सल्तनत काल में ‘हक-ए-शर्ब’ क्या था?

Sanjay Yadav
सल्तनत काल में ‘हक-ए-शर्ब’ सिंचाई कर था। मध्यकालीन भारत में कृषि केवल जीविका का साधन ही नहीं थी बल्कि राज्य की आर्थिक रीढ़ भी थी। दिल्ली सल्तनत (13वीं से 16वीं शताब्दी) के शासकों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने और उससे राजस्व सुनिश्चित करने के लिए भूमि-राजस्व, सिंचाई-व्यवस्था तथा कर-प्रणाली का विस्तृत ढांचा विकसित किया। इस ढांचे में ‘हक-ए-शर्ब’ एक महत्वपूर्ण सिंचाई कर के रूप में सामने आता है। यह कर उन कृषकों से लिया जाता था जो राज्य द्वारा निर्मित या नियंत्रित सिंचाई स्रोतों जैसे नहरों, बांधों, जलाशयों से जल का उपयोग करते थे।

सल्तनत काल में ‘हक-ए-शर्ब’ सिंचाई कर था।

सल्तनत काल की कृषि अर्थव्यवस्था का संक्षिप्त परिचय

सल्तनत काल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि-आधारित थी। शहरीकरण, सेनाओं के भरण-पोषण और दरबारी खर्चों के लिए स्थिर राजस्व आवश्यक था जो कृषि से ही प्राप्त होता था।

मुख्य विशेषताएँ:
  • कृषि भूमि का व्यापक विस्तार
  • नई फसलों और सिंचाई तकनीकों का प्रयोग
  • भूमि-राजस्व के साथ सहायक करों का विकास
इसी संदर्भ में सिंचाई की उपलब्धता उत्पादन बढ़ाने का प्रमुख साधन बनी और जहाँ राज्य ने सिंचाई सुविधाएँ प्रदान कीं वहाँ उनसे संबंधित करों का निर्धारण हुआ।

‘हक-ए-शर्ब’ : शब्दार्थ और परिभाषा

  • ‘हक’ = अधिकार / शुल्क
  • ‘शर्ब’ = पानी / जल
अर्थात् ‘हक-ए-शर्ब’ का शाब्दिक अर्थ हुआ जल उपयोग का अधिकार शुल्क

ऐतिहासिक रूप से यह एक सिंचाई कर था जो उन कृषकों से लिया जाता था जिन्हें राज्य की सिंचाई व्यवस्था से जल प्राप्त होता था। यह कर भूमि-राजस्व (खराज/लगान) से अलग एक विशिष्ट उपयोग-आधारित कर था। सल्तनत काल में ‘हक-ए-शर्ब’ (Haqq-i-Sharb) फिरोज शाह तुगलक द्वारा लगाया गया एक सिंचाई कर (Irrigation Tax) था। यह उन किसानों से वसूला जाता था जो राज्य द्वारा निर्मित नहरों से सिंचाई की सुविधा प्राप्त करते थे। यह कर उपज का 1/10 (दस प्रतिशत) भाग होता था जिसे उलेमाओं की मंजूरी के बाद लगाया गया था।

‘हक-ए-शर्ब’ के उद्भव की पृष्ठभूमि

प्राकृतिक परिस्थितियाँ
  • उत्तरी भारत के कई क्षेत्र अनियमित वर्षा पर निर्भर थे। अकाल और सूखे की स्थिति में सिंचाई का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता था।
राज्य द्वारा सिंचाई निवेश
  • सल्तनत शासकों ने:
    • नहरों का निर्माण
    • पुराने जलाशयों की मरम्मत
    • बांध और तालाबों का विकास
  • इन कार्यों पर राजकीय कोष से व्यय किया। इस व्यय की आंशिक भरपाई हेतु ‘हक-ए-शर्ब’ जैसा कर लगाया गया।

इस्लामी प्रशासनिक परंपरा

मध्य एशिया और ईरान की इस्लामी परंपराओं में जल-उपयोग शुल्क की अवधारणा पहले से मौजूद थी जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला गया।

सल्तनत काल में सिंचाई व्यवस्था

सिंचाई के प्रमुख साधन
  • नहरें (विशेषकर पंजाब और दोआब क्षेत्र में)
  • तालाब और झीलें
  • कुएँ और बावड़ियाँ
  • बांध और जलाशय
राज्य और स्थानीय भागीदारी
  • कई सिंचाई परियोजनाएँ राज्य द्वारा
  • कुछ स्थानीय जमींदारों या समुदायों द्वारा
जहाँ राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण था वहीं हक-ए-शर्ब लगाया जाता था

‘हक-ए-शर्ब’ की प्रकृति और स्वरूप

उपयोग-आधारित कर
  • यह कर केवल उन्हीं कृषकों पर लगता था जो राज्य की सिंचाई सुविधा का उपयोग करते थे।
भूमि-राजस्व से अलग
  • भूमि-राजस्व: भूमि के स्वामित्व/उपज पर
  • हक-ए-शर्ब: जल के उपयोग पर
लचीलापन
  • कर की मात्रा:
    • जल की मात्रा
    • सिंचित क्षेत्र
  • फसल के प्रकार के अनुसार घट-बढ़ सकती थी।

‘हक-ए-शर्ब’ की वसूली प्रणाली

प्रशासनिक अधिकारी
  • अमिल (राजस्व अधिकारी)
  • शिकदार और मुतसद्दी
ये अधिकारी कर निर्धारण और वसूली के लिए उत्तरदायी थे।

भुगतान का माध्यम
  • नकद
  • अनाज का हिस्सा (कुछ क्षेत्रों में)
समय
  • फसल कटाई के बाद
  • कभी-कभी सिंचाई सत्र के अनुसार

किसानों पर प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव
  • नियमित जल उपलब्धता
  • फसल उत्पादन में वृद्धि
  • बहुफसली कृषि को प्रोत्साहन
नकारात्मक प्रभाव
  • अतिरिक्त कर-भार
  • सूखे या फसल-हानि के समय कठिनाई
  • कभी-कभी अधिकारियों द्वारा दुरुपयोग

राज्य पर प्रभाव

  • राजस्व में वृद्धि
  • सिंचाई ढांचे का विस्तार
  • कृषि स्थिरता से राजनीतिक स्थिरता

‘हक-ए-शर्ब’ और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन

यह कर कृषि को बाज़ारोन्मुख बनाने की दिशा में एक कदम था। सिंचाई सुविधा ने:
  • अधिशेष उत्पादन
  • व्यापार और शहरीकरण
  • कर-आधारित प्रशासन को बढ़ावा दिया।

Post a Comment