गोटीपुआ एक पारंपरिक नृत्य शैली किस राज्य की है?

Sanjay Yadav
गोटीपुआ एक पारंपरिक नृत्य शैली ओडिशा राज्य की है। गोटीपुआ एक विशिष्ट पारंपरिक नृत्य शैली है जो भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा राज्य से आती है। यह नृत्य मूलतः समूह में प्रस्तुत किया जाता है और मुख्य रूप से नवयुवकों (छोटे लड़के) द्वारा किया जाता है जो स्त्रैण वेशभूषा और श्रृंगार लेकर श्रीकृष्ण-राधा या जगन्नाथ भक्ति के भावों को नृत्यात्मक रूप देते हैं। Gotipua शब्द का शाब्दिक अर्थ “single boy” या “goti-pua” होता है पर व्यावहारिक रूप में यह उन छोटे लड़कों के समूह का संकेत है जो बचपन से प्रशिक्षण लेकर, किशोरावस्था तक Gotipua परम्परा को निभाते हैं।

गोटीपुआ एक पारंपरिक नृत्य शैली ओडिशा राज्य की है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्थान

गोटीपुआ परम्परा का उद्भव कई शताब्दियों पुराना है। सामान्यतः इतिहासकार और नृत्य-गुरु यह मानते हैं कि मन्दिर नृत्य की परम्परा जिसमें पहले महारी/देवदासी या मंदिर-नर्तकियाँ सम्मिलित थीं के क्षय के बाद यह शैली उभरी। पुरानी मन्दिर परंपराओं के निरंतरता बनाए रखने तथा कृष्ण-राधा की लीलाओं को नाटकीय व आकाशचुंबी मुहावरों में व्यक्त करने की आवश्यकता के कारण युवा बालकों का यह रूप प्रचलित हुआ। गोटीपुआ ने मंदिर-भक्ति और जनकला का एक अनोखा सम्मिश्रण प्रस्तुत किया जहाँ साधारण लोक-तत्त्व, अकवताल (acrobatics) और भक्ति-भाव का संयोजन मिलता है।

तकनीक और शैली

गोटीपुआ की एक प्रमुख विशेषता इसका बन्धा नृत्य (Bandha Nritya) है जिसमें अत्यंत सूक्ष्म और कठिन शारीरिक चालें, संतुलन, मानव-पिरामिड और उल्टे तौर-तरीके दिखाए जाते हैं। प्रशिक्षित बालक अक्सर सिर के बल झुककर पैर उठा लेना, पीठ पर खड़े होकर अन्य बालकों का समर्थन करना और ज़मीन से ऊँचे कूद-झपटी के साथ कठिन मुद्राएँ करते हैं। ये चालें केवल शरीर की लचक नहीं बल्कि वर्षों की कठोर अभ्यासशीलता, मांसपेशी-सामर्थ्य और अनुशासन का परिणाम होती हैं। इन आंदोलनों में Odissi के ‘भंगी’ (bhangi) विशिष्ट शरीर की मुद्रा के रूप दिखते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि गोटीपुआ ने आधुनिक ओडिसी नृत्य को तकनीकी और दृश्यात्मक तत्व दिए।

संगीत-सहायता और ताल-रचना

गोटीपुआ प्रस्तुतियों में पारंपरिक ओडिशी संगीत का प्रयोग होता है। मृदंग-सदृश पारंपरिक ढाँचे (जैसे मर्दल/मर्दला) को ताल-प्रमुख वादन के रूप में प्रयोग किया जाता है जिनके साथ बंसी, सारंगी आदि सुर-वाध्य यंत्र मिलते हैं। गीतों में अक्सर रागों का उपयोग होता है जो भक्ति-रस, श्रृंगार-रस और लयात्मक कौशल को मंच पर उभारते हैं। संगीत तथा ताल न केवल नर्तक के भाव-अभिव्यक्ति का आधार होते हैं बल्कि बन्धा-कौशल के समय लय-नियमन के लिए भी आवश्यक होते हैं।

वेश-भूषा, श्रृंगार और मेकअप

गोटीपुआ वेशभूषा पारंपरिक ओडिशी लोक-वस्त्रों से ग्रहण की जाती है पर इसमें लड़कों के स्त्री-वेश का विशेष रूप दिखता है। कमर पर पारंपरिक कपड़ा (तुंडरी/पाटका), चमकीले वस्त्र, गले और बाजुओं पर गहने, और चेहरे पर पारंपरिक मेक-अप जिनमें आँखों का जोरदार रेखांकन और माथे पर बिंदु आदि शामिल हैं। बालकों की केशभूषा और मेकअप उनकी androgyne (स्त्री-पुरुष मिश्रित) छवि को कायम रखते हैं जो दर्शकों में देवी-देवताओं की लीला भावनाओं का निर्माण करते हैं।

प्रशिक्षण और गुरु-शिष्य परम्परा

गोटीपुआ बालक कठिन अनुशासन के साथ प्रशिक्षण लेते हैं। कई स्थानों पर गुरुकुल रूपी प्रशिक्षण केंद्र होते हैं जहाँ बालकों को बचपन से कला, संगीत और व्यायाम-आधारित प्रशिक्षण दिया जाता है। परम्परागत गुरु-शिष्य पद्धति (guru-shishya parampara) के तहत तकनीकों का पूर्ण हस्तांतरण किया जाता है न केवल नृत्य की मुद्राएँ बल्कि भक्ति-भाव, कथा-वाचन और मंच-व्यवहार भी सिखाये जाते हैं। कई आधुनिक ओडिसी गुरु स्वयं गोटीपुआ पृष्ठभूमि से आए हैं और उन्होंने उसी अनुभव को आधुनिक शास्त्रीय रूप देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

