GI टैग की जंग: 'ऊंझा जीरा' और 'ऊंझा सौंफ' पर राजस्थान बनाम गुजरात का विवाद

Sanjay Yadav
हाल ही में राजस्थान के जीरा और सौंफ उत्पादक किसानों ने 'ऊंझा जीरा' (Unjha Cumin) और 'ऊंझा सौंफ' (Unjha Fennel) के लिए प्रस्तावित जियोग्राफिकल इंडिकेशन (Geographical Indication – GI) पंजीकरण का विरोध किया है। किसानों का कहना है कि इन मसालों का वास्तविक उत्पादन बड़े पैमाने पर राजस्थान में होता है जबकि गुजरात का ऊंझा मुख्यतः इनके व्यापार और विपणन (Marketing) का केंद्र है। इस विवाद ने एक बार फिर GI टैग के महत्व, उसके कानूनी प्रावधानों और भारत में उसकी भूमिका को चर्चा में ला दिया है।

GI टैग की जंग 'ऊंझा जीरा' और 'ऊंझा सौंफ' पर राजस्थान बनाम गुजरात का विवाद

क्या है पूरा मामला?

राजस्थान के किसानों का विरोध इस बात को लेकर है कि 'ऊंझा जीरा' और 'ऊंझा सौंफ' के नाम से GI टैग दिए जाने पर इन उत्पादों की पहचान केवल गुजरात के ऊंझा क्षेत्र से जुड़ सकती है। किसानों का तर्क है कि इससे राजस्थान के लाखों किसानों के हित प्रभावित होंगे क्योंकि इन मसालों का उत्पादन बड़ी मात्रा में राजस्थान के विभिन्न जिलों में किया जाता है।

किसानों का कहना है कि यदि GI टैग किसी ऐसे स्थान के नाम पर दिया जाता है जो मुख्यतः व्यापारिक केंद्र है, न कि उत्पादन क्षेत्र, तो इससे वास्तविक उत्पादकों को उचित पहचान और आर्थिक लाभ नहीं मिल पाएगा।

ऊंझा क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

ऊंझा, गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित एक प्रमुख कृषि व्यापारिक केंद्र है। यह बीज वाले मसालों (Seed Spices) विशेषकर जीरा (Cumin), सौंफ (Fennel) और इसबगोल (Isabgol) के व्यापार के लिए एशिया की सबसे बड़ी कृषि मंडियों में से एक माना जाता है।

ऊंझा की कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में मसालों का व्यापार होता है। देशभर के व्यापारी यहां खरीद-बिक्री के लिए आते हैं, जिससे यह राष्ट्रीय स्तर का एक प्रमुख मसाला बाजार बन चुका है।

राजस्थान से आता है बड़ी मात्रा में उत्पादन

यद्यपि ऊंझा व्यापार का प्रमुख केंद्र है लेकिन ऊंझा APMC में बिकने वाले जीरा और सौंफ का एक बड़ा हिस्सा राजस्थान से आता है।

राजस्थान के किसान लंबे समय से इन फसलों का उत्पादन कर रहे हैं और राज्य देश के प्रमुख जीरा एवं सौंफ उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। किसानों का कहना है कि यदि उत्पाद राजस्थान में उगाया जाता है और केवल बिक्री ऊंझा मंडी में होती है, तो GI टैग उत्पादन क्षेत्र की बजाय व्यापारिक केंद्र के नाम पर देना उचित नहीं होगा।

राजस्थान के किसानों की प्रमुख दलील

राजस्थान के किसानों का मुख्य तर्क है कि गुजरात का ऊंझा मुख्यतः उत्पादन केंद्र नहीं बल्कि व्यापार और मार्केटिंग का केंद्र है। इसलिए केवल व्यापारिक गतिविधियों के आधार पर GI टैग प्रदान करना GI की मूल अवधारणा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

उनका मानना है कि GI टैग उस भौगोलिक क्षेत्र को मिलना चाहिए जहाँ उत्पाद की विशिष्ट गुणवत्ता, परंपरा और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण उसका वास्तविक उत्पादन होता है।

जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) क्या है?

जियोग्राफिकल इंडिकेशन (Geographical Indication – GI) एक विशेष प्रकार का चिन्ह (Sign) होता है जिसका उपयोग उन उत्पादों पर किया जाता है जिनकी उत्पत्ति किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से होती है और जिनकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेष गुण उसी क्षेत्र की प्राकृतिक अथवा मानवीय विशेषताओं से जुड़े होते हैं।

GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्ट पहचान स्थापित करता है और यह प्रमाणित करता है कि वह उत्पाद वास्तव में उसी भौगोलिक क्षेत्र से संबंधित है।

GI टैग की मुख्य विशेषताएँ

  • किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक पहचान स्थापित करता है।
  • उत्पाद की गुणवत्ता और प्रतिष्ठा की कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • नकली उत्पादों पर रोक लगाने में सहायता करता है।
  • स्थानीय उत्पादकों को आर्थिक लाभ और वैश्विक पहचान दिलाने में मदद करता है।
  • पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय विरासत के संरक्षण को बढ़ावा देता है।

किन उत्पादों को मिलता है GI टैग?

जियोग्राफिकल इंडिकेशन का उपयोग विभिन्न प्रकार के उत्पादों के लिए किया जाता है जिनमें प्रमुख हैं—
  • कृषि उत्पाद
  • खाद्य पदार्थ
  • वाइन एवं स्पिरिट ड्रिंक्स
  • हस्तशिल्प
  • औद्योगिक उत्पाद
भारत में दार्जिलिंग चाय, बनारसी साड़ी, कांचीपुरम सिल्क, अल्फांसो आम, नागपुर संतरा, कश्मीर केसर और अनेक पारंपरिक उत्पाद GI टैग प्राप्त कर चुके हैं।

भारत में GI टैग से संबंधित कानून

भारत में GI टैग की व्यवस्था 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट, 1999' के अंतर्गत की गई है। इस कानून का उद्देश्य देश में विभिन्न उत्पादों से जुड़े जियोग्राफिकल इंडिकेशन का पंजीकरण करना तथा उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है।

यह अधिनियम उत्पादों की विशिष्ट पहचान की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल अधिकृत उत्पादक ही उस GI नाम का उपयोग कर सकें।

GI रजिस्ट्रेशन का प्रशासन कौन करता है?

इस अधिनियम का प्रशासन कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स, डिज़ाइन्स एंड ट्रेडमार्क्स (CGPDTM) द्वारा किया जाता है। यही अधिकारी जियोग्राफिकल इंडिकेशन के रजिस्ट्रार भी होते हैं और GI टैग के आवेदन, पंजीकरण तथा संरक्षण की प्रक्रिया का संचालन करते हैं।

GI टैग कितने वर्षों तक मान्य रहता है?

भारत में किसी भी जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) का पंजीकरण 10 वर्षों के लिए वैध होता है। इसकी अवधि समाप्त होने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसका नवीनीकरण (Renewal) कराया जा सकता है जिससे संबंधित उत्पाद की कानूनी सुरक्षा जारी रहती है।

GI टैग का महत्व

GI टैग केवल एक पहचान नहीं है बल्कि यह किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक उत्पादन तकनीकों और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। इससे उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ती है, किसानों और कारीगरों की आय में वृद्धि होती है तथा नकली उत्पादों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।

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