शेरशाह का मकबरा कहाँ स्थित है?

Sanjay Yadav
Sher Shah Suri (शेरशाह सूरी) का मकबरा भारत के बिहार राज्य के रोहतास ज़िले के सासाराम शहर में स्थित एक भव्य और ऐतिहासिक स्मारक है। यह समाधि 16वीं शताब्दी की महान इमारतों में है और इसे अक्सर ‘भारत का दूसरा ताज’ कहा गया है। इसकी विशाल गुंबददार संरचना, जल-सहायक सरोवर और पठार पर स्थित भव्य प्लिंथ ने इसे विशिष्ट बना दिया है।

शेरशाह सूरी का मकबरा भारत के बिहार राज्य के रोहतास ज़िले के सासाराम शहर में स्थित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — किसने और क्यों बनवाया?

शेरशाह सूरी (रॉज़ी इतिहास में फर्रुख़बादी रूप से जाने जाने वाले) ने उत्तरी भारत में सूरी वंश की स्थापना की और अपने जीवनकाल में कई प्रशासनिक व सैन्य सुधार किए। अपनी मृत्यु से पहले ही उन्होंने अपने लिए एक विशाल मकबरा बनवाने का आरंभ किया जो 1545 ईस्वी में पूरा हुआ। उनके जीवन और शासनकाल की याद में यह स्मारक तैयार किया गया। मकबरे का निर्माण 1540-1545 के बीच हुआ और यह उस समय की टिकाऊ लाल-पीले बलुआ पत्थर की शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

स्थल और समग्र योजना

मकबरा एक चौकोर प्लिंथ पर निर्मित है और चारों ओर एक कृत्रिम ताल (आर्टिफिशियल लेक) ने इसे घेरे रखा है। मकबरे तक पहुँचने के लिए एक पत्थर की कच्ची सड़क/काया (causeway) बनाई गयी है। यह जल के मध्य स्थित स्मारक की योजना उस काल के बाग़-विवाह और ‘चार-आँगना’ सिद्धांतों के एक रूप से मेल खाती है। तवे के समान विशाल प्लिंथ पर स्थापित इस तीन-मंज़िला गुम्बज्जदार मकबरे की ऊँचाई लगभग 122 फीट बताई जाती है।

वास्तुकला — रूप, तत्व और शैली

आकार व संरचना:
  • मकबरा मूलतः एक बहु-तह (three-storied) अष्टकोणीय (octagonal) ढांचे पर खड़ा है जिसका उपरी भाग एक विशाल गुंबद (dome) द्वारा समर्थित है। गुंबद के चारों ओर छोटे-छोटे चट-छत्र (chhatris) और बालकनियाँ लगी हुई हैं जो इसे एक समरूप रूप प्रदान करती हैं।
वस्तु और सजावट: 
  • मुख्य सामग्री लाल-पीले बलुआ पत्थर (sandstone) है। कुछ हिस्सों पर कभी चमकीले रंग व मालाओं के लिए ग्लेज़्ड टाइलों का प्रयोग भी हुआ करता था। समय के साथ इन रंगों का नाश हुआ पर मौलिक संरचना अभी भी स्पष्ट दिखाई देती है।
आधार और प्लेटफ़ॉर्म: 
  • मकबरे का बड़ा प्लेटफ़ॉर्म ऊँचा और चौकोर है। मंच पर चढ़ने के बाद ही शिल्पकला की फाइन डिटेल नज़र आती है: मेहराबों (arched openings), वेरांडा (verandah) और स्तम्भों की गणना आदि। वेरांडा पूरे परिधि में है और प्रत्येक दिशा की ओर तीन-तीन मेहराब खुलते हैं।
इन्फ्लुएन्स और प्रभाव: 
  • वास्तुशैली में मुगल और अफगान (Pathan) तत्वों का मिश्रण दिखाई देता है। सरल, भारी और मज़बूत बेसिस के साथ गुंबद और मेहराबों का सौम्य संतुलन। कुछ विद्वान इसे मुगल-पूर्वी मकबरे के रूप में देखते हैं जो बाद के मुगल मकबरों के विकास का अग्रदूत था।

निर्माण प्रक्रिया व डिजाइनर

स्थानीय स्रोतों के अनुसार मकबरे के वास्तुकार का नाम मीर मुहम्मद अलीवाल खान (Mir Muhammad Aliwal Khan / Alawal Khan) बताया जाता है। उन्होंने शिल्प और इंजीनियरिंग के उच्च मानकों के साथ यह संरचना तैयार करवाई। निर्माण कार्य लगभग पाँच वर्षों में 1545 के आस-पास पूरा हुआ और यह शेरशाह के जीवन के अंतिम वर्षों में तैयार हुआ था।

