मुगलकाल में लोक-निर्माण विभाग (Public Works Department) को क्या कहा जाता था?

Sanjay Yadav
मुगलकाल में लोक-निर्माण विभाग (Public Works Department) को शोहरत-ए-आम कहा जाता था। मध्यकालीन भारत में प्रशासन केवल कर-संग्रह और सेना तक सीमित नहीं था बल्कि सार्वजनिक सुविधाओं, संचार, सिंचाई और नगरीय विकास को भी राज्य की जिम्मेदारी माना जाता था। मुगलकाल में यह सोच और अधिक संगठित रूप में सामने आती है। सड़कों, पुलों, सरायों, नहरों, उद्यानों और नगर-निर्माण जैसे कार्यों को एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक ढाँचे के अंतर्गत किया गया। इतिहासकारों के अनुसार, मुगल शासन में लोक-कल्याण से जुड़े इन निर्माण कार्यों के लिए जो विभागीय व्यवस्था थी उसे प्रायः ‘शोहरत-ए-आम’ कहा जाता था। यह नाम स्वयं इस बात का संकेत है कि इन कार्यों का उद्देश्य जनहित में राज्य की प्रतिष्ठा (शोहरत) को बढ़ाना था।

मुगलकाल में लोक-निर्माण विभाग (Public Works Department) को शोहरत-ए-आम कहा जाता था।

‘शोहरत-ए-आम’ शब्द का अर्थ और आशय

‘शोहरत’ फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ कीर्ति, प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा होता है जबकि ‘आम’ का आशय जनसामान्य से है। इस प्रकार ‘शोहरत-ए-आम’ का अर्थ हुआ:
  • जनसामान्य के हित में किए गए ऐसे कार्य जिनसे राज्य की कीर्ति और प्रशासनिक विश्वसनीयता बढ़े।
मुगल शासक यह मानते थे कि जनता को सुगम आवागमन, सुरक्षित ठहराव, जल-प्रबंधन और सुव्यवस्थित नगर उपलब्ध कराना शासन का कर्तव्य है। इन कार्यों के माध्यम से न केवल आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ होती थीं बल्कि शासन के प्रति जन-समर्थन भी सुदृढ़ होता था।

मुगल प्रशासनिक पृष्ठभूमि

मुगल प्रशासन एक केन्द्रीयकृत किंतु व्यावहारिक व्यवस्था थी। विभिन्न विभागों राजस्व, सेना, न्याय, शाही गृह-विभाग और लोक-कल्याण के स्पष्ट दायित्व निर्धारित थे। ‘शोहरत-ए-आम’ इसी लोक-कल्याणकारी दृष्टि का मूर्त रूप था। यह विभाग किसी एक संकीर्ण कार्यालय तक सीमित नहीं था बल्कि सम्राट की निगरानी, प्रांतीय अधिकारियों की सहभागिता और स्थानीय कारीगरों/इंजीनियरों की विशेषज्ञता इन सबके संयुक्त प्रयास से कार्य करता था।

मुगल शासकों की लोक-निर्माण दृष्टि

मुगल शासकों की नीति में निर्माण केवल भौतिक संरचनाएँ खड़ी करना नहीं था बल्कि शासन की स्थिरता और आर्थिक उन्नति का साधन भी था।
  • सड़कों और पुलों से व्यापार सुगम हुआ।
  • सरायों से यात्रियों और व्यापारियों को सुरक्षा व विश्राम मिला।
  • नहरों और कुओं से कृषि उत्पादन बढ़ा।
  • नगर-निर्माण और बाग़-बगीचों से शहरी जीवन सुव्यवस्थित हुआ।
इन सबका समन्वय ‘शोहरत-ए-आम’ के अंतर्गत होता था।

प्रमुख मुगल शासक और लोक-निर्माण

मुगलकाल में अनेक सम्राटों ने लोक-निर्माण को प्रोत्साहन दिया पर कुछ शासकों के काल में यह गतिविधि विशेष रूप से विकसित हुई।

अकबर
  • अकबर के शासनकाल में प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ लोक-निर्माण को भी महत्त्व मिला। ग्रांड ट्रंक रोड के विस्तार, सरायों के निर्माण और नगरों के विकास में अकबर की नीति स्पष्ट दिखाई देती है। वह मानता था कि सुदृढ़ संचार व्यवस्था ही साम्राज्य की रीढ़ होती है।
जहाँगीर
  • जहाँगीर ने न्याय और सुविधा दोनों को समान रूप से महत्त्व दिया। यात्रियों के लिए सरायों, बाग़ों और जल-स्रोतों का निर्माण इसी सोच का परिणाम था।
शाहजहाँ
  • शाहजहाँ का काल स्थापत्य की दृष्टि से स्वर्णिम माना जाता है। यद्यपि वह भव्य इमारतों के लिए प्रसिद्ध है परंतु नगर-योजना, सड़कें, पुल और जल-प्रबंधन भी उसके शासन की उपलब्धियाँ थीं। इन सबमें ‘शोहरत-ए-आम’ की भावना अंतर्निहित थी। राज्य की प्रतिष्ठा जनता की सुविधा से जुड़ी है।

