जागोई और चोलम दो मुख्य प्रभाग किस नृत्य के हैं?

Sanjay Yadav
जागोई और चोलम दो मुख्य प्रभाग मणिपुरी नृत्य के हैं। भारत की शास्त्रीय नृत्य परंपरा अत्यंत समृद्ध, विविधतापूर्ण और सांस्कृतिक रूप से गहन है। इन नृत्य परंपराओं में मणिपुरी नृत्य का स्थान विशिष्ट है। यह नृत्य अपनी कोमलता, आध्यात्मिक भावभूमि, सौम्य गतियों और भक्ति-प्रधान अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। मणिपुरी नृत्य केवल एक कला-रूप नहीं बल्कि जीवन-दर्शन और धार्मिक आस्था का सजीव रूप है। परंपरागत रूप से मणिपुरी नृत्य को दो मुख्य प्रभागों में विभाजित किया गया है जागोई (Jagoi) और चोलम (Cholom)। ये दोनों प्रभाग नृत्य की संरचना, शैली, गति, उद्देश्य और प्रस्तुति-पद्धति के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी परस्पर पूरक हैं।

जागोई और चोलम दो मुख्य प्रभाग मणिपुरी नृत्य के हैं।

मणिपुरी नृत्य की पृष्ठभूमि

मणिपुरी नृत्य का उद्भव उत्तर-पूर्वी भारत के मणिपुर राज्य में हुआ। यहाँ की लोक-आस्थाएँ, वैष्णव भक्ति परंपरा, स्थानीय देवी-देवताओं की उपासना, तथा प्राकृतिक सौंदर्य इन सभी का गहरा प्रभाव इस नृत्य पर पड़ा है। विशेष रूप से रासलीला परंपरा ने मणिपुरी नृत्य को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। मणिपुरी नृत्य में लास्य और तांडव का संतुलन दिखाई देता है परंतु इसकी मूल आत्मा सौम्यता, भक्ति और लयात्मकता में निहित है।

मणिपुरी नृत्य के प्रभागों की अवधारणा

शास्त्रीय नृत्यों में प्रभागों का निर्धारण उनकी गतियों (movements), ताल-लय, भावाभिव्यक्ति और वाद्य-प्रधानता के आधार पर किया जाता है। मणिपुरी नृत्य में यही वर्गीकरण जागोई और चोलम के रूप में सामने आता है।
  • जागोई: भाव, सौंदर्य, कोमलता और कथात्मकता पर आधारित।
  • चोलम: ताल, शक्ति, लय और वाद्य-प्रधान ऊर्जा पर आधारित।

भाग एक: जागोई (Jagoi)

जागोई का अर्थ और स्वरूप

‘जागोई’ शब्द का प्रयोग मणिपुरी नृत्य में उन नृत्य-रूपों के लिए किया जाता है जिनमें कोमल शारीरिक गतियाँ, लास्य और भावात्मक अभिव्यक्ति प्रमुख होती है। जागोई में नृत्य करने वाले कलाकार का उद्देश्य दर्शकों के मन में सौंदर्य-बोध और आध्यात्मिक अनुभूति उत्पन्न करना होता है।

जागोई की विशेषताएँ

  • कोमलता और सौम्यता – जागोई की पहचान उसकी मृदु और प्रवाहमयी गतियों से होती है।
  • भाव-प्रधान नृत्य – इसमें राग, रस और भाव का विशेष स्थान है।
  • लास्य प्रधानता – स्त्री-नृत्य में यह रूप अधिक प्रचलित है।
  • कथात्मकता – पौराणिक और धार्मिक कथाएँ नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत की जाती हैं।

जागोई और रासलीला

मणिपुरी नृत्य की सबसे प्रसिद्ध परंपरा रासलीला जागोई प्रभाग से ही संबंधित है। रासलीला में भगवान कृष्ण और राधा की दिव्य लीलाओं का नृत्यात्मक चित्रण किया जाता है। इसमें शांत रस, श्रृंगार रस और भक्ति रस का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

वेशभूषा और सौंदर्य

जागोई में कलाकारों की वेशभूषा अत्यंत आकर्षक होती है विशेषकर महिलाओं का कुमिल (घेरादार घाघरा), पारंपरिक आभूषण और सौम्य श्रृंगार। ये सभी तत्व नृत्य की कोमलता को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।

संगीत और ताल

जागोई में संगीत की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कोमल रागों, मध्यम या विलंबित लय और भावपूर्ण गायन के साथ नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ ताल दर्शनीय होती है परंतु आक्रामक नहीं।

भाग दो: चोलम (Cholom)

