भरतनाट्यम नृत्य का विकास किससे हुआ है?

Sanjay Yadav
भरतनाट्यम नृत्य का विकास एकहार्य लास्यंग से हुआ है

भरतनाट्यम नृत्य का विकास एकहार्य लास्यंग से हुआ है। भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, भक्ति, संगीत, साहित्य और अभिनय कला का अद्भुत संगम है। भरतनाट्यम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता के उन सांस्कृतिक स्रोतों तक पहुँचती हैं जहाँ नृत्य को ईश्वर की आराधना तथा आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम माना जाता था। भारतीय नाट्य परंपरा के अनुसार भरतनाट्यम नृत्य का विकास “एकहार्य लास्यंग” से हुआ माना जाता है। एकहार्य लास्यंग एक ऐसा नृत्य रूप था जिसमें एक ही कलाकार विभिन्न भावों, मुद्राओं और अभिनय के माध्यम से सम्पूर्ण प्रस्तुति देता था। यह शैली मुख्यतः लास्य प्रधान थी, अर्थात इसमें कोमलता, सौंदर्य, भावुकता और सौम्यता का विशेष महत्व था।

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में लास्य को नृत्य की एक महत्वपूर्ण शाखा माना गया है। मान्यता है कि भगवान शिव के तांडव नृत्य के संतुलन के रूप में माता पार्वती ने लास्य नृत्य की रचना की थी। तांडव जहाँ शक्ति, वीरता और ऊर्जा का प्रतीक था, वहीं लास्य कोमलता, प्रेम, सौंदर्य और भावनाओं की अभिव्यक्ति का प्रतीक था। एकहार्य लास्यंग इसी लास्य परंपरा का एक विकसित रूप था जिसमें एकल नृत्यांगना विभिन्न पात्रों और भावों को प्रस्तुत करती थी। यही शैली समय के साथ विकसित होकर दक्षिण भारत की मंदिर परंपराओं में प्रवेश कर गई।

दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासी परंपरा का विशेष महत्व था। देवदासियाँ मंदिरों में देवी-देवताओं की सेवा के साथ-साथ नृत्य और संगीत के माध्यम से उनकी आराधना करती थीं। इस काल में एकहार्य लास्यंग ने अधिक व्यवस्थित रूप धारण किया और इसे “सदिर” या “सदिर नाट्यम” के नाम से जाना जाने लगा। सदिर नृत्य में नृत्य, अभिनय और संगीत का अत्यंत सुंदर समन्वय देखने को मिलता था। नृत्यांगनाएँ विभिन्न धार्मिक कथाओं, पुराणों और भक्ति साहित्य को अपने अभिनय के माध्यम से जीवंत करती थीं। इस प्रकार नृत्य केवल मनोरंजन का साधन न रहकर धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।

भरतनाट्यम की संरचना पर महान ग्रंथ “नाट्यशास्त्र” का गहरा प्रभाव है। महर्षि भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में नृत्य, संगीत और अभिनय के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। भरतनाट्यम में प्रयुक्त हस्त मुद्राएँ, नेत्र संचालन, शरीर की गतियाँ, रस और भावों की अभिव्यक्ति नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इसी कारण भरतनाट्यम को केवल नृत्य नहीं बल्कि एक संपूर्ण शास्त्रीय कला माना जाता है।

मध्यकाल में मंदिर संस्कृति के विस्तार के साथ भरतनाट्यम का प्रभाव भी बढ़ता गया। चोल, पल्लव और विजयनगर जैसे दक्षिण भारतीय राजवंशों ने इस कला को संरक्षण प्रदान किया। मंदिरों की दीवारों पर बनी नृत्य मुद्राओं की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय नृत्य कला कितनी विकसित और सम्मानित थी। नर्तकियाँ और कलाकार समाज में प्रतिष्ठित स्थान रखते थे तथा धार्मिक अनुष्ठानों और उत्सवों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।

