किस गवर्नर जनरल के काल में अंग्रेजी उच्च शिक्षा का माध्यम तथा सरकार कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार की गई?
A) लॉर्ड विलियम बेंटिक
B) लॉर्ड कॉर्नवालिस
C) लॉर्ड डलहौजी
D) लॉर्ड रिपन
उत्तर: A) लॉर्ड विलियम बेंटिक
भारत के आधुनिक इतिहास में लॉर्ड विलियम बेंटिक का नाम एक महत्वपूर्ण प्रशासक और सुधारक के रूप में लिया जाता है। उनके शासनकाल में अनेक सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक सुधार किए गए, जिनका भारतीय समाज और शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन्हीं सुधारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय था अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम तथा सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार करना। यह निर्णय भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है और इसके दूरगामी प्रभाव आज भी भारतीय समाज में देखे जा सकते हैं।
लॉर्ड विलियम बेंटिक 1828 से 1835 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे। उनके शासनकाल में ब्रिटिश सरकार ने यह महसूस किया कि भारत में शिक्षा प्रणाली को एक नई दिशा देने की आवश्यकता है। उस समय भारत में शिक्षा मुख्यतः संस्कृत, अरबी और फारसी भाषाओं के माध्यम से दी जाती थी। पारंपरिक शिक्षा संस्थानों में धार्मिक और शास्त्रीय विषयों पर अधिक बल दिया जाता था। दूसरी ओर ब्रिटिश अधिकारियों का एक वर्ग यह मानता था कि भारत में पश्चिमी ज्ञान, विज्ञान और आधुनिक विचारों का प्रसार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने 2 फरवरी 1835 को अपना प्रसिद्ध "मैकॉले मिनट" प्रस्तुत किया। मैकॉले का विचार था कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों को आधुनिक विज्ञान, दर्शन, साहित्य और पश्चिमी ज्ञान उपलब्ध कराया जा सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अंग्रेजी साहित्य और विज्ञान उस समय उपलब्ध भारतीय एवं अरबी-फारसी साहित्य की तुलना में अधिक उपयोगी और आधुनिक हैं। मैकॉले ने सुझाव दिया कि सरकार को अपनी शिक्षा नीति में अंग्रेजी को प्राथमिकता देनी चाहिए।
लॉर्ड विलियम बेंटिक ने मैकॉले के सुझावों को स्वीकार करते हुए 1835 में अंग्रेजी शिक्षा संबंधी प्रस्ताव को लागू किया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया गया और सरकारी कामकाज में भी अंग्रेजी भाषा को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। यह निर्णय भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत थी। इसके बाद अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाले विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ने लगी। आधुनिक विषयों जैसे विज्ञान, गणित, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और कानून की शिक्षा अंग्रेजी के माध्यम से उपलब्ध कराई जाने लगी।
इस नीति का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी भाषा और ब्रिटिश विचारधारा से परिचित हो तथा प्रशासनिक कार्यों में ब्रिटिश सरकार की सहायता कर सके। ब्रिटिश सरकार को ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता थी जो भारतीय समाज और अंग्रेजी प्रशासन के बीच सेतु का कार्य कर सकें। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से एक नया शिक्षित मध्यम वर्ग विकसित हुआ जिसने आगे चलकर भारतीय समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत ने भारत में आधुनिक ज्ञान और विज्ञान के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। इसके माध्यम से भारतीय छात्रों को यूरोप में विकसित वैज्ञानिक खोजों, तकनीकी प्रगति और आधुनिक राजनीतिक विचारों की जानकारी प्राप्त हुई। इससे भारतीय समाज में नई चेतना का विकास हुआ। सामाजिक सुधार आंदोलनों, राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में भी अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी जैसे अनेक नेताओं ने आधुनिक शिक्षा के महत्व को समझा और उसका उपयोग समाज सुधार तथा राष्ट्र निर्माण के लिए किया।
हालांकि इस नीति की आलोचना भी हुई। कुछ विद्वानों का मानना था कि अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने से भारतीय भाषाओं और पारंपरिक शिक्षा प्रणाली की उपेक्षा हुई। संस्कृत, अरबी और फारसी जैसी भाषाओं के अध्ययन को कम महत्व मिलने लगा। कई भारतीय विद्वानों ने यह तर्क दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अंग्रेजी ज्ञान प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण भी आवश्यक है। इसके बावजूद यह तथ्य स्वीकार किया जाता है कि अंग्रेजी शिक्षा ने भारत को आधुनिक विश्व से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सरकारी कामकाज में अंग्रेजी भाषा को अपनाने से प्रशासनिक व्यवस्था में एकरूपता आई। ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय कर्मचारियों के बीच संवाद आसान हुआ। न्यायालयों, सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक संस्थाओं में अंग्रेजी का उपयोग बढ़ने लगा। इससे प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि हुई, लेकिन साथ ही आम जनता और प्रशासन के बीच भाषा संबंधी दूरी भी उत्पन्न हुई क्योंकि अधिकांश भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते थे।
अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि भारत में आधुनिक पत्रकारिता, साहित्य और बौद्धिक विमर्श का विकास हुआ। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों को विश्व के विभिन्न देशों की राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की जानकारी मिलने लगी। उन्होंने स्वतंत्रता, लोकतंत्र, समानता और मानवाधिकार जैसे विचारों को समझा। यही विचार आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक नींव बने।
प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि किस गवर्नर जनरल के काल में अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम तथा सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। इसका सही उत्तर लॉर्ड विलियम बेंटिक है। वर्ष 1835 में मैकॉले मिनट के आधार पर लिया गया यह निर्णय भारतीय शिक्षा के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। यह घटना आधुनिक भारत के निर्माण में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई।
आज भारत में अंग्रेजी एक महत्वपूर्ण संपर्क भाषा के रूप में स्थापित है। उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अंग्रेजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस स्थिति की ऐतिहासिक जड़ें लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासनकाल में लागू की गई शिक्षा नीति में निहित हैं। यद्यपि इस नीति के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव रहे, फिर भी यह निर्विवाद है कि इसने भारत की शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक विकास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया।
इस प्रकार लॉर्ड विलियम बेंटिक के काल में अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम तथा सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया जाना भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। इस निर्णय ने भारत में आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, प्रशासनिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना के विकास का मार्ग प्रशस्त किया तथा आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
