हाइपो क्या है?
‘हाइपो’ एक सामान्य नाम (Common Name) है जिसका प्रयोग फोटोग्राफी की भाषा में लंबे समय से किया जाता रहा है। इसका वैज्ञानिक या रासायनिक नाम सोडियम थायो सल्फेट (Na₂S₂O₃) है।
फोटोग्राफी में हाइपो का उपयोग मुख्यतः फिक्सर (Fixer) के रूप में किया जाता है। फिक्सर का कार्य यह सुनिश्चित करना होता है कि फोटोग्राफिक फिल्म या कागज़ पर बनी छवि स्थायी हो जाए और आगे प्रकाश के प्रभाव से खराब न हो।
सोडियम थायो सल्फेट का रासायनिक परिचय
रासायनिक नाम
- सोडियम थायो सल्फेट
रासायनिक सूत्र
- Na₂S₂O₃·5H₂O (सामान्यतः पेंटाहाइड्रेट रूप में)
वर्गीकरण
- अकार्बनिक लवण
- सल्फर युक्त यौगिक
सामान्य नाम
- हाइपो (Hypo)
- फोटोग्राफिक फिक्सर
सोडियम थायो सल्फेट के भौतिक गुण
सोडियम थायो सल्फेट के कुछ प्रमुख भौतिक गुण निम्नलिखित हैं:
- यह रंगहीन या श्वेत क्रिस्टलीय ठोस होता है।
- यह जल में अत्यधिक विलेय होता है।
- इसमें गंध नहीं होती।
- यह सामान्य ताप पर स्थिर रहता है।
- यह पेंटाहाइड्रेट रूप में अधिक पाया जाता है।
इन गुणों के कारण यह फोटोग्राफी के लिए अत्यंत उपयुक्त रसायन सिद्ध हुआ।
सोडियम थायो सल्फेट के रासायनिक गुण
- यह सिल्वर हैलाइड्स के साथ अभिक्रिया करके घुलनशील यौगिक बनाता है।
- यह ऑक्सीकरण-अपचयन (Redox) अभिक्रियाओं में भाग ले सकता है।
- अम्लीय माध्यम में यह सल्फर मुक्त कर सकता है।
- यह विषैला नहीं होता इसलिए प्रयोग में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।
फोटोग्राफी का संक्षिप्त वैज्ञानिक आधार
फोटोग्राफी का मूल सिद्धांत प्रकाश और रासायनिक अभिक्रियाओं पर आधारित है। पारंपरिक फोटोग्राफी में:
- फोटोग्राफिक फिल्म पर सिल्वर ब्रोमाइड (AgBr) या अन्य सिल्वर हैलाइड्स की परत होती है।
- जब इस पर प्रकाश पड़ता है तो सिल्वर हैलाइड आंशिक रूप से अपघटित होकर छवि बनाता है।
- यह छवि अस्थायी होती है और यदि इसे सुरक्षित न किया जाए तो प्रकाश में नष्ट हो जाती है।
यहीं पर हाइपो की भूमिका शुरू होती है।
फोटोग्राफी में हाइपो की भूमिका
फिक्सर के रूप में उपयोग
- सोडियम थायो सल्फेट का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग फिक्सिंग एजेंट के रूप में होता है। यह अविकसित (Unexposed) सिल्वर हैलाइड को घोल देता है।
छवि को स्थायी बनाना
- हाइपो फिल्म या फोटोग्राफिक पेपर से अवशिष्ट सिल्वर ब्रोमाइड को हटा देता है जिससे छवि स्थायी हो जाती है।
प्रकाश से सुरक्षा
- फिक्सिंग के बाद फोटो प्रकाश के संपर्क में आने पर काली नहीं पड़ती क्योंकि प्रकाश-संवेदनशील पदार्थ हट चुका होता है।
फिक्सिंग की रासायनिक अभिक्रिया
फोटोग्राफी में हाइपो और सिल्वर ब्रोमाइड के बीच निम्न अभिक्रिया होती है:
- AgBr + 2Na₂S₂O₃ → Na₃[Ag(S₂O₃)₂] + NaBr
इस अभिक्रिया में:
- सिल्वर ब्रोमाइड घुलनशील कॉम्प्लेक्स बना लेता है
- यह कॉम्प्लेक्स जल से धोकर हटा दिया जाता है
हाइपो को ‘हाइपो’ क्यों कहा जाता है?
‘हाइपो’ शब्द की उत्पत्ति Hyposulphite से मानी जाती है। प्रारंभ में सोडियम थायो सल्फेट को सोडियम हाइपोसल्फाइट कहा जाता था। बाद में इसका वैज्ञानिक नाम बदलकर सोडियम थायो सल्फेट कर दिया गया लेकिन फोटोग्राफी में इसका लोकप्रिय नाम ‘हाइपो’ बना रहा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं शताब्दी में जब फोटोग्राफी का विकास हुआ तब यह पाया गया कि केवल डेवलपर से छवि को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। 1819 में वैज्ञानिक जॉन हर्शल ने यह खोज की कि सोडियम थायो सल्फेट सिल्वर साल्ट्स को घोल सकता है। इसके बाद से यह फोटोग्राफी का अनिवार्य हिस्सा बन गया।
फोटोग्राफी की प्रक्रिया में हाइपो का स्थान
फोटोग्राफी की मुख्य रासायनिक अवस्थाएँ होती हैं:
- एक्सपोज़र (Exposure)
- डेवलपमेंट (Development)
- स्टॉप बाथ (Stop Bath)
- फिक्सिंग (Fixing)
- वॉशिंग (Washing)
इनमें फिक्सिंग चरण में हाइपो का उपयोग किया जाता है।
हाइपो के अन्य उपयोग
सोडियम थायो सल्फेट का उपयोग केवल फोटोग्राफी तक सीमित नहीं है। इसके अन्य उपयोग निम्नलिखित हैं:
- चिकित्सकीय क्षेत्र में साइनाइड विषाक्तता के उपचार में
- आयोडीन की टाइट्रेशन में
- जल शोधन में
- वस्त्र उद्योग में
- प्रयोगशालाओं में रसायन के रूप में
