बाह्य चुंबकीय प्रभावों से वैज्ञानिक यंत्रों की रक्षा कैसे की जाती है?

Sanjay Yadav
बाह्य चुंबकीय प्रभावों से वैज्ञानिक यंत्रों की रक्षा लोहे कवर में रखकर की जाती है। आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का संपूर्ण विकास अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक यंत्रों (Scientific Instruments) पर निर्भर करता है। प्रयोगशालाओं, अनुसंधान केंद्रों, चिकित्सा उपकरणों, अंतरिक्ष विज्ञान, दूरसंचार तथा रक्षा क्षेत्र में प्रयुक्त अनेक यंत्र इतने संवेदनशील होते हैं कि उनके आसपास का थोड़ा-सा भी बाह्य चुंबकीय प्रभाव (External Magnetic Influence) उनके कार्य, माप और परिणामों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

बाह्य चुंबकीय प्रभावों से वैज्ञानिक यंत्रों की रक्षा लोहे कवर में रखकर की जाती है।

पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक है और इसके अतिरिक्त विद्युत उपकरण, मोटर, ट्रांसफॉर्मर, हाई-टेंशन तार, मोबाइल टावर, MRI मशीनें आदि निरंतर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते रहते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक यंत्रों को इन बाह्य चुंबकीय प्रभावों से सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इसी आवश्यकता के कारण एक अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक उपाय अपनाया जाता है।
  • वैज्ञानिक यंत्रों को लोहे के कवर (Iron Shield / Iron Enclosure) में रखकर बाह्य चुंबकीय प्रभावों से उनकी रक्षा की जाती है।

चुंबकीय क्षेत्र और बाह्य चुंबकीय प्रभाव

चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) वह क्षेत्र है जिसमें चुंबकीय बल कार्य करता है। किसी चुंबक, विद्युत धारा प्रवाहित चालक या विद्युत उपकरण के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित होता है।

जब किसी वैज्ञानिक यंत्र के पास अनावश्यक या अनियंत्रित चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित होता है तो उसे बाह्य चुंबकीय प्रभाव कहा जाता है। ये प्रभाव निम्न रूपों में दिखाई दे सकते हैं:
  • मापन में त्रुटि
  • संकेत (Signal) में विकृति
  • यंत्र का असामान्य व्यवहार
  • डेटा का भ्रष्ट होना
  • संवेदनशील सेंसर का गलत प्रतिक्रिया देना

वैज्ञानिक यंत्र और चुंबकीय संवेदनशीलता

कुछ वैज्ञानिक यंत्र अत्यंत चुंबकीय-संवेदनशील होते हैं जैसे:
  • गैल्वेनोमीटर
  • फ्लक्समीटर
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप
  • MRI सहायक उपकरण
  • स्पेक्ट्रोमीटर
  • सटीक समय मापक यंत्र (Atomic Clock से जुड़े उपकरण)
इन यंत्रों में सूक्ष्म विद्युत धारा, इलेक्ट्रॉन किरणें या चुंबकीय संकेत कार्य करते हैं। बाह्य चुंबकीय क्षेत्र इन संकेतों को मोड़ सकता है जिससे प्रयोग का परिणाम गलत हो जाता है।

चुंबकीय परिरक्षण (Magnetic Shielding) की अवधारणा

चुंबकीय परिरक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी संवेदनशील यंत्र को बाह्य चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से बचाया जाता है। यह परिरक्षण ऐसे पदार्थों की सहायता से किया जाता है जो चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को अपने भीतर आकर्षित कर लें और यंत्र तक पहुँचने से रोक दें। सरल शब्दों में:
  • बाह्य चुंबकीय क्षेत्र को “घुमा देना” या “अपने भीतर सीमित कर लेना” ही चुंबकीय परिरक्षण कहलाता है।

लोहे का चुंबकीय गुण और उसका महत्व

लोहे (Iron) को चुंबकीय परिरक्षण के लिए चुनने का मुख्य कारण इसके विशेष चुंबकीय गुण हैं।

उच्च चुंबकीय पारगम्यता (High Magnetic Permeability)

लोहे में चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता अत्यधिक होती है। जब बाहरी चुंबकीय क्षेत्र लोहे के पास आता है तो:
  • क्षेत्र रेखाएँ लोहे के भीतर प्रवेश कर जाती हैं
  • यंत्र के आसपास का क्षेत्र अपेक्षाकृत कमजोर हो जाता है

चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं का मार्ग बदलना

लोहे का कवर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के लिए एक “आसान मार्ग” प्रदान करता है। परिणामस्वरूप:
  • क्षेत्र रेखाएँ लोहे के कवर में बह जाती हैं
  • अंदर रखा यंत्र चुंबकीय प्रभाव से सुरक्षित रहता है

लोहे के कवर द्वारा सुरक्षा का सिद्धांत

जब किसी वैज्ञानिक यंत्र को लोहे के बंद कवर (Iron Enclosure) में रखा जाता है तो निम्न प्रक्रिया घटित होती है:
  • बाहरी चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है
  • क्षेत्र रेखाएँ लोहे के कवर की ओर आकर्षित होती हैं
  • लोहे के भीतर क्षेत्र रेखाएँ सघन हो जाती हैं
  • कवर के अंदर चुंबकीय क्षेत्र बहुत कम या नगण्य रह जाता है
  • यंत्र बाह्य चुंबकीय प्रभाव से सुरक्षित रहता है
इसी सिद्धांत को Magnetic Shielding by Iron कहा जाता है।

