मोहिनीअट्टम में हाथ के इशारे जो मुख्य रूप से हस्तलक्षण दीपिका पाठ से अपनाए गए, वे कितने हैं?

Sanjay Yadav
मोहिनीअट्टम में हाथ के इशारे जो मुख्य रूप से हस्तलक्षण दीपिका पाठ से अपनाए गए, वे 24 हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में हाथ के इशारे (हस्तमुद्राएँ) केवल सजावटी तत्व नहीं हैं बल्कि वे संपूर्ण अभिव्यक्ति-तंत्र की आत्मा हैं। चेहरे के भाव (मुखाभिनय), नेत्रों की चंचलता, भौहों का उतार-चढ़ाव और शरीर की लयात्मक गति इन सबके साथ हाथों की मुद्राएँ मिलकर नृत्य को कथात्मक और भावपूर्ण बनाती हैं। केरल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य शैली मोहिनीअट्टम में हस्तमुद्राओं का विशेष महत्व है।

मोहिनीअट्टम की हस्तमुद्राएँ मुख्यतः हस्तलक्षण दीपिका नामक ग्रंथ से ग्रहण की गई हैं। इस ग्रंथ में वर्णित 24 मूल हस्तमुद्राएँ मोहिनीअट्टम में प्रयोग की जाती हैं। ये 24 हस्तमुद्राएँ न केवल वस्तुओं और विचारों का संकेत देती हैं बल्कि भावों, संबंधों, प्रकृति और दार्शनिक अवधारणाओं को भी व्यक्त करती हैं।

मोहिनीअट्टम में हाथ के इशारे जो मुख्य रूप से हस्तलक्षण दीपिका पाठ से अपनाए गए

मोहिनीअट्टम की पृष्ठभूमि

मोहिनीअट्टम का उद्भव केरल में हुआ। “मोहिनी” का अर्थ है मोहिनी स्वरूप धारण करने वाली और “अट्टम” का अर्थ है नृत्य। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय मोहिनी रूप धारण कर असुरों को मोहित किया था। उसी मोहिनी रूप की कोमलता, लास्य और आकर्षण इस नृत्य शैली में झलकता है।

मोहिनीअट्टम मुख्यतः लास्य प्रधान नृत्य है अर्थात इसमें कोमलता, सौम्यता और स्त्रैण भावनाओं की प्रधानता होती है। इसकी गति मंथर, गोलाकार और लहराती हुई होती है। ऐसी कोमल शैली में हस्तमुद्राओं का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली ढंग से किया जाता है।

हस्तलक्षण दीपिका का महत्व

हस्तलक्षण दीपिका केरल की परंपरा में हस्तमुद्राओं का एक प्रामाणिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ मूलतः कथकली नृत्य-नाट्य से जुड़ा हुआ है किंतु इसकी हस्तमुद्राएँ मोहिनीअट्टम में भी समान रूप से अपनाई गई हैं।

इस ग्रंथ में 24 मूल हस्तमुद्राओं का वर्णन मिलता है। ये मुद्राएँ एकल (एक हाथ) और संयुक्त (दोनों हाथों से) रूप में प्रयोग की जाती हैं। इन 24 मुद्राओं के माध्यम से:
  • देवताओं का वर्णन
  • प्रकृति का चित्रण
  • भावों की अभिव्यक्ति
  • कथा-वाचन
  • सामाजिक संबंध सभी को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।

मोहिनीअट्टम की 24 प्रमुख हस्तमुद्राएँ

अब हम उन 24 हस्तमुद्राओं का क्रमवार वर्णन करते हैं जो मोहिनीअट्टम में प्रयुक्त होती हैं:

