गवरी, नृत्य-नाटिका का सम्बन्ध किस राज्य से है?

Sanjay Yadav
गवरी, नृत्य-नाटिका का सम्बन्ध राजस्थान से है। भारत की लोक-संस्कृति अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट परंपराएँ, लोककथाएँ, नृत्य और नाट्य-रूप हैं जो वहाँ के सामाजिक और धार्मिक जीवन को अभिव्यक्त करते हैं। राजस्थान की धरती पर भी अनेक लोकनृत्य और लोकनाट्य प्रचलित हैं जिनमें गवरी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। गवरी एक ऐसी नृत्य-नाटिका है जिसका संबंध मुख्यतः राजस्थान के भील समुदाय से है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि आस्था, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

गवरी का आयोजन वर्षा ऋतु के पश्चात् श्रावण और भाद्रपद मास में किया जाता है। यह लगभग 40 दिनों तक चलने वाला एक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है। इसमें कलाकार गाँव-गाँव जाकर विभिन्न पौराणिक कथाओं का मंचन करते हैं।

गवरी, नृत्य-नाटिका का सम्बन्ध राजस्थान से है।

गवरी का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

गवरी का संबंध राजस्थान के मेवाड़ अंचल से माना जाता है। उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ और डूंगरपुर जिलों में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। गवरी की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न लोककथाएँ प्रचलित हैं।

भील समुदाय इसे भगवान शिव और देवी पार्वती की आराधना से जोड़ता है। मान्यता है कि गवरी का आयोजन करने से गांव में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। यह नृत्य-नाटिका शिव-भक्ति पर आधारित होती है इसलिए इसमें शिव, पार्वती, भस्मासुर, राक्षस, देवी-देवताओं और लोकनायकों के पात्र प्रमुख होते हैं।

राजस्थान की अन्य लोकपरंपराओं की तरह गवरी भी मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इसमें लिखित पटकथा का अभाव होता है परंतु कलाकारों को कथानक और संवाद स्मृति से ज्ञात रहते हैं।

गवरी और भील समुदाय

गवरी का सीधा संबंध भील जनजाति से है। भील राजस्थान की प्राचीनतम जनजातियों में से एक हैं। उनका जीवन प्रकृति के निकट और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। गवरी उनके धार्मिक जीवन का अनिवार्य अंग है।

गवरी में भाग लेने वाले कलाकार 40 दिनों तक विशेष नियमों का पालन करते हैं:
  • वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
  • मांस, मदिरा आदि से दूर रहते हैं।
  • भूमि पर सोते हैं।
  • नियमित पूजा-अर्चना करते हैं।
इस प्रकार गवरी केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि तपस्या और अनुशासन का प्रतीक है।

गवरी की धार्मिक मान्यताएँ

गवरी का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव को प्रसन्न करना है। भील समाज में शिव को ‘बाबा देव’ के रूप में पूजा जाता है। गवरी के प्रारंभ से पहले ग्राम देवता की पूजा की जाती है और अनुमति ली जाती है।

मान्यता है कि यदि किसी वर्ष गवरी का आयोजन न किया जाए तो गाँव में विपत्तियाँ आ सकती हैं। इसलिए इसे धार्मिक कर्तव्य माना जाता है।

गवरी में प्रस्तुत कथाएँ प्रायः शिव-पार्वती से संबंधित होती हैं जैसे:
  • भस्मासुर वध
  • शिव विवाह
  • राक्षसों का संहार
  • देवी शक्ति की विजय

गवरी की प्रस्तुति शैली

गवरी खुले मैदान या गाँव के चौक में प्रस्तुत की जाती है। इसके लिए किसी भव्य मंच की आवश्यकता नहीं होती। दर्शक चारों ओर बैठ जाते हैं और कलाकार बीच में प्रदर्शन करते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ
  • नृत्य और अभिनय का संगम – इसमें नृत्य और नाट्य दोनों का समावेश है।
  • संवाद शैली – संवाद स्थानीय मेवाड़ी बोली में होते हैं।
  • संगीत – ढोल, थाली और मंजीरा जैसे वाद्ययंत्र प्रयुक्त होते हैं।
  • हास्य तत्व – धार्मिक कथाओं के साथ हास्य प्रसंग भी जोड़े जाते हैं।

गवरी के प्रमुख पात्र

गवरी में विभिन्न पौराणिक और लोक पात्र होते हैं। प्रमुख पात्र इस प्रकार हैं:
  • राईबूढ़ा (शिव) – मुख्य पात्र
  • राईमाता (पार्वती)
  • भस्मासुर
  • कुटकड़िया (हास्य पात्र)
  • देव-देवियाँ
इन सभी पात्रों की पोशाक और श्रृंगार अत्यंत आकर्षक और रंगीन होता है।

वेशभूषा और श्रृंगार

गवरी की वेशभूषा इसकी प्रमुख पहचान है। कलाकार रंग-बिरंगे परिधान धारण करते हैं। चेहरे पर विशेष प्रकार का मेकअप किया जाता है। राक्षस पात्रों के लिए डरावने मुखौटे बनाए जाते हैं।

शिव का रूप धारण करने वाला कलाकार शरीर पर भस्म लगाता है और हाथ में त्रिशूल रखता है। देवी पात्रों के लिए आभूषणों और फूलों का प्रयोग किया जाता है।

गवरी की अवधि और आयोजन

गवरी का आयोजन लगभग 40 दिनों तक चलता है। इस दौरान कलाकार दल विभिन्न गांवों में भ्रमण करता है। वे प्रतिदिन अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन करते हैं।

गवरी का समापन विशेष पूजा के साथ होता है। अंतिम दिन सभी कलाकार सामूहिक भोज करते हैं और नियमों का समापन करते हैं।

सामाजिक महत्व

गवरी सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह गांवों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करती है।
  • समुदाय में सहयोग की भावना विकसित होती है।
  • युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं से जुड़ती है।
  • सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है।
गवरी के माध्यम से नैतिक शिक्षा भी दी जाती है जैसे सत्य की विजय, अधर्म का नाश, और भक्ति की महिमा।

आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव

गवरी स्थानीय कलाकारों को पहचान देती है। हालांकि यह व्यावसायिक नाट्य रूप नहीं है फिर भी इसके आयोजन से स्थानीय कारीगरों, वाद्य निर्माताओं और वस्त्र निर्माताओं को लाभ होता है।

राजस्थान पर्यटन विभाग भी इस परंपरा को प्रोत्साहित करता है। कई सांस्कृतिक महोत्सवों में गवरी की प्रस्तुति की जाती है।

गवरी और अन्य लोकनाट्यों से तुलना

राजस्थान में कई लोकनाट्य रूप प्रचलित हैं जैसे:
  • गवरी
  • स्वांग
  • ख्याल
गवरी की विशेषता यह है कि यह पूर्णतः धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ी है और इसकी अवधि लंबी होती है।

आधुनिक संदर्भ में गवरी

आज के समय में शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण पारंपरिक कलाओं पर प्रभाव पड़ा है। फिर भी गवरी आज भी अपनी मूल स्वरूप में जीवित है।

सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ इस कला के संरक्षण हेतु प्रयासरत हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी लोकसंस्कृति पर शोध हो रहा है।

संरक्षण की आवश्यकता

गवरी जैसी लोक परंपराएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन्हें संरक्षित करना आवश्यक है क्योंकि:
  • यह हमारी ऐतिहासिक पहचान है।
  • इससे सामाजिक समरसता बनी रहती है।
  • यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
यदि उचित संरक्षण और प्रोत्साहन मिले तो गवरी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना सकती है।

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