यह गुण ही अर्धचालकों को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की रीढ़ बनाता है। कंप्यूटर, मोबाइल फोन, रेडियो, टेलीविजन, सौर सेल, ट्रांजिस्टर, डायोड, माइक्रोप्रोसेसर इन सभी उपकरणों का आधार अर्धचालक पदार्थ हैं।
अर्धचालक क्या हैं?
अर्धचालक वे पदार्थ हैं जिनकी विद्युत चालकता चालक और अचालक के बीच होती है। ये सामान्य तापमान पर सीमित मात्रा में विद्युत धारा का प्रवाह करते हैं।
सबसे प्रमुख अर्धचालक तत्व हैं:
- Silicon
- Germanium
इन दोनों तत्वों की परमाणु संरचना में बाह्य कक्षा (Valence Shell) में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। यही चार संयोजक इलेक्ट्रॉन (Valence Electrons) सहसंयोजक बंध (Covalent Bond) बनाकर एक क्रिस्टलीय संरचना तैयार करते हैं।
चालकता की मूल अवधारणा
विद्युत चालकता इस बात पर निर्भर करती है कि किसी पदार्थ में मुक्त आवेश वाहकों (Charge Carriers) की संख्या कितनी है। ये आवेश वाहक दो प्रकार के होते हैं:
- मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons)
- होल (Holes)
धातुओं में पहले से ही बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं इसलिए वे अच्छे चालक होते हैं। अचालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉन लगभग नहीं के बराबर होते हैं इसलिए वे विद्युत धारा का प्रवाह नहीं करते। अर्धचालकों में सामान्य तापमान पर सीमित मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं लेकिन ताप बढ़ाने पर इनकी संख्या तेजी से बढ़ जाती है।
ऊर्जा बैंड सिद्धांत (Energy Band Theory)
अर्धचालकों के तापीय व्यवहार को समझने के लिए ऊर्जा बैंड सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी ठोस पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा निरंतर (continuous) न होकर बैंडों में विभाजित होती है:
- संयोजक बैंड (Valence Band)
- चालक बैंड (Conduction Band)
- निषिद्ध बैंड (Forbidden Gap या Band Gap)
संयोजक बैंड
- यह वह बैंड है जिसमें इलेक्ट्रॉन परमाणु से बंधे रहते हैं।
चालक बैंड
- यह वह बैंड है जिसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं और विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं।
बैंड गैप
- संयोजक और चालक बैंड के बीच का ऊर्जा अंतर बैंड गैप कहलाता है। अर्धचालकों में यह ऊर्जा अंतर कम (लगभग 1 eV) होता है।
ताप का प्रभाव: मूल कारण
जब ताप बढ़ाया जाता है तो:
- परमाणुओं का कंपन (Vibration) बढ़ जाता है।
- इलेक्ट्रॉनों को अतिरिक्त ऊष्मीय ऊर्जा (Thermal Energy) मिलती है।
- कुछ इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड से ऊर्जा प्राप्त कर चालक बैंड में कूद जाते हैं।
- इससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों और होल की संख्या बढ़ जाती है।
चालकता का सूत्र:
- σ = n e μ
जहाँ
- σ = चालकता
- n = मुक्त आवेश वाहकों की संख्या
- e = इलेक्ट्रॉन का आवेश
- μ = गतिशीलता (Mobility)
ताप बढ़ने पर n का मान तेजी से बढ़ता है इसलिए चालकता भी बढ़ जाती है।
धातु और अर्धचालक में अंतर