हालाँकि औपनिवेशिक काल में इस नृत्य परंपरा को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अंग्रेजी शासन के दौरान देवदासी प्रथा की आलोचना होने लगी और इसके साथ जुड़े नृत्य रूपों को भी सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप सदिर नृत्य का अस्तित्व संकट में पड़ गया। कई स्थानों पर इस कला का अभ्यास कम होने लगा और इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया। लेकिन भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पित अनेक विद्वानों, कलाकारों और समाज सुधारकों ने इस अमूल्य धरोहर को बचाने का प्रयास किया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भरतनाट्यम के पुनर्जागरण का दौर शुरू हुआ। प्रसिद्ध नृत्यांगना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की अग्रदूत रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने इस नृत्य को नया जीवन प्रदान किया। उन्होंने सदिर नृत्य को सामाजिक सम्मान दिलाने और उसे आधुनिक मंच पर स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने इसकी प्रस्तुति शैली को अधिक परिष्कृत बनाया तथा इसे “भरतनाट्यम” नाम से व्यापक पहचान दिलाई। उनके प्रयासों के कारण यह नृत्य मंदिरों की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा।

भरतनाट्यम शब्द की व्याख्या भी अत्यंत रोचक है। कुछ विद्वानों के अनुसार “भरत” शब्द को “भा” अर्थात भाव, “र” अर्थात राग और “त” अर्थात ताल से जोड़ा जाता है। इस प्रकार भरतनाट्यम वह कला है जिसमें भाव, राग और ताल का समन्वय होता है। यह व्याख्या इस नृत्य की मूल प्रकृति को स्पष्ट करती है क्योंकि भरतनाट्यम में संगीत, लय, भाव और अभिनय का अद्वितीय मेल देखने को मिलता है।

भरतनाट्यम की प्रस्तुति में कई महत्वपूर्ण तत्व शामिल होते हैं। इसमें नृत्त, नृत्य और नाट्य तीनों का समावेश होता है। नृत्त शुद्ध नृत्य को दर्शाता है जिसमें लय और गति पर जोर दिया जाता है। नृत्य में भावों और अभिव्यक्ति का महत्व होता है, जबकि नाट्य में कहानी और पात्रों का चित्रण किया जाता है। एकहार्य लास्यंग की परंपरा का प्रभाव आज भी भरतनाट्यम में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है क्योंकि अधिकांश प्रस्तुतियाँ एकल कलाकार द्वारा की जाती हैं जो विभिन्न पात्रों और भावनाओं को अकेले प्रस्तुत करता है।

भरतनाट्यम की विशेषता इसकी जटिल पदचालन प्रणाली, सटीक मुद्राएँ और प्रभावशाली अभिनय है। नर्तकी का प्रत्येक अंग—नेत्र, भौंहें, हाथ, पैर और शरीर की मुद्रा—एक विशेष अर्थ व्यक्त करता है। यही कारण है कि भरतनाट्यम को सीखने और उसमें दक्षता प्राप्त करने के लिए वर्षों का कठोर अभ्यास आवश्यक होता है। कलाकार केवल शारीरिक कौशल ही नहीं बल्कि संगीत, साहित्य और आध्यात्मिक दर्शन का भी गहन अध्ययन करते हैं।

आज भरतनाट्यम केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक देशों में इसकी शिक्षा दी जाती है और हजारों विद्यार्थी इसे सीख रहे हैं। भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ-साथ विदेशी कलाकार भी इस कला के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भरतनाट्यम भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुका है। इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण इसकी सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति, गहरी आध्यात्मिकता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।

एकहार्य लास्यंग से प्रारंभ होकर सदिर नृत्य और फिर आधुनिक भरतनाट्यम तक की यात्रा भारतीय संस्कृति के निरंतर विकास की कहानी है। यह केवल एक नृत्य शैली का विकास नहीं, बल्कि भारतीय समाज, धर्म, कला और परंपराओं के परिवर्तन का भी दर्पण है। भरतनाट्यम आज भी उसी लास्य परंपरा की कोमलता, सौंदर्य और भावपूर्ण अभिव्यक्ति को संजोए हुए है जिसने हजारों वर्ष पहले एकहार्य लास्यंग के रूप में जन्म लिया था। यही कारण है कि भरतनाट्यम को भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा का अमूल्य रत्न माना जाता है और यह आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता रहेगा।

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