चोलम का अर्थ और स्वरूप

‘चोलम’ मणिपुरी नृत्य का वह प्रभाग है जिसमें ताल, गति, ऊर्जा और शक्ति प्रमुख होती है। यह नृत्य वाद्य-प्रधान होता है और इसमें नर्तक केवल नृत्य ही नहीं करता बल्कि वाद्य बजाते हुए नृत्य करता है।

चोलम की प्रमुख शैलियाँ

  • पुंग चोलम – मणिपुरी ढोल ‘पुंग’ को बजाते हुए किया जाने वाला नृत्य।
  • करताल चोलम – करताल (झांझ) के साथ प्रस्तुत ऊर्जावान नृत्य।
  • मंजीरा चोलम – मंजीरों के साथ तालबद्ध नृत्य।

चोलम की विशेषताएँ

  • ऊर्जा और शक्ति का प्रदर्शन
  • तेज़ और जटिल पदचालन
  • ताल-लय की सटीकता
  • पुरुष प्रधानता (हालाँकि आधुनिक काल में महिलाएँ भी भाग लेती हैं)

चोलम और तांडव तत्व

चोलम में तांडव तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह नृत्य शरीर की शक्ति, संतुलन और तालबद्धता का प्रदर्शन करता है। कई बार कलाकार हवा में उछलते हुए, घूमते हुए और वाद्य बजाते हुए कठिन मुद्राएँ बनाते हैं जो दर्शकों को रोमांचित कर देती हैं।

धार्मिक और सामाजिक संदर्भ

चोलम केवल मंचीय कला नहीं है बल्कि यह धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिर उत्सवों और सामाजिक आयोजनों का भी अभिन्न अंग है। इससे सामूहिक ऊर्जा और आध्यात्मिक उल्लास का संचार होता है।

जागोई और चोलम का तुलनात्मक अध्ययन

जागोई मूलतः कोमल और भावात्मक नृत्य-रूप है। इसमें नृत्य की गति मृदु, प्रवाहमयी और सौम्य होती है जिससे दर्शकों के मन में सौंदर्य-बोध और आध्यात्मिक अनुभूति उत्पन्न होती है। जागोई में भाव और लास्य की प्रधानता होती है इसलिए यह नृत्य अधिकतर कथात्मक होता है। पौराणिक एवं धार्मिक कथाएँ विशेषकर भक्ति और प्रेम से जुड़ी लीलाएँ इस प्रभाग में नृत्य के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं। कलाकारों की दृष्टि से देखें तो जागोई में प्रायः महिला नर्तकियाँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। रस की दृष्टि से इसमें श्रृंगार रस और भक्ति रस का विशेष स्थान है जो मणिपुरी नृत्य की सौम्य आत्मा को अभिव्यक्त करता है।

इसके विपरीत, चोलम ऊर्जावान और तालात्मक नृत्य-प्रभाग है। इसमें नृत्य की गति तीव्र, सशक्त और लयबद्ध होती है। चोलम में ताल और शक्ति का वर्चस्व होता है जिसके कारण यह नृत्य वाद्य-प्रधान बन जाता है। कलाकार न केवल नृत्य करते हैं बल्कि ढोल, करताल जैसे वाद्यों को बजाते हुए नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इस प्रभाग में शारीरिक सामर्थ्य, संतुलन और ताल की सटीकता का प्रभावशाली प्रदर्शन देखने को मिलता है। कलाकारों के रूप में चोलम में प्रायः पुरुष नर्तक अधिक दिखाई देते हैं। रसात्मक दृष्टि से इसमें वीर रस और अद्भुत रस की प्रधानता होती है जो दर्शकों में उत्साह और रोमांच भर देती है।

इस प्रकार, जागोई जहाँ मणिपुरी नृत्य की कोमल, भावनात्मक और भक्ति-प्रधान आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है वहीं चोलम उसकी ऊर्जावान, तालबद्ध और शक्तिशाली अभिव्यक्ति का सजीव रूप है। दोनों प्रभाग मिलकर मणिपुरी नृत्य को संपूर्णता प्रदान करते हैं और इसकी शास्त्रीय गरिमा को बनाए रखते हैं।

समकालीन संदर्भ में जागोई और चोलम

आज के समय में मणिपुरी नृत्य वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत किया जा रहा है। नृत्य विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में जागोई और चोलम दोनों की विधिवत शिक्षा दी जाती है। आधुनिक कोरियोग्राफी में भी इन दोनों प्रभागों के तत्वों का सृजनात्मक उपयोग किया जा रहा है जिससे परंपरा और नवाचार का सुंदर समन्वय बनता है।

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