असम का सत्त्रिया नृत्य किस आंदोलन से प्रेरित है?

Sanjay Yadav
असम का सत्त्रिया नृत्य भक्ति आंदोलन से प्रेरित है। भारत की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। यहाँ प्रत्येक क्षेत्र ने अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट कला-परंपराओं को जन्म दिया है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा इसी सांस्कृतिक विविधता का उत्कृष्ट उदाहरण है। भरतनाट्यम, कथक, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम जैसे नृत्यों की श्रृंखला में सत्त्रिया नृत्य का स्थान विशेष है। यह नृत्य असम की धरती पर विकसित हुआ और इसका मूल आधार भक्ति आंदोलन विशेषतः वैष्णव भक्ति परंपरा है।

असम का सत्त्रिया नृत्य भक्ति आंदोलन से प्रेरित है।

सत्त्रिया नृत्य केवल एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक साधना, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक चेतना का सजीव रूप है। इसका जन्म मंदिरों या राजदरबारों में नहीं बल्कि सत्त्रों (वैष्णव मठों) में हुआ जहाँ भक्ति, अनुशासन और सामूहिक जीवन का समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि सत्त्रिया नृत्य की आत्मा में भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक शुद्धता समाहित है।

असम की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

असम पूर्वोत्तर भारत का एक प्रमुख राज्य है जिसकी संस्कृति में आर्य, मंगोलॉयड, तिब्बती-बर्मी और स्थानीय जनजातीय तत्वों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है। ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में विकसित असम की सभ्यता प्राचीन काल से ही धार्मिक सहिष्णुता, लोक परंपराओं और कला-संगीत के लिए प्रसिद्ध रही है।

असम में शैव, शक्त और वैष्णव परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। किंतु 15वीं–16वीं शताब्दी में वैष्णव भक्ति आंदोलन ने यहाँ गहरा प्रभाव डाला। इसी आंदोलन की गोद में सत्त्रिया नृत्य का जन्म हुआ।

भक्ति आंदोलन: परिचय

भक्ति आंदोलन भारत में मध्यकालीन धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक था। इसका मूल उद्देश्य था:
  • ईश्वर के प्रति निष्काम भक्ति
  • जाति-भेद और कर्मकांड का विरोध
  • सरल भाषा में धर्म का प्रचार
  • सामाजिक समानता और नैतिकता पर बल
दक्षिण भारत से आरंभ होकर यह आंदोलन उत्तर और पूर्व भारत तक फैला। असम में इसका रूप विशेष रूप से एकशरण नाम-धर्म के रूप में सामने आया।

श्रीमंत शंकरदेव और वैष्णव भक्ति परंपरा

असम में भक्ति आंदोलन के सबसे महान प्रवर्तक श्रीमंत शंकरदेव थे। वे संत, कवि, नाटककार, संगीतज्ञ, समाज सुधारक और महान दार्शनिक थे। उन्होंने एकशरण नाम-धर्म का प्रतिपादन किया जिसका सार था:
  • “एक ईश्वर (भगवान विष्णु/कृष्ण) की शरण में जाकर नाम-स्मरण और भक्ति करना।”
शंकरदेव ने भक्ति को आम जनता तक पहुँचाने के लिए नाटक (अंकिया नाट), भजन (बरगीत), नृत्य और कथात्मक प्रस्तुति का सहारा लिया। यही प्रयास आगे चलकर सत्त्रिया नृत्य के रूप में विकसित हुआ।

सत्त्र (Sattra) की अवधारणा

सत्त्र वैष्णव मठ या आश्रम होते हैं जिनकी स्थापना शंकरदेव और उनके शिष्यों ने की। ये सत्त्र केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे बल्कि:
  • शिक्षा के केंद्र
  • कला और संस्कृति के संरक्षण स्थल
  • सामाजिक सुधार के मंच
  • संगीत, नृत्य और नाटक के प्रशिक्षण संस्थान
सत्त्रों में रहने वाले भिक्षुओं को भकत कहा जाता था। इन्हीं भकतों द्वारा सत्त्रिया नृत्य का अभ्यास और प्रदर्शन किया जाता था।

सत्त्रिया नृत्य की उत्पत्ति

सत्त्रिया नृत्य का जन्म धार्मिक अनुष्ठान के रूप में हुआ। प्रारंभ में यह नृत्य केवल:
  • कृष्ण-लीला
  • राम-कथा
  • विष्णु-भक्ति
  • भागवत पुराण की कथाओं पर आधारित था। 
इसे सत्त्रों के भीतर विशेष पर्वों और उत्सवों पर प्रस्तुत किया जाता था। बाहरी समाज में इसका प्रदर्शन वर्जित था।