1. पताका
  • हथेली को सीधा रखकर उंगलियों को सटा दिया जाता है।
  • अर्थ: आकाश, बादल, वन, आशीर्वाद, निषेध आदि।
2. त्रिपताका
  • पताका में अनामिका को मोड़ दिया जाता है।
  • अर्थ: मुकुट, वृक्ष, अग्नि, इंद्रधनुष।
3. अर्धपताका
  • त्रिपताका में कनिष्ठा भी मोड़ दी जाती है।
  • अर्थ: पत्ते, चाकू, ध्वज।
4. कर्तरीमुख
  • तर्जनी और मध्यमा को V आकार में फैलाया जाता है।
  • अर्थ: पृथक्करण, दो मार्ग, बिजली।
5. मयूर
  • अनामिका और अंगूठे को मिलाकर शेष उंगलियाँ सीधी।
  • अर्थ: मोर, तिलक, सौंदर्य।
6. अर्धचन्द्र
  • अंगूठा फैलाकर हथेली सीधी।
  • अर्थ: चंद्रमा, प्लेट, आशीर्वाद।
7. अराल
  • तर्जनी को मोड़कर अन्य उंगलियाँ सीधी।
  • अर्थ: पीना, विष।
8. शुकतुण्ड
  • तर्जनी और अंगूठा मिलाकर चोंचाकार।
  • अर्थ: पक्षी की चोंच, बाण।
9. मुश्टि
  • मुट्ठी बंद।
  • अर्थ: शक्ति, क्रोध, स्थिरता।
10. शिखर
  • मुट्ठी में अंगूठा ऊपर।
  • अर्थ: शिवलिंग, धनुष, घंटा।
11. कपित्थ
  • शिखर में तर्जनी और मध्यमा को अंगूठे से दबाना।
  • अर्थ: देवी-पूजन, स्त्री पात्र।
12. कटकमुख
  • अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा मिलाकर।
  • अर्थ: पुष्प अर्पण, आभूषण धारण।
13. सूचि
  • तर्जनी सीधी, अन्य उंगलियाँ मुड़ी।
  • अर्थ: एक, संकेत, व्यक्ति।
14. चन्द्रकला
  • शिखर में तर्जनी फैलाकर।
  • अर्थ: चंद्रमा का अंश।
15. पद्मकोश
  • सभी उंगलियाँ थोड़ी मुड़ी हुई।
  • अर्थ: फूल, फल।
16. सर्पशिर
  • उंगलियाँ आगे की ओर झुकी हुई।
  • अर्थ: सर्प, नाग।
17. मृगशीर्ष
  • मध्यमा और अनामिका को अंगूठे से छूना।
  • अर्थ: हिरण, स्त्री का सौंदर्य।
18. सिंहमुख
  • मध्यमा और अनामिका को अंगूठे से मिलाना।
  • अर्थ: सिंह, औषधि देना।
19. कंगुल
  • कनिष्ठा को मोड़ना।
  • अर्थ: फल, छोटा आकार।
20. अलपद्म
  • उंगलियाँ फैली हुई कमल के समान।
  • अर्थ: कमल, सौंदर्य।
21. चतुर
  • उंगलियाँ हल्की मुड़ी हुई।
  • अर्थ: बुद्धि, चतुराई।
22. भ्रमर
  • अंगूठा और मध्यमा मिलाकर।
  • अर्थ: भौंरा, प्रेम।
23. हंसस्य
  • तर्जनी और अंगूठा मिलाकर।
  • अर्थ: सूक्ष्म वस्तु, मोती।
24. हंसपक्ष
  • दोनों हाथों को फैलाकर।
  • अर्थ: हंस के पंख, विस्तार।

हस्तमुद्राओं का अभिव्यक्ति में योगदान

मोहिनीअट्टम में जब नायिका विरह में तड़पती है तो उसकी पीड़ा केवल चेहरे से ही नहीं बल्कि हाथों की मुद्राओं से भी व्यक्त होती है। जब वह भगवान कृष्ण का वर्णन करती है तो मुकुट, बांसुरी और मयूर-पंख को हस्तमुद्राओं के माध्यम से साकार करती है।

हस्तमुद्राएँ:
  • सांकेतिक भाषा हैं
  • कथानक की वाहक हैं
  • भावों की दूत हैं
इनके बिना नृत्य केवल शारीरिक गतिविधि रह जाता है जबकि इनके साथ वह एक जीवंत कथा बन जाता है।

मोहिनीअट्टम और अन्य शास्त्रीय नृत्य

मोहिनीअट्टम की हस्तमुद्राएँ अन्य शास्त्रीय नृत्य शैलियों जैसे भरतनाट्यम और कथकली से कुछ हद तक मिलती-जुलती हैं किंतु इसकी प्रस्तुति शैली अधिक कोमल और मंथर होती है।

यहाँ हस्तमुद्राओं का प्रयोग तीव्र या उग्र रूप में नहीं बल्कि सौम्य और प्रवाहमयी ढंग से किया जाता है।

शिक्षण और परंपरा

मोहिनीअट्टम में हस्तमुद्राओं का प्रशिक्षण अत्यंत अनुशासित ढंग से दिया जाता है। विद्यार्थियों को पहले प्रत्येक मुद्रा का शुद्ध आकार सिखाया जाता है फिर उसके अर्थ और प्रयोग।

गुरु-शिष्य परंपरा में:
  • अभ्यास (रियाज)
  • ताल और लय की समझ
  • भावाभिव्यक्ति इन सबका समन्वय कराया जाता है।

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