गेहूँ का वर्गीकरण
वनस्पति विज्ञान में गेहूँ का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है:
- जगत (Kingdom) – Plantae
- विभाग (Division) – Angiospermae
- वर्ग (Class) – Monocotyledonae
- गण (Order) – Poales
- कुल (Family) – Poaceae (Gramineae)
- वंश (Genus) – Triticum
- प्रजाति (Species) – Triticum aestivum / Triticum vulgare
यह वर्गीकरण दर्शाता है कि गेहूँ एक एकबीजपत्री (Monocot) पौधा है जो घास कुल (Poaceae) का सदस्य है।
ट्रिटिकम ऐस्टिवम और ट्रिटिकम वल्गेयर
आधुनिक वनस्पति विज्ञान में Triticum aestivum को ही सामान्य या ब्रेड गेहूँ माना जाता है। Triticum vulgare नाम का प्रयोग पुराने टैक्सोनॉमिक साहित्य में अधिक मिलता है। बाद में वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया कि दोनों नाम एक ही प्रजाति के लिए प्रयुक्त हो रहे थे।
इस प्रकार, आज के समय में Triticum aestivum नाम को ही अधिक मान्यता प्राप्त है जबकि Triticum vulgare को उसका पर्यायवाची (synonym) माना जाता है।
गेहूँ की उत्पत्ति और इतिहास
गेहूँ की उत्पत्ति पश्चिम एशिया के उपजाऊ अर्धचंद्राकार क्षेत्र (Fertile Crescent) में मानी जाती है। यह क्षेत्र वर्तमान तुर्की, सीरिया, इराक और ईरान के आसपास फैला हुआ है। लगभग 8,000–10,000 वर्ष पूर्व मानव ने जंगली गेहूँ से खेती योग्य गेहूँ का विकास किया। धीरे-धीरे यह फसल एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अंततः पूरी दुनिया में फैल गई। भारत में गेहूँ की खेती वैदिक काल से ही होती आ रही है जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
गेहूँ का वनस्पतिक स्वरूप
गेहूँ का पौधा एक वार्षिक शाकीय पौधा होता है। इसकी ऊँचाई सामान्यतः 60 से 120 सेंटीमीटर तक होती है।
जड़
- गेहूँ में रेशेदार (Fibrous) जड़ प्रणाली पाई जाती है जो मिट्टी में अच्छी पकड़ बनाती है।
तना
- तना खोखला और गांठदार होता है। गांठों से पत्तियाँ निकलती हैं।
पत्तियाँ
- पत्तियाँ लंबी, संकरी और समानांतर शिराओं वाली होती हैं जो एकबीजपत्री पौधों की विशेषता है।
पुष्पक्रम
- गेहूँ में पुष्पक्रम को स्पाइक (Spike) कहते हैं। इसमें छोटे-छोटे फूल होते हैं जो परागण के बाद दानों का निर्माण करते हैं।
गेहूँ का रासायनिक संघटन
गेहूँ का दाना पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें मुख्यतः
- कार्बोहाइड्रेट – 60–70%
- प्रोटीन – 10–14%
- वसा – 1.5–2%
- खनिज लवण – कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन
- विटामिन – विटामिन B समूह (B1, B2, B3)
विशेष रूप से गेहूँ में पाया जाने वाला ग्लूटेन प्रोटीन आटे को लचीलापन प्रदान करता है जिससे रोटी और ब्रेड फूली हुई बनती हैं।
गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ
जलवायु
- गेहूँ शीतोष्ण जलवायु की फसल है। इसकी खेती के लिए:
- बुवाई के समय ठंडी जलवायु
- पकने के समय हल्की गर्मी अत्यंत अनुकूल मानी जाती है।
मिट्टी
- दोमट मिट्टी गेहूँ की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। मिट्टी में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।
तापमान
- बुवाई के समय: 10–15°C
- वृद्धि के समय: 16–20°C
- पकने के समय: 20–25°C
भारत में गेहूँ का महत्व
भारत विश्व के प्रमुख गेहूँ उत्पादक देशों में से एक है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार प्रमुख गेहूँ उत्पादक राज्य हैं। भारतीय भोजन संस्कृति में गेहूँ का विशेष स्थान है। उत्तर भारत में गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ दैनिक आहार का हिस्सा हैं।
गेहूँ से बनने वाले प्रमुख खाद्य पदार्थ
गेहूँ से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं जैसे:
- रोटी और चपाती
- पराठा और पूरी
- ब्रेड और बिस्कुट
- सूजी और दलिया
- पास्ता और नूडल्स
इन सभी उत्पादों में गेहूँ का आटा मुख्य कच्चा माल होता है।
आर्थिक महत्व
गेहूँ केवल खाद्य फसल ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे:
- किसानों की आय बढ़ती है
- खाद्य उद्योग को कच्चा माल मिलता है
- पशुओं के लिए भूसा प्राप्त होता है
गेहूँ और मानव स्वास्थ्य
गेहूँ संतुलित आहार का महत्वपूर्ण घटक है। इसमें उपस्थित फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है। प्रोटीन मांसपेशियों के विकास में सहायक होता है। हालाँकि कुछ लोगों में ग्लूटेन असहिष्णुता पाई जाती है जिन्हें गेहूँ से बने पदार्थों का सीमित सेवन करना पड़ता है।
ट्रिटिकम ऐस्टिवम का वैज्ञानिक महत्व
Triticum aestivum पर व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान किए गए हैं। इसकी आनुवंशिक संरचना जटिल होती है क्योंकि यह एक हेक्साप्लॉइड (छः गुणसूत्रीय समूह वाला) पौधा है। यही कारण है कि इसमें उच्च उत्पादकता और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में अनुकूलन की क्षमता पाई जाती है।
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