वर्णम शास्त्रीय नृत्य किसके चरणों में से एक है?

Sanjay Yadav
वर्णम शास्त्रीय नृत्य किसके चरणों में से एक है?
A. भरतनाट्यम (Bharatanatyam)
B. कथक (Kathak)
C. कुचिपुड़ी (Kuchipudi)
D. ओडिसी (Odissi)
उत्तर: A. भरतनाट्यम (Bharatanatyam)

वर्णम शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम (Bharatanatyam) के चरणों में से एक है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों में से एक मानी जाती है। भारत की विविध नृत्य शैलियाँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे धर्म, दर्शन, आध्यात्मिकता, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक मूल्यों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रत्येक शास्त्रीय नृत्य शैली की अपनी विशिष्ट प्रस्तुति पद्धति, वेशभूषा, संगीत, ताल, लय, अभिनय और मुद्राएँ होती हैं। इन्हीं शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में भरतनाट्यम का विशेष स्थान है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि वर्णम शास्त्रीय नृत्य किसके चरणों में से एक है? इसका सही उत्तर भरतनाट्यम (Bharatanatyam) है।

वर्णम भरतनाट्यम की पारंपरिक प्रस्तुति का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे विस्तृत भाग माना जाता है। भरतनाट्यम की प्रस्तुति एक निश्चित क्रम में होती है जिसे "मार्गम" कहा जाता है। मार्गम का अर्थ है वह मार्ग या क्रम जिसके अनुसार एक नर्तक या नर्तकी अपनी प्रस्तुति देता है। इस क्रम का उद्देश्य दर्शकों को धीरे-धीरे नृत्य की तकनीकी सुंदरता, भाव-अभिनय और आध्यात्मिक अनुभूति तक पहुँचाना होता है। वर्णम इसी मार्गम का केंद्रीय और सबसे प्रभावशाली चरण है।

पारंपरिक मार्गम में सामान्यतः निम्नलिखित क्रम होता है—
  • अलारिप्पु (Alarippu)
  • जातिस्वरम् (Jatiswaram)
  • शब्दम् (Shabdam)
  • वर्णम (Varnam)
  • पदम् (Padam)
  • तिल्लाना (Tillana)
  • मंगलम् (Mangalam)
भरतनाट्यम का उद्भव दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में हुआ। इसका इतिहास लगभग दो हजार वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। प्राचीन काल में यह नृत्य मंदिरों में देवदासियों द्वारा भगवान की आराधना के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। समय के साथ इस नृत्य शैली का विकास हुआ और आज यह विश्वभर में भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुकी है। भरतनाट्यम में शारीरिक संतुलन, लय, ताल, मुद्राएँ, नेत्रों की गति, चेहरे के भाव तथा संगीत का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

वर्णम को भरतनाट्यम की आत्मा कहा जाता है क्योंकि इसमें नृत्य की तकनीकी क्षमता और भावपूर्ण अभिनय दोनों का सर्वोत्तम प्रदर्शन होता है। यह प्रस्तुति का सबसे लंबा भाग भी होता है। सामान्यतः वर्णम की अवधि 20 से 45 मिनट तक हो सकती है, हालांकि अनुभवी कलाकारों द्वारा इसे इससे भी अधिक समय तक प्रस्तुत किया जा सकता है। इस चरण में नर्तक या नर्तकी अपनी शारीरिक क्षमता, लयबद्धता, संतुलन, स्मरण शक्ति तथा भावों की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है।

वर्णम में दो प्रमुख तत्वों का समावेश होता है—नृत्त (Nritta) और नृत्य (Nritya)। नृत्त शुद्ध नृत्य होता है जिसमें केवल ताल, लय और शारीरिक गतियों पर ध्यान दिया जाता है। इसमें किसी कथा या भाव का प्रदर्शन नहीं किया जाता। दूसरी ओर नृत्य में अभिनय, भाव, मुख-मुद्राएँ और हाथों की मुद्राओं के माध्यम से किसी कथा, भक्ति, प्रेम, करुणा या अन्य रसों की अभिव्यक्ति की जाती है। वर्णम इन दोनों का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करता है।

भरतनाट्यम की पारंपरिक प्रस्तुति का क्रम अत्यंत व्यवस्थित होता है। सामान्यतः इसकी शुरुआत अलारिप्पु से होती है, जो शरीर को नृत्य के लिए तैयार करने वाला भाग है। इसके बाद जातिस्वरम् प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें केवल संगीत और नृत्य की तकनीकी सुंदरता दिखाई जाती है। फिर शब्दम् आता है, जिसमें पहली बार भाव-अभिनय का समावेश होता है। इसके बाद वर्णम प्रस्तुत किया जाता है, जो पूरी प्रस्तुति का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसके पश्चात पदम् आता है, जिसमें भक्ति, प्रेम और अन्य भावों का अत्यंत कोमल प्रदर्शन किया जाता है। अंत में तिल्लाना और मंगलम् के साथ प्रस्तुति समाप्त होती है।

भरतनाट्यम में हाथों की मुद्राओं को हस्तमुद्रा कहा जाता है। इन मुद्राओं के माध्यम से विभिन्न वस्तुओं, भावों, पात्रों और घटनाओं का चित्रण किया जाता है। वर्णम में इन हस्तमुद्राओं का अत्यंत प्रभावशाली उपयोग होता है। नर्तक अपने चेहरे के भाव, नेत्रों की गति, गर्दन की चाल, पैरों की ताल तथा हाथों की मुद्राओं के माध्यम से दर्शकों को कथा से जोड़ता है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रत्येक शैली की अपनी विशिष्ट प्रस्तुति संरचना होती है। कथक की बात करें तो इसमें ठाट, आमद, सलामी, तोड़े, टुकड़े, परन, चक्कर, गत-निकास, भाव तथा तराना जैसे भाग प्रमुख होते हैं। कथक की विशेषता उसके तेज़ चक्कर, घुँघरुओं की जटिल ताल तथा कथावाचन शैली में होती है। इसलिए वर्णम कथक का पारंपरिक चरण नहीं माना जाता।