भक्ति आंदोलन और सत्त्रिया नृत्य का संबंध

ईश्वर-केन्द्रित विषयवस्तु
  • सत्त्रिया नृत्य की कथाएँ पूरी तरह से भगवान कृष्ण और विष्णु के जीवन, लीलाओं और गुणों पर आधारित हैं। यह भक्ति आंदोलन की उस परंपरा का अनुसरण करता है जिसमें ईश्वर को सगुण, साकार और करुणामय माना गया।
नाम-स्मरण और नृत्य
  • भक्ति आंदोलन में नाम-जप का विशेष महत्व था। सत्त्रिया नृत्य में ताल, लय और गति के साथ नाम-स्मरण होता है जिससे भक्ति भाव और गहरा हो जाता है।
कर्मकांड का विरोध
  • सत्त्रिया नृत्य में जटिल यज्ञ या अनुष्ठान नहीं बल्कि सरल भाव-प्रस्तुति है। यह भक्ति आंदोलन के उस सिद्धांत को दर्शाता है जिसमें आडंबर के स्थान पर भाव को महत्व दिया गया।
सामाजिक समरसता
  • भक्ति आंदोलन की तरह सत्त्रिया परंपरा में भी जाति-भेद को कम महत्व दिया गया। सत्त्रों में सामूहिक जीवन और सामूहिक भक्ति का आदर्श अपनाया गया।

सत्त्रिया नृत्य की शास्त्रीय विशेषताएँ

यद्यपि सत्त्रिया नृत्य का जन्म धार्मिक परिवेश में हुआ फिर भी इसमें शास्त्रीय नृत्य के सभी प्रमुख तत्व मौजूद हैं:

नृत्य, नृत्य और नाट्य का समन्वय
  • नृत्य – शुद्ध शारीरिक गतियाँ
  • नृत्य – भावाभिव्यक्ति
  • नाट्य – कथा और अभिनय
हस्त-मुद्राएँ
  • सत्त्रिया में संस्कृत नाट्यशास्त्र से प्रेरित अनेक हस्त-मुद्राओं का प्रयोग होता है जिनसे कथा को स्पष्ट किया जाता है।
भाव (रस)
  • भक्ति रस
  • श्रृंगार रस (कृष्ण-भक्ति में)
  • करुण रस
संगीत
  • सत्त्रिया नृत्य में प्रयुक्त संगीत बरगीत पर आधारित होता है जिनकी रचना शंकरदेव और माधवदेव ने की।

सत्त्रिया नृत्य के प्रमुख रूप

पुरुष सत्त्रिया (भकत नृत्य)
  • यह रूप अधिक ऊर्जावान और तालात्मक होता है। इसमें वीर रस और शक्ति का प्रदर्शन होता है।
स्त्री सत्त्रिया
  • आधुनिक काल में विकसित यह रूप कोमल, भावप्रधान और लास्य-युक्त होता है।

वेशभूषा और आभूषण

सत्त्रिया नृत्य की वेशभूषा सादगी और पवित्रता का प्रतीक है:
  • श्वेत या क्रीम रंग की पोशाक
  • पारंपरिक असमिया आभूषण
  • हल्का श्रृंगार
यह सादगी भी भक्ति आंदोलन की उस भावना को दर्शाती है जिसमें आडंबर से दूर रहकर ईश्वर की उपासना की जाती है।

सत्त्रिया नृत्य और अंकिया नाट

अंकिया नाट शंकरदेव द्वारा रचित एकांकी नाटक हैं जिनमें संवाद, गीत, नृत्य और अभिनय का सुंदर समन्वय होता है। सत्त्रिया नृत्य इन्हीं नाटकों का अभिन्न अंग है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्त्रिया केवल नृत्य नहीं बल्कि एक संपूर्ण नाट्य परंपरा है।

आधुनिक काल में सत्त्रिया नृत्य

लंबे समय तक सत्त्रिया नृत्य सत्त्रों तक सीमित रहा। किंतु 20वीं शताब्दी में इसे मंचीय रूप मिला और:

भक्ति आंदोलन की निरंतर छाया

आज भी, जब सत्त्रिया नृत्य आधुनिक मंचों पर प्रस्तुत होता है तब भी इसकी आत्मा में भक्ति आंदोलन की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। विषय, संगीत, भाव और प्रस्तुति सबमें ईश्वर-समर्पण की भावना निहित रहती है।

सत्त्रिया नृत्य का सांस्कृतिक महत्व

  • असम की सांस्कृतिक पहचान
  • भक्ति आंदोलन की जीवंत विरासत
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में विशिष्ट योगदान
  • कला और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय

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