विद्युत परिरक्षण और चुंबकीय परिरक्षण में अंतर

प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिक उपकरणों के संदर्भ में प्रायः विद्युत परिरक्षण और चुंबकीय परिरक्षण इन दोनों शब्दों का प्रयोग किया जाता है। कई बार विद्यार्थी इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं जबकि इनका सिद्धांत, उद्देश्य और प्रयुक्त पदार्थ स्पष्ट रूप से भिन्न होते हैं।

विद्युत परिरक्षण (Electric Shielding) का उद्देश्य किसी यंत्र या स्थान को बाहरी विद्युत क्षेत्र के प्रभाव से बचाना होता है। इसके लिए सामान्यतः चालक पदार्थों जैसे तांबा या एल्युमिनियम का उपयोग किया जाता है। जब किसी चालक को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो उसके भीतर उपस्थित मुक्त आवेश इस प्रकार पुनर्वितरित हो जाते हैं कि चालक के अंदर विद्युत क्षेत्र शून्य या अत्यंत कम हो जाता है। इसी सिद्धांत पर फैराडे पिंजरा (Faraday Cage) कार्य करता है जहाँ आवेशों का पुनर्वितरण अंदर के क्षेत्र को सुरक्षित बनाता है।

इसके विपरीत, चुंबकीय परिरक्षण (Magnetic Shielding) का संबंध बाहरी चुंबकीय क्षेत्र से होता है। इसमें उद्देश्य यह होता है कि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ संवेदनशील यंत्र तक न पहुँचें। इसके लिए लौह या सॉफ्ट आयरन जैसे पदार्थों का प्रयोग किया जाता है जिनकी चुंबकीय पारगम्यता अधिक होती है। ऐसे पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को अपने भीतर आकर्षित कर लेते हैं और उनका मार्ग बदल देते हैं जिससे अंदर रखा यंत्र चुंबकीय प्रभाव से सुरक्षित रहता है।

इस प्रकार, जहाँ विद्युत परिरक्षण का आधार आवेशों का पुनर्वितरण है वहीं चुंबकीय परिरक्षण चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के मार्ग परिवर्तन पर आधारित होता है। यही कारण है कि दोनों परिरक्षण विधियों में प्रयुक्त पदार्थ भी भिन्न होते हैं और उनका उपयोग भी अलग-अलग परिस्थितियों में किया जाता है।

लोहे के कवर का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है

प्रयोगशालाओं में

संवेदनशील प्रयोगों में उपयोग होने वाले यंत्रों को लोहे के बॉक्स या कक्ष में रखा जाता है ताकि:
  • परिणाम शुद्ध रहें
  • दोहराव (Repeatability) बनी रहे

चिकित्सा क्षेत्र में

MRI और अन्य उच्च चुंबकीय क्षेत्र वाले उपकरणों के आसपास:
  • सहायक यंत्रों को लोहे की शील्ड से सुरक्षित किया जाता है
  • अनावश्यक हस्तक्षेप रोका जाता है

संचार एवं इलेक्ट्रॉनिक्स

संचार उपकरणों में:
  • सिग्नल विकृति रोकने
  • शोर (Noise) कम करने
  • डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए चुंबकीय परिरक्षण किया जाता है।

अंतरिक्ष विज्ञान

अंतरिक्ष यान में:
  • ब्रह्मांडीय चुंबकीय प्रभाव
  • सौर तूफानों से उत्पन्न क्षेत्र से उपकरणों की रक्षा हेतु विशेष चुंबकीय शील्डिंग अपनाई जाती है।

लोहे के स्थान पर अन्य पदार्थ

हालाँकि लोहा सबसे सामान्य और सस्ता पदार्थ है पर कुछ विशेष परिस्थितियों में:
  • सॉफ्ट आयरन
  • म्यू-मेटल (Mu-metal) का भी उपयोग किया जाता है। 
इनकी चुंबकीय पारगम्यता लोहे से भी अधिक होती है परंतु लागत अधिक होने के कारण सामान्य प्रयोगों में लोहा ही प्रयुक्त होता है।

लोहे के कवर की सीमाएँ

यद्यपि लोहे का कवर अत्यंत प्रभावी है फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं:
  • अत्यधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में सीमित प्रभाव
  • वजन अधिक होना
  • जंग लगने की संभावना
  • पूर्ण सुरक्षा नहीं केवल प्रभाव में कमी
इसके बावजूद सामान्य प्रयोगशाला और औद्योगिक परिस्थितियों में यह सबसे व्यावहारिक समाधान है।

दैनिक जीवन से उदाहरण

  • ट्रांसफॉर्मर के चारों ओर लोहे का कोर
  • इलेक्ट्रिक मोटर की लोहे की बॉडी
  • संवेदनशील मीटरों के धातु आवरण
ये सभी उदाहरण इसी सिद्धांत पर आधारित हैं कि लोहे द्वारा चुंबकीय प्रभावों को नियंत्रित किया जा सकता है।

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