरभंज छऊ का संबंध ओडिशा राज्य के Mayurbhanj जिले से है।
प्रमुख विशेषताएँ
- मुखौटे का प्रयोग नहीं
- चेहरे की अभिव्यक्ति का विशेष महत्व
- शास्त्रीय नृत्य तत्वों का समावेश
- संतुलित और नियंत्रित गतियाँ
यह शैली अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत और शास्त्रीय प्रभाव वाली मानी जाती है। यहाँ कलाकार चेहरे के भावों और शरीर की मुद्राओं से भाव व्यक्त करते हैं।
विषय-वस्तु
- यहाँ पौराणिक कथाओं के साथ-साथ प्रकृति, जनजीवन और सामाजिक विषयों को भी स्थान दिया जाता है।
सरायकेला छऊ
सरायकेला छऊ झारखंड के Seraikela क्षेत्र से संबंधित है।
प्रमुख विशेषताएँ
- छोटे और सरल मुखौटे
- सूक्ष्म और नियंत्रित गतियाँ
- शांति और संतुलन पर आधारित प्रस्तुति
- भावों की आंतरिक अभिव्यक्ति
सरायकेला शैली में मुखौटे अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और चेहरे के भावों को आंशिक रूप से छिपाते हैं, जिससे शरीर की मुद्राओं के माध्यम से भाव प्रकट किए जाते हैं।
तीनों शैलियों की तुलनात्मक विशेषताएँ
सबसे पहले यदि मुखौटों की बात करें तो पुरुलिया छऊ में बड़े, आकर्षक और अत्यंत रंगीन मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। ये मुखौटे देवताओं, राक्षसों और पौराणिक पात्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और नृत्य को भव्य रूप प्रदान करते हैं। इसके विपरीत मयूरभंज छऊ में मुखौटे का प्रयोग नहीं किया जाता। यहाँ कलाकार अपने चेहरे की अभिव्यक्तियों, नेत्रों और शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से भावों को व्यक्त करते हैं। सरायकेला छऊ में मुखौटे का उपयोग होता है लेकिन ये आकार में छोटे और अपेक्षाकृत सरल होते हैं जिससे कलाकार शरीर की गतियों के माध्यम से सूक्ष्म भाव अभिव्यक्त कर पाते हैं।
गतियों की दृष्टि से पुरुलिया शैली अत्यंत ऊर्जावान और उछाल भरी होती है। इसमें कलाकार तेज छलाँगें, घुमाव और वीरता से भरी मुद्राएँ प्रस्तुत करते हैं। मयूरभंज छऊ की गतियाँ नियंत्रित और संतुलित होती हैं जिनमें शास्त्रीय नृत्य तत्वों का प्रभाव दिखाई देता है। वहीं सरायकेला शैली में गतियाँ अधिक संतुलित और संयमित होती हैं जिनमें लय और आंतरिक भाव की प्रधानता रहती है।
प्रभाव के स्तर पर भी तीनों शैलियाँ अलग-अलग पहचान रखती हैं। पुरुलिया छऊ मुख्यतः लोकप्रधान है, जिसमें ग्रामीण जीवन और लोक आस्था की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। मयूरभंज छऊ में शास्त्रीय प्रभाव अधिक दिखाई देता है जिससे इसकी प्रस्तुति अपेक्षाकृत परिष्कृत और संरचित लगती है। सरायकेला छऊ सूक्ष्म अभिव्यक्ति पर आधारित है जहाँ भावों को अत्यंत नियंत्रित और कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।
भौगोलिक दृष्टि से भी तीनों शैलियाँ अलग-अलग राज्यों से संबंधित हैं। पुरुलिया छऊ पश्चिम बंगाल से जुड़ी है, मयूरभंज छऊ ओडिशा की परंपरा का हिस्सा है जबकि सरायकेला छऊ झारखंड से संबंधित है।
वाद्य यंत्र और संगीत
छऊ नृत्य में मुख्यतः ढोल, नगाड़ा, धुमसा और शहनाई का प्रयोग होता है। संगीत तेज और ऊर्जावान होता है जो नर्तकों की गतियों के साथ तालमेल बनाता है।
प्रशिक्षण और परंपरा
छऊ नृत्य का प्रशिक्षण गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से दिया जाता है। कलाकार वर्षों तक कठिन अभ्यास करते हैं। इसमें शारीरिक शक्ति, लचीलापन और संतुलन की आवश्यकता होती है।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
- लोक संस्कृति का संरक्षण
- सामुदायिक एकता का प्रतीक
- युवाओं में परंपरा के प्रति जागरूकता
- पर्यटन को बढ़ावा
इस प्रश्न का महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य ज्ञान (GK) की दृष्टि से “पुरुलिया, मयूरभंज, सरायकेला किस नृत्य के उपप्रकार हैं?” यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका सही उत्तर है कि ये तीनों Chhau dance (छऊ नृत्य) के उपप्रकार हैं। यह प्रश्न भारतीय कला एवं संस्कृति से संबंधित परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है विशेषकर SSC, रेलवे, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग (PCS), UPSC, TET, CTET, पुलिस भर्ती, तथा अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में।
कई बार प्रश्न इस प्रकार भी पूछा जाता है “छऊ नृत्य के कितने प्रमुख उपप्रकार हैं?”, “मयूरभंज छऊ किस राज्य से संबंधित है?”, “किस छऊ शैली में मुखौटे का प्रयोग नहीं होता?” आदि। यदि अभ्यर्थी को यह मूल तथ्य ज्ञात है कि पुरुलिया, मयूरभंज और सरायकेला छऊ नृत्य की शैलियाँ हैं तो वह संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर आसानी से दे सकता है।
परीक्षाओं में राज्य-नृत्य मिलान (Match the Following) प्रकार के प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। उदाहरण के लिए “सरायकेला छऊ किस राज्य से संबंधित है?” या “पुरुलिया छऊ की विशेषता क्या है?”
अक्सर एक अंक का छोटा सा प्रश्न चयन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसे सांस्कृतिक तथ्यों का स्पष्ट ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। भारतीय कला एवं संस्कृति से जुड़े प्रश्न अब केवल वैकल्पिक विषय तक सीमित नहीं रहे बल्कि लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
