कथक के प्रमुख विषय किससे जुड़े हुए हैं?

Sanjay Yadav
कथक के प्रमुख विषय वैष्णववाद से जुड़े हुए हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा केवल मनोरंजन का साधन नहीं रही है बल्कि यह भारतीय दर्शन, धर्म, भक्ति और सांस्कृतिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति भी रही है। इन्हीं शास्त्रीय नृत्यों में कथक का विशेष स्थान है। कथक नृत्य की आत्मा उसके विषयों, कथानकों और भावाभिव्यक्ति में निहित है। यदि कथक के ऐतिहासिक और वैचारिक विकास का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि कथक के प्रमुख विषय वैष्णववाद से गहराई से जुड़े हुए हैं। विशेषकर भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की लीलाएँ, राधा-कृष्ण प्रेम, भक्ति, माधुर्य और लीला-भाव कथक की मूल संवेदना रहे हैं।

कथक के प्रमुख विषय वैष्णववाद से जुड़े हुए हैं।

कथक शब्द की व्युत्पत्ति और मूल अवधारणा

‘कथक’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘कथा’ से मानी जाती है जिसका अर्थ है कहानी या आख्यान। प्राचीन काल में मंदिरों और तीर्थस्थलों में कथा कहने वाले कलाकारों को कथक या कथावाचक कहा जाता था। ये कलाकार धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और भगवान की लीलाओं को नृत्य, गायन और अभिनय के माध्यम से जनसाधारण तक पहुँचाते थे।

यहीं से कथक की वह परंपरा विकसित हुई जिसमें कथा + नृत्य + भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है और यह कथा मुख्यतः वैष्णव परंपरा से प्रेरित होती थी।

वैष्णववाद : एक संक्षिप्त परिचय

वैष्णववाद हिंदू धर्म की वह प्रमुख धारा है जिसमें भगवान विष्णु और उनके अवतारों विशेषकर श्रीकृष्ण और श्रीराम की उपासना की जाती है। वैष्णव भक्ति परंपरा में प्रेम, करुणा, सेवा और समर्पण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

कृष्ण-भक्ति पर आधारित वैष्णव परंपरा में निम्न भाव प्रमुख हैं:
  • श्रृंगार भाव (राधा-कृष्ण प्रेम)
  • वात्सल्य भाव (यशोदा-कृष्ण)
  • दास्य भाव
  • सख्य भाव
  • माधुर्य भाव
कथक नृत्य में इन सभी भावों की स्पष्ट झलक मिलती है।

कथक का प्रारंभिक विकास और वैष्णव प्रभाव

कथक का प्रारंभिक स्वरूप उत्तर भारत के मंदिरों, तीर्थों और धार्मिक सभाओं में विकसित हुआ। ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन) कथक के वैष्णव स्वरूप का प्रमुख केंद्र रहा है। ब्रज क्षेत्र स्वयं कृष्ण-लीला भूमि है। यहाँ गाए जाने वाले पद, भजन और कथाएँ सीधे-सीधे वैष्णव दर्शन से जुड़ी थीं। कथक कलाकार:
  • कृष्ण जन्म
  • माखन चोरी
  • कालिया दमन
  • गोवर्धन लीला
  • रास लीला
  • राधा-कृष्ण मिलन जैसी कथाओं को नृत्य-नाट्य रूप में प्रस्तुत करते थे।

राधा-कृष्ण लीला : कथक का केंद्रीय विषय

कथक के वैष्णव स्वरूप का सबसे सशक्त उदाहरण राधा-कृष्ण लीला है। राधा और कृष्ण का प्रेम केवल सांसारिक प्रेम नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।

कथक में:
  • राधा की विरह-वेदना
  • कृष्ण की चंचलता
  • मिलन की उत्कंठा
  • मान-मनुहार
  • अनुराग और समर्पण को अभिनय (Expression) और भाव (Bhava) के माध्यम से अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया जाता है।

कथक में भक्ति और नृत्य का समन्वय

वैष्णव परंपरा में भक्ति को मोक्ष का साधन माना गया है। कथक नृत्य इसी भक्ति को शारीरिक लय, ताल और अभिनय में ढाल देता है।

कथक में प्रयुक्त:
  • पदावली
  • भजन
  • अष्टपदी
  • सूरदास, मीरा, विद्यापति के पद मुख्यतः कृष्ण-भक्ति पर आधारित हैं। 
नर्तक जब इन पदों पर अभिनय करता है तो वह स्वयं को भक्त और दर्शक को साधक बना देता है।

भाव, रस और वैष्णव दर्शन

भारतीय नाट्यशास्त्र में वर्णित नवरसों में से कथक में सबसे अधिक:
  • श्रृंगार रस
  • भक्ति रस
  • करुण रस का प्रयोग होता है। 
यह रस विधान सीधे-सीधे वैष्णव दर्शन से मेल खाता है जहाँ प्रेम और करुणा ईश्वर-भक्ति के मूल तत्व हैं। विशेष रूप से श्रृंगार रस कथक की आत्मा माना जाता है और यह श्रृंगार राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम से उत्पन्न होता है न कि सांसारिक वासना से।

मुगल काल में भी वैष्णव विषयों की निरंतरता

मध्यकाल में जब कथक को राजदरबारों का संरक्षण मिला तब भी इसके वैष्णव विषय समाप्त नहीं हुए। यद्यपि प्रस्तुति में:
  • तात्कालिकता
  • तकनीकी चमत्कार
  • नृत्य की शुद्धता का विकास हुआ फिर भी कथानक का मूल आधार कृष्ण-लीला और भक्ति ही रहा।
यह कथक की वैचारिक शक्ति थी कि वह धार्मिक मूल्यों को बनाए रखते हुए समय के साथ स्वयं को ढालता रहा।

कथक घराने और वैष्णव परंपरा

कथक के प्रमुख घराने:
  • लखनऊ घराना
  • जयपुर घराना
  • बनारस घराना
तीनों में किसी न किसी रूप में वैष्णव प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। विशेषकर लखनऊ घराने में नज़ाकत, भाव-प्रधानता, कृष्ण-लीला आधारित अभिनय को अत्यधिक महत्व दिया गया।

कथक में प्रतीक और संकेत

कथक नृत्य में प्रयुक्त कई हस्त-मुद्राएँ, नेत्र-भंगिमाएँ और अंग-संचालन वैष्णव प्रतीकों से जुड़े हैं:
  • मुरली धारण
  • गोवर्धन उठाने का संकेत
  • यमुना तट
  • कमल
  • मोरपंख
ये सभी विष्णु और कृष्ण से संबंधित सांकेतिक रूप हैं।

आधुनिक कथक और वैष्णव विषय

आधुनिक काल में भी कथक की आत्मा वैष्णववाद से अलग नहीं हुई है। आज भी मंचों पर:
  • कृष्ण भक्ति
  • राधा-भाव
  • गोपियों की लीलाएँ
  • भक्ति और दर्शन कथक प्रस्तुतियों का केंद्रीय विषय बने हुए हैं।

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