इसी प्रकार कुचिपुड़ी भी दक्षिण भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य शैली है जिसका उद्भव आंध्र प्रदेश में हुआ। कुचिपुड़ी में नाटकीयता, संवाद, अभिनय और नृत्य का सुंदर समन्वय होता है। यद्यपि कुछ प्रस्तुतियों में वर्णम जैसी रचनाओं का उपयोग किया जा सकता है, फिर भी वर्णम विशेष रूप से भरतनाट्यम के मार्गम का प्रमुख चरण माना जाता है।

ओडिसी नृत्य का विकास ओडिशा में हुआ। इसकी प्रस्तुति में मंगलाचरण, बट्टू, पल्लवी, अभिनय और मोक्ष जैसे चरण प्रमुख होते हैं। ओडिसी की त्रिभंगी मुद्रा, मूर्तिकला जैसी शारीरिक आकृतियाँ तथा भगवान जगन्नाथ और श्रीकृष्ण की कथाओं पर आधारित अभिनय इसकी विशेष पहचान हैं। इसलिए वर्णम ओडिसी का पारंपरिक चरण नहीं है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मान्यता का आधार प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र है जिसकी रचना भरतमुनि द्वारा की गई मानी जाती है। इस ग्रंथ में नृत्य, संगीत, अभिनय, रंगमंच, रस, भाव तथा प्रस्तुति के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। भरतनाट्यम सहित भारत की अनेक शास्त्रीय नृत्य शैलियों पर नाट्यशास्त्र का गहरा प्रभाव है।

भरतनाट्यम में वेशभूषा भी अत्यंत आकर्षक होती है। नर्तकी विशेष प्रकार की रेशमी पोशाक पहनती है, जिसमें प्लीट्स (चुन्नट) होती हैं जो विभिन्न मुद्राओं के दौरान सुंदर दिखाई देती हैं। साथ ही मंदिर शैली के आभूषण, कमरबंद, बाजूबंद, घुँघरू, माथापट्टी, नथ, कर्णफूल और बालों में गजरा पहनना इसकी विशेष पहचान है। चेहरे पर विशेष मेकअप किया जाता है ताकि भाव दूर बैठे दर्शकों तक स्पष्ट रूप से पहुँच सकें।

भरतनाट्यम का संगीत मुख्यतः कर्नाटक संगीत पर आधारित होता है। प्रस्तुति के दौरान गायक, मृदंगम वादक, वायलिन वादक, बाँसुरी वादक तथा नट्टुवनार (ताल देने वाला गुरु) मिलकर नृत्य को जीवंत बनाते हैं। नट्टुवनार की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वही ताल और लय का संचालन करता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे जाते हैं। जैसे—भरतनाट्यम किस राज्य का नृत्य है, कथक का संबंध किस क्षेत्र से है, ओडिसी किस राज्य की शास्त्रीय नृत्य शैली है, कुचिपुड़ी कहाँ से उत्पन्न हुई, मोहिनीयाट्टम किस राज्य का नृत्य है, कथकली की विशेषताएँ क्या हैं, सत्रिया किस राज्य से संबंधित है तथा मणिपुरी नृत्य की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं। ऐसे प्रश्न सामान्य ज्ञान और कला एवं संस्कृति दोनों विषयों में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

भारतीय संस्कृति में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी रहा है। मंदिरों, धार्मिक उत्सवों और सांस्कृतिक आयोजनों में शास्त्रीय नृत्य का विशेष महत्व रहा है। भरतनाट्यम की प्रत्येक मुद्रा, प्रत्येक कदम और प्रत्येक भाव किसी न किसी दार्शनिक या धार्मिक संदेश को व्यक्त करता है। यही कारण है कि वर्णम जैसे चरण केवल तकनीकी प्रदर्शन नहीं बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का भी माध्यम होते हैं।

आज भरतनाट्यम केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक देशों में इसकी शिक्षा दी जाती है और हजारों विद्यार्थी इस नृत्य शैली का अध्ययन करते हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, विभिन्न विश्वविद्यालय, संगीत एवं नृत्य संस्थान तथा सांस्कृतिक अकादमियाँ भरतनाट्यम के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यह नृत्य भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

यदि प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से याद रखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण तथ्य की बात करें, तो यह है कि वर्णम भरतनाट्यम की पारंपरिक प्रस्तुति (मार्गम) का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय चरण है। इसमें शुद्ध नृत्य और भावपूर्ण अभिनय का सर्वोत्तम समन्वय होता है। कथक, कुचिपुड़ी और ओडिसी जैसी अन्य शास्त्रीय नृत्य शैलियों की अपनी अलग प्रस्तुति संरचना होती है, इसलिए वर्णम को विशेष रूप से भरतनाट्यम से जोड़ा जाता है। भारतीय कला एवं संस्कृति से संबंधित प्रश्नों की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे National GK की तैयारी के दौरान अवश्य याद रखना चाहिए। भारतीय शास्त्रीय नृत्य, उनकी उत्पत्ति, प्रमुख चरण, संबंधित राज्य, वेशभूषा, संगीत, प्रसिद्ध कलाकार तथा सांस्कृतिक महत्व जैसे विषय National GK के अंतर्गत बार-बार पूछे जाते हैं। इसलिए भरतनाट्यम और उसके वर्णम चरण की गहन समझ न केवल सामान्य ज्ञान को समृद्ध करती है बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की संभावना भी बढ़ाती है।

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