इसी शास्त्रीय परंपरा में केरल की प्रसिद्ध नृत्य-नाट्य शैली कथकली का स्थान विशिष्ट है। कथकली में हस्तमुद्राओं का प्रयोग अत्यंत विकसित, जटिल और शास्त्रीय है। कथकली की इसी हस्तपरंपरा को व्यवस्थित, परिभाषित और मानकीकृत करने वाली अमूल्य शास्त्रीय कृति है हस्तलक्षण दीपिका। यह ग्रंथ कथकली नृत्य में प्रयुक्त हस्तमुद्राओं का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
कथकली : परिचय
कथकली केरल की एक शास्त्रीय नृत्य-नाट्य शैली है जिसका विकास मुख्यतः 17वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। यह शैली महाकाव्यात्मक कथाओं विशेषकर रामायण और महाभारत पर आधारित है। कथकली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- भव्य एवं प्रतीकात्मक वेशभूषा
- विस्तृत मुखाभिनय (Facial Expressions)
- नेत्राभिनय (Eye Movements)
- हस्तमुद्राओं का सुस्पष्ट प्रयोग
- नाट्य और नृत्य का समन्वय
कथकली में संवाद बोले नहीं जाते बल्कि हस्तमुद्राओं और मुखाभिनय के माध्यम से कथा प्रस्तुत की जाती है। यही कारण है कि हस्तमुद्राओं का शास्त्रीय ज्ञान कथकली के लिए अनिवार्य है।
‘हस्तलक्षण दीपिका’ : नाम और अर्थ
‘हस्तलक्षण दीपिका’ तीन शब्दों से मिलकर बना है:
- हस्त : हाथ
- लक्षण : पहचान, गुण या संकेत
- दीपिका : प्रकाश डालने वाला, स्पष्ट करने वाला
इस प्रकार ‘हस्तलक्षण दीपिका’ का शाब्दिक अर्थ हुआ:
- “हाथों के संकेतों को प्रकाशित या स्पष्ट करने वाला ग्रंथ”।
यह नाम ही इस कृति के उद्देश्य को स्पष्ट कर देता है कि यह ग्रंथ हस्तमुद्राओं की परिभाषा, प्रयोग और अर्थ को विस्तार से समझाता है।
‘हस्तलक्षण दीपिका’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रचना काल
- विद्वानों के अनुसार ‘हस्तलक्षण दीपिका’ की रचना 16वीं–17वीं शताब्दी के मध्य मानी जाती है। यह वही कालखंड है जब कथकली अपने शास्त्रीय रूप में विकसित हो रही थी।
भाषा
- यह ग्रंथ मूलतः संस्कृत और मणिप्रवाळम् (संस्कृत-मलयालम मिश्रित भाषा) में रचित माना जाता है ताकि इसे विद्वान तथा कलाकार दोनों आसानी से समझ सकें।
उद्देश्य
- इस कृति का प्रमुख उद्देश्य था:
- कथकली में प्रयुक्त हस्तमुद्राओं को मानकीकृत करना
- कलाकारों के लिए संदर्भ-ग्रंथ प्रदान करना
- मौखिक परंपरा को लिखित शास्त्र का रूप देना
कथकली में हस्तमुद्राओं का महत्व
कथकली एक मूक नाट्य शैली है। इसमें:
- संवाद नहीं बोले जाते
- कथा का संप्रेषण हाथों और चेहरे के भावों से होता है
इसलिए कथकली में हस्तमुद्राएँ:
- शब्दों का स्थान लेती हैं
- कथा को आगे बढ़ाती हैं
- पात्रों की भावनाओं को व्यक्त करती हैं
‘हस्तलक्षण दीपिका’ इसी संप्रेषण प्रणाली की आधारशिला है।
‘हस्तलक्षण दीपिका’ की संरचना
यह ग्रंथ व्यवस्थित रूप से हस्तमुद्राओं का वर्णन करता है। इसकी प्रमुख संरचनात्मक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- मुद्राओं की परिभाषा
- हाथों की स्थिति (Finger Positions)
- मुद्राओं के नाम
- प्रत्येक मुद्रा का अर्थ
- नाट्य प्रयोग में उपयोग
ग्रंथ में वर्णित प्रत्येक मुद्रा को व्यावहारिक दृष्टि से समझाया गया है।
‘हस्तलक्षण दीपिका’ में वर्णित हस्तमुद्राएँ
इस ग्रंथ में कथकली में प्रयुक्त लगभग 24 मूल हस्तमुद्राओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। ये मुद्राएँ विभिन्न अर्थों को व्यक्त करती हैं:
- व्यक्ति
- वस्तु
- भाव
- क्रिया
- प्रकृति
उदाहरण के लिए:
- पटक मुद्रा
- मुद्राख्यम्
- कपित्थम्
- चंद्रकला
इन मुद्राओं के संयोजन से सैकड़ों अर्थ व्यक्त किए जा सकते हैं।
कथकली और ‘नाट्यशास्त्र’ का संबंध
भरतमुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ भारतीय नृत्य-नाट्य परंपरा का मूल ग्रंथ है। ‘हस्तलक्षण दीपिका’:
- नाट्यशास्त्र की परंपरा का विस्तार है
- कथकली के संदर्भ में उसका स्थानीय अनुप्रयोग प्रस्तुत करता है
जहाँ नाट्यशास्त्र सभी नृत्य शैलियों के लिए सामान्य नियम देता है वहीं ‘हस्तलक्षण दीपिका’ विशेष रूप से कथकली के लिए हस्तमुद्राओं को परिभाषित करती है।
कथकली प्रशिक्षण में ‘हस्तलक्षण दीपिका’ की भूमिका
कथकली के पारंपरिक गुरुकुलों (कलारियों) में:
- इस ग्रंथ का अध्ययन अनिवार्य माना जाता है
- शिष्य पहले हस्तमुद्राएँ सीखता है फिर अभिनय
आज भी केरल के प्रमुख कथकली संस्थानों में ‘हस्तलक्षण दीपिका’ को मूल पाठ्य-ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है।
सांस्कृतिक और शास्त्रीय महत्व
‘हस्तलक्षण दीपिका’ केवल एक तकनीकी ग्रंथ नहीं बल्कि:
- भारतीय सांकेतिक भाषा की धरोहर
- कला और दर्शन का संगम
- लोक परंपरा और शास्त्र का सेतु
यह ग्रंथ सिद्ध करता है कि भारतीय नृत्य परंपरा वैज्ञानिक, तर्कसंगत और अत्यंत विकसित रही है।
आधुनिक काल में प्रासंगिकता
आज के समय में:
- कथकली अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत की जाती है
- विदेशी छात्र कथकली सीखते हैं
ऐसे में ‘हस्तलक्षण दीपिका’:
- कथकली की प्रामाणिकता बनाए रखती है
- गलत या विकृत प्रयोग से बचाती है
- शास्त्रीय अनुशासन को सुरक्षित रखती है