सज्जा, कलाकृतियाँ और खोया हुआ वैभव

मकबरे की प्रारम्भिक सजावट में चमकीली रंगों और ग्लेज़्ड टाइलवर्क का उल्लेख किया जाता है किन्तु मौसम, समय और इंसानी नुकसान ने कई सजावटी तत्वों को नष्ट कर दिया। अंदर की कक्षाएँ और मकबरे के भीतर के पत्थर के नक्काशी और उत्कीर्णन आज भी दर्शनीय हैं किंतु जो मूल बैकलिट और रंग उपलब्ध थे वे अब अधूरा इतिहास बन चुके हैं।

मकबरे का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

राजनीतिक प्रतीक: 
  • यह स्मारक शेरशाह सूरी के प्रशासनिक राजनीतिक योगदान और सैन्य-विजयों का प्रस्तुतीकरण है जिनमें उन्होंने दिल्ली के साइंटिफिक प्रशासनिक तरीकों में सुधार किया, मार्ग-सड़क (किला-मार्ग) और डाक प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ किया। मकबरा इस ऐतिहासिक व्यक्ति की स्मृति और कार्य का प्रतीक है।
स्थानीय पहचान: 
  • सासाराम शहर और रोहतास जिले के लिए यह मकबरा एक पहचान चिन्ह है। यह पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक घटनाओं का केंद्र रहा है। बिहार सरकार और जिला प्रशासन इसे पर्यटन-दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं।

संरक्षण, रखरखाव और हालिया कदम

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता-सम्मत व्यवस्था न होने के बावजूद मकबरा भारतीय पुरातत्व वा स्थानीय प्रशासन के संरक्षण में है। कई स्रोत कहते हैं कि यह एएसआई (Archaeological Survey of India) की निगरानी में संरक्षित स्मारकों में से है और राज्य-स्तरीय पर्यटन विभाग समय-समय पर सौंदर्यकरण व मरम्मत के कार्यक्रम करता रहा है। राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण पर जोर दिया है और कुछ योजनाओं में शेरशाह के मकबरे को प्राथमिकता दी गयी है।

भौगोलिक पहुँच और आगंतुक मार्गदर्शन

पहुंच: 
  • सासाराम रेलवे और सड़क मार्ग दोनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। निकटतम बड़ा शहर और परिवहन केंद्र पटना है किंतु सड़कों के माध्यम से सासाराम पहुँचना सहज माना जाता है।
समय और टिकट: 
  • यह स्मारक सार्वजनिक दर्शनीय स्थलों में है। कुछ पर्यटन लेख बताते हैं कि यह एएसआई संरक्षित और टिकटेड हो सकता है। आगन्तुकों को ताज़ा टिकट/फोटोग्राफी नियम के लिए स्थानीय प्रबंधन से जांच करनी चाहिए।

भ्रमण के समय की सिफारिशें (फोटोग्राफ़ी, समय, मौसम)

सबह सुबह या सांझ: 
  • सुबह-सुबह और शाम के समय गुनगुनी रोशनी में मकबरे की पुष्पाकार परछाइयाँ और ताल-पृष्ठभूमि बेहद खूबसूरत दिखती हैं। फोटोग्राफरों के लिए यह उत्तम समय है।
मॉनसून से बचें: 
  • भारी वर्षा के दिनों में आगंतुकों को जलस्तर और कीचड़ के कारण असुविधा हो सकती है। शुष्क महीनों में यात्रा की सलाह दी जाती है।
फोटोग्राफी नियम: 
  • कुछ संरक्षित स्मारकों में पेशेवर कैमरा या ड्रोन के उपयोग पर रोक लागू होती है। आगमन पर सूचना-काउंटर से नियमों की जांच कर लें।

लोककथाएँ, किंवदंतियाँ और लोक-सांस्कृतिक जोड़

स्थानीय लोककथाओं में शेरशाह के शासनकाल, उनकी मृत्यु के कथा-वर्णन और मकबरे के निर्माण से जुड़ी कई कहानियाँ मिलती हैं जैसे कि उनके जीवन के अंतिम क्षण तथा मकबरे की बनावट से जुड़ी किंवदंतियाँ। वास्तु और स्थानिक प्रसंगों ने इसे जन-जीवन में एक कथा-केंद्र बनाए रखा है जहाँ त्योहारों व स्थानीय आयोजनों में भी यह स्थल संदर्भित होता है।

शैक्षिक और अनुसंधान-दृष्टि

आधुनिक स्थापत्य-इतिहास और मध्यकालीन भारतीय एवं अफगान वास्तुकला का अध्ययन करने वाले शोधार्थियों के लिए यह मकबरा महत्वपूर्ण केस-स्टडी है विशेषकर मुगल-पूर्व विन्यास, गुंबद तकनीक और पत्थर की भारी नक्काशी के संदर्भ में। संरक्षण-वर्ग के शोध, स्थल सर्वे और राजनैतिक इतिहास के शोधार्थियों के लिए भी यह स्थल उपयोगी है।

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