ट्रैकोमा (Trachoma) रोग किस अंग से सम्बंधित रोग है?

Sanjay Yadav
ट्रैकोमा (Trachoma) रोग आँख से सम्बंधित रोग है। ट्रैकोमा एक अत्यंत संक्रामक नेत्र रोग है जो मुख्यतः आँखों की श्लेष्मा झिल्ली (कंजंक्टाइवा) को प्रभावित करता है। यह रोग विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है जहाँ स्वच्छता की कमी, स्वच्छ जल का अभाव और भीड़भाड़ वाली जीवन-शैली होती है। विश्व स्तर पर यह रोके जा सकने वाले अंधत्व (Preventable Blindness) का एक प्रमुख कारण रहा है। समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह रोग पलकों के भीतर की ओर मुड़ जाने (ट्राइशियासिस) तथा कॉर्निया को क्षति पहुँचाने के कारण स्थायी दृष्टि-हानि तक पहुँचा सकता है।

ट्रैकोमा का कारण एक जीवाणु है जिसका नाम Chlamydia trachomatis है। यह सूक्ष्म जीव आँखों के संपर्क, संक्रमित स्राव, दूषित वस्तुओं (तौलिया, रूमाल) तथा मक्खियों के माध्यम से फैलता है। बच्चों में इसका संक्रमण अधिक देखा जाता है किंतु इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम वयस्क अवस्था में प्रकट होते हैं।

ट्रैकोमा (Trachoma) रोग आँख से सम्बंधित रोग है।

ट्रैकोमा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

ट्रैकोमा कोई नया रोग नहीं है। प्राचीन मिस्र, यूनान और रोमन सभ्यताओं के अभिलेखों में भी आँखों के ऐसे संक्रमणों का वर्णन मिलता है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह रोग यूरोप और एशिया के कई देशों में व्यापक था। धीरे-धीरे स्वच्छता, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और जन-जागरूकता के कारण विकसित देशों में इसकी व्यापकता कम हो गई।

भारत सहित अनेक विकासशील देशों में यह रोग ग्रामीण और निर्धन क्षेत्रों में लंबे समय तक एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या बना रहा। परंतु सरकारी प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय अभियानों के माध्यम से इसके नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता मिली है।

रोग का कारण और संचरण

ट्रैकोमा का मुख्य कारण जीवाणु Chlamydia trachomatis है। यह जीवाणु आँख की कंजंक्टाइवा में संक्रमण उत्पन्न करता है। संक्रमण के फैलने के प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:
  • संक्रमित व्यक्ति की आँखों के स्राव के सीधे संपर्क से
  • दूषित तौलिया, रूमाल या कपड़ों के उपयोग से
  • मक्खियों के माध्यम से
  • भीड़भाड़ वाले और अस्वच्छ वातावरण में रहने से
विशेषकर छोटे बच्चे बार-बार संक्रमण के संपर्क में आते हैं जिससे रोग बार-बार होता है और धीरे-धीरे आँखों में स्थायी परिवर्तन उत्पन्न कर देता है।

ट्रैकोमा के लक्षण

ट्रैकोमा के प्रारंभिक लक्षण सामान्य नेत्रशोथ (Conjunctivitis) जैसे होते हैं जिनमें शामिल हैं:
  • आँखों में खुजली
  • जलन और लाली
  • आँसू आना
  • पलकों में सूजन
  • प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता
यदि संक्रमण बार-बार होता है तो कंजंक्टाइवा में दाने (फॉलिकल्स) बनने लगते हैं। समय के साथ यह सूजन और दाने निशान (Scarring) में बदल जाते हैं। गंभीर अवस्था में पलकें अंदर की ओर मुड़ जाती हैं जिससे पलक की बरौनियाँ कॉर्निया को रगड़ती हैं। इस स्थिति को ट्राइशियासिस कहते हैं।

कॉर्निया पर लगातार रगड़ लगने से घाव बन जाते हैं और अंततः दृष्टि धुंधली हो सकती है या स्थायी अंधत्व हो सकता है।

रोग की अवस्थाएँ

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ट्रैकोमा की अवस्थाओं को पाँच चरणों में वर्गीकृत किया है:
  • फॉलिक्युलर ट्रैकोमा (TF) – कंजंक्टाइवा में छोटे-छोटे दाने
  • इंटेंस ट्रैकोमा (TI) – गंभीर सूजन
  • कंजंक्टाइवल स्कारिंग (TS) – निशान पड़ना
  • ट्राइशियासिस (TT) – पलक का अंदर मुड़ना
  • कॉर्नियल अपैसिटी (CO) – कॉर्निया में धुंधलापन
इन अवस्थाओं में से प्रारंभिक दो अवस्थाएँ बच्चों में अधिक देखी जाती हैं जबकि अंतिम अवस्थाएँ वयस्कों में अधिक प्रकट होती हैं।

ट्रैकोमा का निदान

ट्रैकोमा का निदान प्रायः चिकित्सकीय परीक्षण के आधार पर किया जाता है। नेत्र रोग विशेषज्ञ आँखों की सूजन, फॉलिकल्स और निशानों का निरीक्षण करते हैं। प्रयोगशाला परीक्षणों द्वारा Chlamydia trachomatis की पहचान भी की जा सकती है किंतु अधिकांश मामलों में नैदानिक लक्षण ही पर्याप्त होते हैं।

उपचार

ट्रैकोमा का उपचार एंटीबायोटिक दवाओं द्वारा किया जाता है। आमतौर पर एज़िथ्रोमाइसिन (Azithromycin) का उपयोग किया जाता है जिसे एक खुराक में दिया जा सकता है। टेट्रासाइक्लिन मरहम भी प्रभावी है।

यदि पलकें अंदर की ओर मुड़ चुकी हों तो शल्य चिकित्सा (Surgery) आवश्यक हो सकती है। इससे बरौनियों की रगड़ को रोका जाता है और कॉर्निया को बचाया जा सकता है।

SAFE रणनीति

ट्रैकोमा के उन्मूलन के लिए World Health Organization ने SAFE नामक रणनीति अपनाई है:
  • S – Surgery (शल्य चिकित्सा)
  • A – Antibiotics (एंटीबायोटिक्स)
  • F – Facial cleanliness (चेहरे की स्वच्छता)
  • E – Environmental improvement (पर्यावरणीय सुधार)
यह समग्र रणनीति रोग के उपचार के साथ-साथ इसके पुनः संक्रमण को रोकने पर भी बल देती है।

भारत में स्थिति

भारत में ट्रैकोमा को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाए गए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता, स्वच्छ जल और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने से रोग की व्यापकता में उल्लेखनीय कमी आई है। कई राज्यों में इसे लगभग समाप्त घोषित किया जा चुका है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की एक बड़ी उपलब्धि है।

रोकथाम के उपाय

ट्रैकोमा की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय महत्वपूर्ण हैं:
  • बच्चों के चेहरे को स्वच्छ रखना
  • स्वच्छ जल का उपयोग
  • व्यक्तिगत वस्तुओं को साझा न करना
  • मक्खियों से बचाव
  • भीड़भाड़ कम करना
  • समय पर उपचार
स्वास्थ्य शिक्षा और जन-जागरूकता कार्यक्रमों से रोग की रोकथाम में अत्यधिक सहायता मिलती है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

ट्रैकोमा केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। दृष्टि-हानि होने पर व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अंधत्व परिवार की आय पर गंभीर प्रभाव डालता है। बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है।

महिलाएँ इस रोग से अधिक प्रभावित होती हैं क्योंकि वे बच्चों की देखभाल के कारण संक्रमण के अधिक संपर्क में रहती हैं।

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