गोटीपुआ और ओडिसी (संबंध और प्रभाव)

गोटीपुआ को अक्सर आधुनिक ओडिसी नृत्य का पूरक एवं एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत माना जाता है। कई प्रतिष्ठित ओडिसी गुरु जो आधुनिक ओडिसी की पुनर्रचना में सक्रिय रहे ने गोटीपुआ की शारीरिक मुद्राओं, लय-सेंस और अभिव्यक्ति तत्वों को अपनाया और उन्हें शास्त्रीय रूप में परिभाषित किया। इस तरह गोटीपुआ ने महारी/मंदिर परंपरा के साथ मिलकर ओडिसी की आज हम जो छवि देखते हैं उसे आकार दिया।

प्रसिद्ध केन्द्र और गोटीपुआ समुदाय

ओडिशा के कुछ गाँव और कस्बे गोटीपुआ के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उदाहरण के तौर पर रघुराजपुर गाँव पारंपरिक हस्तशिल्प और नृत्य-परंपराओं के लिए विख्यात है और यहाँ के कलाकार-समूह गोटीपुआ प्रस्तुतियों में सक्रिय रहे हैं। इसके अलावा पूरी के आसपास भी कई ट्रूप्स तथा उत्सव होते हैं जहाँ गोटीपुआ मंचन का नियमित आयोजन होता है।

कथ्य, विषयवस्तु और प्रस्तुतियों का स्वरूप

गोटीपुआ प्रस्तुतियाँ प्रायः श्रीकृष्ण की लीलाओं, राधा-कृष्ण संवादों, तथा पुराणिक-भक्ति कथाओं पर आधारित होती हैं। प्रस्तुति में नृत्य-नाट्य का मिश्रण होता है। कथ्य (narrative) का आरम्भ गीत के साथ होता है तत्पश्चात बँध (बन्धा) या लय-कौशल से भरपूर चरण आते हैं और चरम-बिंदु पर कुछ दृश्य-अकबरी (acrobatics) होते हैं जो दर्शकों को मोहित कर देते हैं। प्रस्तुति का अन्त प्रायः भक्ति-रस में होता है जिसमें समूह एक साथ मिलकर धार्मिक भाव व्यक्त करता है।

सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ और लैंगिक पहलू

गोटीपुआ की एक दिलचस्प सामाजिक पहलू यह है कि इसमें पुरुष बालक स्त्री-वेश धारण करके स्त्री-भूमिका निभाते हैं। यह परंपरा लैंगिक भूमिका, धार्मिक भक्ति और कलात्मक प्रदर्शन के जटिल मिश्रण को दर्शाती है। ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया कि महारी परंपरा के क्षय के पीछे सामाजिक-धार्मिक कारण और मन्दिर-नीतियों का प्रभाव रहा और उसी रिक्तता को गोटीपुआ ने भरने का काम किया। आज के समय में इसके लैंगिक आयामों पर शोध और आलोचना भी बढ़ी है और कला-समाज में इसकी व्याख्याएँ विविध दृष्टिकोणों से होती हैं।

आधुनिक चुनौतियाँ और संरक्षण के उपाय

गोटीपुआ के समक्ष कई चुनौतियाँ हैं: आर्थिक असुरक्षा, पारम्परिक संरचनाओं का टूटना, बच्चों के कलात्मक प्रशिक्षण की लागत और आधुनिककरण के दबाव। हलाँकि राज्य-स्तरीय और गैर-सरकारी संस्थाएँ इस परम्परा का संरक्षण कर रही हैं। संगीत विद्यालय, सांस्कृतिक महोत्सव और पर्यटन-आधारित मंचन से गोटीपुआ कलाकारों को मंच और आय मिल रही है। साथ ही कई आधुनिक गुरु और संस्थाएँ गोटीपुआ को पाठ्यक्रम, कार्यशाला और शोध-प्रवर्तन के माध्यम से संरक्षित कर रही हैं।

कुछ प्रसिद्ध हस्तियाँ और गुरु

कई समकालीन और विख्यात ओडिसी गुरु स्वयं गोटीपुआ पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं और उन्होंने शास्त्रीय ओडिसी की पुनर्रचना में अहम भूमिका निभाई। उदाहरण स्वरूप गुरु केलुचरण महापात्र (Kelucharan Mohapatra) ने गोटीपुआ की परम्परागत मुद्राओं और अभिव्यक्ति को आधुनिक ओडिसी में समाहित करने में योगदान दिया।

पर्यटन और मंचन — आज का परिदृश्य

सांस्कृतिक समारोह, राज्य-स्तरीय नृत्य-महोत्सव और मंदिर-समारोहों में गोटीपुआ का मंचन आज भी नियमित रूप से होता है। यह नृत्य न केवल स्थानीय दर्शकों को आकर्षित करता है बल्कि देश-विदेश से आने वाले शोधकर्ता, नृत्य-प्रेमी और पर्यटक भी गोटीपुआ प्रस्तुतियों को देखने आते हैं। ऐसे मंचन गोटीपुआ कलाकारों को आर्थिक व सांस्कृतिक मान्यता प्रदान करते हैं और साथ ही युवा पीढ़ी में परंपरा को जारी रखने की प्रेरणा बनते हैं।

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