छोलिया, मार्शल नृत्य कहाँ से संबंधित है?

Sanjay Yadav
छोलिया, मार्शल नृत्य उत्तराखंड से संबंधित है। भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे सशक्त पक्ष उसके लोकनृत्य हैं जिनमें प्रत्येक नृत्य किसी न किसी क्षेत्र के इतिहास, परंपरा, सामाजिक संरचना और जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करता है। उत्तराखंड राज्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ समृद्ध लोकसंस्कृति के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के लोकनृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि वीरता, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। इन्हीं नृत्यों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट नृत्य है छोलिया जिसे उत्तराखंड का मार्शल (Martial) अथवा युद्धात्मक लोकनृत्य माना जाता है।

छोलिया, मार्शल नृत्य उत्तराखंड से संबंधित है।

छोलिया नृत्य तलवार, ढाल और युद्धक मुद्राओं के माध्यम से किया जाता है। यह नृत्य केवल कला प्रदर्शन नहीं बल्कि उत्तराखंड के ऐतिहासिक सैन्य जीवन, क्षत्रिय परंपराओं और वीरता भावना का जीवंत प्रमाण है।

छोलिया नृत्य का अर्थ और नामकरण

‘छोलिया’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं परंतु सामान्यतः माना जाता है कि यह शब्द ‘छोल’ या ‘छल’ से जुड़ा है जिसका अर्थ युद्ध कौशल, रणनीति या युद्धाभ्यास से है। छोलिया नृत्य में कलाकार तलवार और ढाल के साथ युद्ध जैसी मुद्राएँ बनाते हैं जिससे इसका नामकरण युद्धक परंपरा से जुड़ा प्रतीत होता है।

यह नृत्य केवल शारीरिक कौशल नहीं दर्शाता बल्कि मानसिक अनुशासन, सामूहिक समन्वय और वीरता भावना को भी अभिव्यक्त करता है।

छोलिया नृत्य का भौगोलिक क्षेत्र

छोलिया नृत्य मुख्यतः कुमाऊँ मंडल से संबंधित है। यह नृत्य विशेष रूप से:
  • अल्मोड़ा
  • पिथौरागढ़
  • चम्पावत
  • बागेश्वर
  • नैनीताल जिलों में लोकप्रिय है। 
हालाँकि आधुनिक समय में यह नृत्य पूरे उत्तराखंड में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, उत्सवों और सरकारी आयोजनों में प्रदर्शित किया जाता है।

छोलिया नृत्य का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सैन्य परंपरा से संबंध
  • उत्तराखंड का इतिहास वीर सैनिकों से भरा रहा है। कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र के लोग सदियों से सेना और युद्धक कार्यों से जुड़े रहे हैं। छोलिया नृत्य उसी युद्धक परंपरा का लोकनृत्य रूप है। पुराने समय में यह नृत्य युवाओं को युद्ध के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करने का एक माध्यम था।
राजदरबार और सैनिक अभ्यास
  • ऐसा माना जाता है कि कुमाऊँ के राजाओं के समय में सैनिकों के युद्धाभ्यास और विजय उत्सवों के अवसर पर इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता था। धीरे-धीरे यह शाही परंपरा जनसामान्य में फैल गई और लोकनृत्य का रूप ले लिया।

छोलिया नृत्य का सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ

छोलिया नृत्य उत्तराखंड के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है। यह नृत्य मुख्यतः
  • विवाह समारोहों
  • शुभ यात्राओं
  • उत्सवों और मेलों
  • धार्मिक अवसरों पर किया जाता है।
विशेष रूप से विवाह के अवसर पर बारात के साथ छोलिया नृत्य किया जाना कुमाऊँ क्षेत्र की विशिष्ट परंपरा है। यह नृत्य वर और उसके परिवार की रक्षा, सम्मान और वीरता का प्रतीक माना जाता है।

छोलिया नृत्य का स्वरूप

सामूहिक नृत्य
  • छोलिया एक सामूहिक नृत्य है। इसमें सामान्यतः 8 से 16 पुरुष नर्तक भाग लेते हैं। सभी नर्तक एक समान गति और ताल में युद्धक मुद्राएँ बनाते हैं।
युद्धात्मक मुद्राएँ
  • इस नृत्य में:
    • तलवार चलाने की कला
    • ढाल से वार रोकना
    • आगे-पीछे हटने की रणनीति
    • अचानक आक्रमण की मुद्रा जैसी युद्ध शैली की क्रियाएँ प्रदर्शित की जाती हैं।

वाद्य यंत्र और संगीत

छोलिया नृत्य का संगीत इसकी ऊर्जा और वीर रस को और प्रबल करता है। इसमें मुख्यतः निम्न वाद्य यंत्र प्रयोग किए जाते हैं:
  • ढोल
  • दमाऊ
  • रणसिंघा
  • नगाड़ा
इन वाद्यों की तेज लय नर्तकों की गतियों को नियंत्रित करती है और दर्शकों में उत्साह का संचार करती है।

छोलिया नृत्य की वेशभूषा

पारंपरिक परिधान
  • छोलिया नर्तक पारंपरिक कुमाऊँनी परिधान धारण करते हैं:
    • सफेद या रंगीन धोती
    • कुर्ता या अंगरखा
    • कमर में पटका
हथियार
  • नृत्य की पहचान इसके हथियार हैं:
    • तलवार
    • ढाल
  • ये हथियार नृत्य को वास्तविक युद्ध अभ्यास जैसा रूप प्रदान करते हैं।
आभूषण और सजावट
  • कुछ क्षेत्रों में नर्तक सिर पर पारंपरिक टोपी या पगड़ी भी पहनते हैं जो उनकी जातीय पहचान को दर्शाती है।

छोलिया नृत्य में भाव और रस

भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार छोलिया नृत्य में मुख्यतः
  • वीर रस
  • रौद्र रस की प्रधानता होती है। 
नर्तकों की आँखों, चेहरे के भाव और शारीरिक मुद्रा से साहस, आत्मविश्वास और युद्ध भावना स्पष्ट झलकती है।

छोलिया नृत्य का धार्मिक पक्ष

यद्यपि छोलिया नृत्य मुख्यतः युद्धात्मक है फिर भी इसमें धार्मिक आस्था का समावेश मिलता है। कई स्थानों पर इसे:
  • ग्राम देवता
  • कुल देवता
  • स्थानीय देवी-देवताओं के सम्मान में भी किया जाता है। 
यह विश्वास किया जाता है कि छोलिया नृत्य से नकारात्मक शक्तियाँ दूर रहती हैं।

आधुनिक काल में छोलिया नृत्य

मंचीय रूप
  • आज छोलिया नृत्य को मंचीय प्रस्तुतियों के अनुरूप ढाल दिया गया है। सरकारी सांस्कृतिक महोत्सवों, पर्यटन आयोजनों और विद्यालयी कार्यक्रमों में इसका प्रदर्शन किया जाता है।
पर्यटन में योगदान
  • उत्तराखंड पर्यटन विभाग छोलिया नृत्य को राज्य की सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है। इससे स्थानीय कलाकारों को रोजगार और पहचान मिलती है।

छोलिया नृत्य का सांस्कृतिक महत्व

छोलिया नृत्य केवल एक लोकनृत्य नहीं बल्कि उत्तराखंड की:
  • वीरता परंपरा
  • सामूहिक संस्कृति
  • ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। 
यह नृत्य आने वाली पीढ़ियों को अपने अतीत से जोड़ता है और सांस्कृतिक गर्व की भावना विकसित करता है।

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