धातुओं में जब ताप बढ़ाया जाता है तो उनके परमाणुओं का कंपन (Vibration) बढ़ जाता है। इससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों का टकराव बढ़ जाता है और उनकी गति बाधित होती है। परिणामस्वरूप धातुओं की विद्युत चालकता घट जाती है और प्रतिरोध बढ़ जाता है। इसलिए धातुओं का ताप गुणांक (Temperature Coefficient) धनात्मक होता है। इसके विपरीत अर्धचालकों में ताप बढ़ाने पर चालकता बढ़ जाती है। ताप बढ़ने से संयोजक बैंड के इलेक्ट्रॉन अतिरिक्त ऊष्मीय ऊर्जा प्राप्त कर चालक बैंड में पहुँच जाते हैं। इससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों और होल (Holes) की संख्या बढ़ जाती है जिससे विद्युत धारा का प्रवाह अधिक हो जाता है। इस कारण अर्धचालकों का ताप गुणांक ऋणात्मक होता है।
धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत अधिक होती है। यही कारण है कि वे सामान्य तापमान पर भी उत्कृष्ट चालक होते हैं। उदाहरण के लिए, तांबा, चाँदी और एल्यूमिनियम जैसी धातुएँ अत्यधिक चालक होती हैं। अर्धचालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या सामान्य तापमान पर सीमित होती है। वे न तो धातुओं की तरह अत्यधिक चालक होते हैं और न ही अचालकों की तरह पूर्णतः प्रतिरोधी। ताप बढ़ने पर या अशुद्धि (Doping) मिलाने पर इनकी मुक्त इलेक्ट्रॉन संख्या बढ़ाई जा सकती है।
धातुओं में संयोजक बैंड और चालक बैंड के बीच कोई स्पष्ट बैंड गैप नहीं होता। कई धातुओं में ये दोनों बैंड एक-दूसरे को आच्छादित (Overlap) करते हैं। इसलिए इलेक्ट्रॉन आसानी से चालक बैंड में उपस्थित रहते हैं और विद्युत प्रवाह संभव होता है। अर्धचालकों में संयोजक बैंड और चालक बैंड के बीच एक छोटा ऊर्जा अंतर (Band Gap) होता है। यह अंतर लगभग 1 eV के आसपास होता है। ताप बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन इस छोटे अंतर को पार कर चालक बैंड में पहुँच जाते हैं, जिससे चालकता बढ़ जाती है।
धातुओं का ताप गुणांक धनात्मक होता है अर्थात् ताप बढ़ने पर उनका प्रतिरोध बढ़ता है। अर्धचालकों का ताप गुणांक ऋणात्मक होता है अर्थात् ताप बढ़ने पर उनका प्रतिरोध घटता है। इसी गुण के कारण अर्धचालकों का उपयोग ताप-संवेदनशील उपकरणों जैसे थर्मिस्टर में किया जाता है।
धातुएँ मुख्यतः विद्युत तार, मशीनों, मोटरों और संरचनात्मक कार्यों में उपयोग की जाती हैं क्योंकि उनकी चालकता उच्च होती है।
धातुओं में ताप बढ़ने से परमाणु अधिक कंपन करते हैं जिससे इलेक्ट्रॉनों का टकराव बढ़ता है और चालकता घट जाती है। अर्धचालकों में मुख्य प्रभाव मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या में वृद्धि का होता है।
आंतरिक (Intrinsic) अर्धचालक
शुद्ध अर्धचालक को आंतरिक अर्धचालक कहते हैं। उदाहरण: शुद्ध Silicon
सामान्य ताप पर बहुत कम इलेक्ट्रॉन चालक बैंड में होते हैं। ताप बढ़ाने पर:
- इलेक्ट्रॉन-होल युग्म (Electron-Hole Pair) उत्पन्न होते हैं।
- चालकता घातीय (Exponential) रूप से बढ़ती है।
बाह्य (Extrinsic) अर्धचालक
जब अर्धचालक में अशुद्धि (Impurity) मिलाई जाती है तो उसे बाह्य अर्धचालक कहते हैं।
N-प्रकार
- पंचसंयोजी तत्व मिलाने से।
- उदाहरण: Phosphorus
P-प्रकार
- त्रिसंयोजी तत्व मिलाने से।
- उदाहरण: Boron
ताप बढ़ने पर बाह्य अर्धचालकों में भी आवेश वाहकों की संख्या बढ़ती है।
व्यावहारिक उपयोग
- ट्रांजिस्टर
- डायोड
- सौर सेल
- ताप संवेदक (Temperature Sensor)
- इंटीग्रेटेड सर्किट
सौर ऊर्जा और ताप
सौर सेल में प्रकाश ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करती है। ताप भी इसी प्रकार ऊर्जा प्रदान करता है जिससे चालकता बढ़ती है।
