भारत की नई स्वास्थ्य रणनीति: 2030 तक हेपेटाइटिस को जड़ से खत्म करने की तैयारी

Sanjay Yadav
भारत हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारी से निपटने के लिए अपने प्रयासों को लगातार मजबूत कर रहा है। सरकार का नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम (NVHCP) वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा न रहने देने के लक्ष्य के साथ कार्य कर रहा है। यह पहल विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य समय पर पहचान, प्रभावी उपचार और व्यापक जागरूकता के माध्यम से इस बीमारी के बोझ को कम करना है।

भारत की नई स्वास्थ्य रणनीति 2030 तक हेपेटाइटिस को जड़ से खत्म करने की तैयारी

हेपेटाइटिस क्या है?

हेपेटाइटिस (Hepatitis) लिवर (यकृत) में होने वाली सूजन (Inflammation) है। यह मुख्य रूप से हेपेटाइटिस वायरस के संक्रमण के कारण होता है, लेकिन इसके अलावा अत्यधिक शराब का सेवन, जहरीले रसायनों या दवाओं का प्रभाव तथा ऑटोइम्यून बीमारियाँ भी इसका कारण बन सकती हैं। लिवर शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जो भोजन को पचाने, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने और ऊर्जा के भंडारण जैसे अनेक कार्य करता है। इसलिए लिवर में सूजन होने से पूरे शरीर के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

हेपेटाइटिस वायरस के पाँच प्रमुख प्रकार हैं— हेपेटाइटिस A (HAV), हेपेटाइटिस B (HBV), हेपेटाइटिस C (HCV), हेपेटाइटिस D (HDV) और हेपेटाइटिस E (HEV)। इनमें से हेपेटाइटिस B और हेपेटाइटिस C सबसे अधिक चिंता का विषय हैं क्योंकि ये लंबे समय तक रहने वाले (क्रोनिक) संक्रमण का रूप ले सकते हैं और आगे चलकर लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) तथा लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

हेपेटाइटिस A (HAV)

हेपेटाइटिस A मुख्य रूप से दूषित भोजन और दूषित पानी के सेवन से फैलता है। इसका संक्रमण मल-मुंह (Faecal-Oral) मार्ग से होता है, जो खराब स्वच्छता, साफ पेयजल की कमी और अस्वच्छ वातावरण के कारण तेजी से फैल सकता है।

इससे बचाव के लिए सुरक्षित पेयजल का उपयोग, व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना, हाथों को साबुन से धोना तथा भोजन को स्वच्छ वातावरण में तैयार करना आवश्यक है। अधिकांश मामलों में हेपेटाइटिस A अपने आप ठीक हो जाता है। इसके उपचार में रोगी को पर्याप्त पानी, पौष्टिक आहार और सहायक देखभाल (Hydration एवं Nutrition) दी जाती है। इसके लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है।

हेपेटाइटिस B (HBV)

हेपेटाइटिस B सबसे अधिक गंभीर वायरल संक्रमणों में से एक है। यह जन्म के समय संक्रमित माँ से बच्चे में, संक्रमित रक्त, रक्त से बने उत्पादों तथा शरीर के विभिन्न तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है।

इसकी रोकथाम के लिए यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) के अंतर्गत हेपेटाइटिस B का टीकाकरण किया जाता है। इसकी पहली खुराक जन्म के तुरंत बाद, अधिकतम 24 घंटे के भीतर दी जाती है। इसके बाद 6, 10 और 14 सप्ताह की आयु में अन्य खुराकें दी जाती हैं।

यदि किसी व्यक्ति को क्रोनिक हेपेटाइटिस B हो जाता है, तो राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार पात्र रोगियों को एंटीवायरल दवाओं के माध्यम से उपचार प्रदान किया जाता है, जिससे बीमारी को नियंत्रित रखा जा सकता है और लिवर को गंभीर क्षति से बचाया जा सकता है।

हेपेटाइटिस C (HCV)

हेपेटाइटिस C मुख्य रूप से संक्रमित रक्त के संपर्क, असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित सुई या सिरिंज साझा करने तथा असुरक्षित चिकित्सीय प्रक्रियाओं के कारण फैलता है।

इससे बचाव के लिए सुरक्षित इंजेक्शन प्रथाओं का पालन करना, एक बार उपयोग वाली सुई का प्रयोग करना तथा नशे की स्थिति में सुई साझा करने जैसी गतिविधियों से बचना आवश्यक है। वर्तमान में हेपेटाइटिस C के लिए कोई प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

हालाँकि, आधुनिक चिकित्सा में डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल (Direct-Acting Antivirals – DAAs) दवाओं के कारण अधिकांश मरीजों का 12 से 24 सप्ताह के भीतर सफलतापूर्वक इलाज संभव हो गया है। इन दवाओं की सफलता दर लगभग 95 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है।

हेपेटाइटिस D (HDV)

हेपेटाइटिस D केवल उन लोगों में होता है जो पहले से हेपेटाइटिस B से संक्रमित होते हैं। यह संक्रमित रक्त, रक्त उत्पादों तथा शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है।

हेपेटाइटिस D से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका हेपेटाइटिस B के संक्रमण को रोकना है। चूँकि HDV, HBV के बिना संक्रमण नहीं कर सकता, इसलिए हेपेटाइटिस B का टीका व्यक्ति को हेपेटाइटिस D से भी प्रभावी सुरक्षा प्रदान करता है।

हेपेटाइटिस E (HEV)

हेपेटाइटिस E भी मुख्य रूप से दूषित भोजन और दूषित पानी के माध्यम से मल-मुंह (Faecal-Oral) मार्ग से फैलता है। खराब स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।

इससे बचाव के लिए साफ पानी पीना, स्वच्छ भोजन का सेवन करना तथा व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता बनाए रखना आवश्यक है। अधिकांश मामलों में यह संक्रमण भी बिना किसी विशेष दवा के अपने आप ठीक हो जाता है। उपचार के दौरान रोगी को पर्याप्त तरल पदार्थ, पौष्टिक भोजन तथा सहायक देखभाल दी जाती है। इसके लिए भी कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है।

भारत द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

भारत सरकार ने वायरल हेपेटाइटिस को एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में स्वीकार किया है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2018 में नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम (National Viral Hepatitis Control Program – NVHCP) शुरू किया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से देशभर में स्क्रीनिंग, समय पर पहचान और उपचार की सुविधाओं का विस्तार किया गया है।

यह कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals – SDGs) के अनुरूप है और वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस के उन्मूलन का लक्ष्य रखता है। इसके अंतर्गत जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लोगों की जांच और उपचार तक पहुँच को बेहतर बनाया जा रहा है तथा हेपेटाइटिस B और C से प्रभावित लोगों को निःशुल्क जांच एवं दवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।

यह कार्यक्रम हेपेटाइटिस A, B, C, D और E सभी प्रकार के वायरल हेपेटाइटिस को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। वहीं हेपेटाइटिस A और E के मामलों की निगरानी इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (Integrated Disease Surveillance Programme – IDSP) के अंतर्गत की जाती है जिससे संक्रमण के प्रसार पर समय रहते नियंत्रण किया जा सके।

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