‘शोहरत-ए-आम’ के अंतर्गत प्रमुख कार्य

सड़कें और पुल
  • मुगल साम्राज्य का विस्तार विशाल था। विभिन्न प्रांतों को जोड़ने के लिए लंबी, सीधी और सुरक्षित सड़कें बनाई गईं। नदियों पर पुलों का निर्माण किया गया जिससे वर्षा ऋतु में भी आवागमन बाधित न हो।
सराय और विश्राम-गृह
  • लगभग हर कोस पर सरायों का निर्माण किया जाता था। इनमें यात्रियों के ठहरने, पशुओं के लिए स्थान, पानी और कभी-कभी चिकित्सा सहायता की व्यवस्था रहती थी। ये सरायें राज्य की मानवीय नीति का प्रतीक थीं।
सिंचाई और जल-प्रबंधन
  • कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में सिंचाई का विशेष महत्त्व था। नहरों का निर्माण, तालाबों की खुदाई और कुओं का विकास ‘शोहरत-ए-आम’ के प्रमुख कार्यों में शामिल था। इससे अकाल की स्थिति में भी कृषि को सहारा मिलता था।
नगर-निर्माण और स्वच्छता
  • नगरों की योजनाबद्ध बसावट, बाज़ारों की व्यवस्था, जल-निकासी और सार्वजनिक भवन ये सभी लोक-निर्माण विभाग की निगरानी में होते थे। इससे शहरी जीवन अधिक सुव्यवस्थित हुआ।
उद्यान और बाग़
  • मुगल शासकों को उद्यान-निर्माण का विशेष शौक था। ये बाग़ केवल सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि जन-सामान्य के विश्राम और सामाजिक जीवन के केंद्र भी थे।

प्रशासनिक संरचना और वित्त

  • ‘शोहरत-ए-आम’ के कार्यों के लिए राजकोष से धन आवंटित किया जाता था।
  • प्रांतीय सूबेदार परियोजनाओं की निगरानी करते थे।
  • स्थानीय अमीन और कारीगर तकनीकी कार्य संभालते थे।
  • खर्च और प्रगति की रिपोर्ट नियमित रूप से दरबार में भेजी जाती थी।
इस प्रकार वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक नियंत्रण दोनों बनाए रखे जाते थे।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

लोक-निर्माण कार्यों का प्रभाव बहुआयामी था:
  • व्यापार में वृद्धि: सुरक्षित सड़कें और सरायें व्यापारियों को आकर्षित करती थीं और दूर-दराज़ के क्षेत्रों से वस्तुओं का आदान–प्रदान सरल हुआ। इससे बाज़ारों में चहल-पहल बढ़ी और राज्य की आय में भी वृद्धि हुई।
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि: नहरों, तालाबों और कुओं के निर्माण से सिंचाई सुविधाएँ बेहतर हुईं। इससे फसलें अधिक और नियमित होने लगीं जिससे किसानों की स्थिति मजबूत हुई।
  • रोज़गार के अवसर: सड़क, पुल, सराय और भवन-निर्माण में बड़ी संख्या में कारीगर, मजदूर, राजमिस्त्री और शिल्पी कार्यरत रहते थे। इस प्रकार ‘शोहरत-ए-आम’ रोजगार सृजन का भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम था।
  • सामाजिक एकता: सार्वजनिक निर्माण स्थलों सरायों, बाज़ारों और बाग़ों में विभिन्न वर्गों, जातियों और क्षेत्रों के लोग एक-दूसरे से संपर्क में आते थे जिससे सामाजिक संवाद और एकता को बढ़ावा मिला।

धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ

मुगलकालीन लोक-निर्माण केवल सांसारिक सुविधा तक सीमित नहीं था बल्कि इसका धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी था।
  • तीर्थ मार्गों पर सरायों और जल-स्रोतों का निर्माण किया जाता था।
  • मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों के आसपास सड़कें और सार्वजनिक स्थान विकसित किए जाते थे।
  • सांस्कृतिक उत्सवों और मेलों के लिए खुले मैदान और उद्यान बनाए जाते थे।
इससे स्पष्ट होता है कि ‘शोहरत-ए-आम’ मुगलकालीन सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग था।

‘शोहरत-ए-आम’ और आधुनिक PWD की तुलना

यद्यपि आधुनिक लोक निर्माण विभाग (PWD) की स्थापना अंग्रेजों (लॉर्ड डलहौजी, 1854) ने की थी लेकिन भारत में इसका ऐतिहासिक ढांचा पूर्व-मुगल और मुगल काल में ही विकसित होना शुरू हो गया था। यदि आधुनिक संदर्भ में देखा जाए तो मुगलकाल का ‘शोहरत-ए-आम’ आज के लोक-निर्माण विभाग (Public Works Department) के समान था। दोनों का उद्देश्य:
  • सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण,
  • रख-रखाव,
  • और जन-सुविधाओं का विस्तार एक ही है। 
अंतर केवल इतना है कि आधुनिक PWD एक स्पष्ट कानूनी-प्रशासनिक विभाग है जबकि मुगलकाल में यह एक नीति और प्रशासनिक परंपरा के रूप में कार्य करता था।

ऐतिहासिक स्रोतों में उल्लेख

मुगल इतिहास से संबंधित फ़ारसी ग्रंथों, यात्रा-वृत्तांतों और शाही फरमानों में लोक-निर्माण कार्यों का उल्लेख मिलता है। यात्रियों और विदेशी पर्यटकों ने भी भारत की सड़कों, सरायों और जल-प्रबंधन की प्रशंसा की है। इससे यह प्रमाणित होता है कि ‘शोहरत-ए-आम’ केवल नाममात्र की अवधारणा नहीं थी बल्कि व्यवहार में भी सक्रिय रूप से लागू थी।

Post a Comment