नामकरण और रासायनिक संरचना
हरा कशीश का IUPAC नाम Iron(II) Sulfate Heptahydrate है।
- Fe = लोहा (Iron)
- SO₄ = सल्फेट आयन
- 7H₂O = सात जल अणु (क्रिस्टलीय जल)
इसमें लोहा +2 ऑक्सीकरण अवस्था में पाया जाता है। इसलिए इसे फेरस (Ferrous) कहा जाता है।
संरचना की विशेषताएँ
- यह आयनिक यौगिक है।
- इसमें Fe²⁺ आयन और SO₄²⁻ आयन होते हैं।
- सात जल अणु इसके क्रिस्टलीय जाल (crystal lattice) में बंधे होते हैं।
- जब इसे गर्म किया जाता है तो यह अपना क्रिस्टलीय जल खो देता है और रंग बदल जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन काल में इसे “Green Vitriol” या “Copperas” कहा जाता था। मध्यकालीन रसायनज्ञ इसे धातुओं के साथ प्रयोग करते थे। “Vitriol” शब्द लैटिन भाषा के vitreus से लिया गया है जिसका अर्थ है “कांच जैसा”। अल्केमी (प्राचीन रसायन) में इसका उपयोग धातु शुद्धिकरण और स्याही निर्माण में किया जाता था।
भौतिक गुण
- रंग – हल्का हरा या हरा-नीला
- अवस्था – क्रिस्टलीय ठोस
- स्वाद – कसैला (कड़वा)
- घुलनशीलता – जल में घुलनशील
- गंध – गंधहीन
ताप का प्रभाव
- गर्म करने पर यह पहले जल अणु खोता है।
- अत्यधिक गर्म करने पर यह विघटित होकर Fe₂O₃ (लाल भूरा पाउडर) बनाता है।
रासायनिक गुण
ऑक्सीकरण
- Fe²⁺ आयन वायु में ऑक्सीकरण होकर Fe³⁺ में परिवर्तित हो सकता है।
अपचायक गुण
- फेरस सल्फेट एक अच्छा अपचायक (Reducing Agent) है।
ऊष्मीय अपघटन
- ताप देने पर अभिक्रिया:
- FeSO₄ → Fe₂O₃ + SO₂ + SO₃
निर्माण विधि
लोहे और सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया
- Fe + H₂SO₄ → FeSO₄ + H₂
पाइराइट (FeS₂) के ऑक्सीकरण से
- औद्योगिक स्तर पर इसे लोहे के अयस्क से प्राप्त किया जाता है।
औद्योगिक उपयोग
जल शुद्धिकरण
- अशुद्धियों को हटाने के लिए उपयोग।
स्याही निर्माण
- ऐतिहासिक रूप से “Iron Gall Ink” बनाने में।
उर्वरक
- मिट्टी में आयरन की कमी दूर करने के लिए।
चिकित्सा
- आयरन की कमी (एनीमिया) के उपचार में।
रंगाई उद्योग
- कपड़ा उद्योग में मॉर्डेंट के रूप में।
कृषि में महत्व
यदि पौधों में आयरन की कमी होती है तो पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं (क्लोरोसिस)। फेरस सल्फेट का छिड़काव इस कमी को दूर करता है।
चिकित्सा में उपयोग
- यह आयरन सप्लीमेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।
- एनीमिया के रोगियों को चिकित्सकीय सलाह पर दिया जाता है।
पर्यावरणीय प्रभाव
अत्यधिक मात्रा में यह जल स्रोतों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इसका उपयोग नियंत्रित मात्रा में होना चाहिए।
तुलनात्मक अध्ययन
हरा कशीश का रासायनिक सूत्र FeSO₄·7H₂O है। इसे वैज्ञानिक भाषा में फेरस सल्फेट हेप्टाहाइड्रेट कहा जाता है। इसमें लोहा (Fe) +2 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है तथा सात जल अणु (7H₂O) क्रिस्टलीय जल के रूप में जुड़े रहते हैं। अपने क्रिस्टलीय रूप में यह हल्के हरे रंग का दिखाई देता है। इसी कारण इसे “हरा कशीश” कहा जाता है।
दूसरी ओर, नीला थोथा का रासायनिक सूत्र CuSO₄·5H₂O है। इसे कॉपर सल्फेट पेंटाहाइड्रेट कहा जाता है। इसमें तांबा (Cu) +2 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित रहता है और पाँच जल अणु (5H₂O) क्रिस्टलीय जल के रूप में जुड़े होते हैं। यह चमकीले नीले रंग का क्रिस्टलीय ठोस होता है। इसलिए इसे “नीला थोथा” कहा जाता है।
दोनों यौगिक सल्फेट लवण हैं परंतु इनमें उपस्थित धातु आयन अलग-अलग हैं। एक में लोहा (Fe²⁺) और दूसरे में तांबा (Cu²⁺)। यही धातु आयन इनके रंग और रासायनिक गुणों को प्रभावित करते हैं। हरा कशीश का रंग हल्का हरा होता है, जबकि नीला थोथा का रंग गहरा नीला होता है।
यदि इन दोनों को गर्म किया जाए तो ये अपने-अपने क्रिस्टलीय जल को खो देते हैं। हरा कशीश गर्म करने पर पहले सफेद पाउडर जैसा बन जाता है और अधिक गर्म करने पर भूरा (Fe₂O₃) बन सकता है। वहीं, नीला थोथा गर्म करने पर अपना नीला रंग खोकर सफेद हो जाता है क्योंकि जल अणु निकल जाते हैं। पुनः जल मिलाने पर इसका नीला रंग वापस आ जाता है।
उपयोग की दृष्टि से भी दोनों का महत्व अलग-अलग है। हरा कशीश का उपयोग आयरन की कमी (एनीमिया) के उपचार, स्याही निर्माण तथा कृषि में आयरन की पूर्ति के लिए किया जाता है। वहीं नीला थोथा का उपयोग फफूंदनाशक (fungicide), कीटनाशक, इलेक्ट्रोप्लेटिंग तथा रासायनिक प्रयोगों में किया जाता है।
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