ऐतिहासिक उपलब्धि: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ सारनाथ, भारत के हुए अब 45 विश्व धरोहर स्थल

Sanjay Yadav
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद में स्थित प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ ने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि जोड़ दी है। दक्षिण कोरिया के बुसान गणराज्य में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र के दौरान सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को आधिकारिक रूप से यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (UNESCO World Heritage List) में शामिल किया गया। यह निर्णय न केवल भारत बल्कि संपूर्ण बौद्ध जगत के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सारनाथ वह पवित्र भूमि है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश दिया था।

ऐतिहासिक उपलब्धि यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ सारनाथ, भारत के हुए अब 45 विश्व धरोहर स्थल

सारनाथ के विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के साथ ही भारत में अब 45 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो गए हैं। विश्व धरोहर स्थलों की संख्या के आधार पर भारत अब विश्व में छठे स्थान पर तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर पहुँच गया है। यह उपलब्धि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्मारकों तथा प्राकृतिक धरोहरों के वैश्विक महत्त्व को दर्शाती है।

सारनाथ का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व

सारनाथ को बौद्ध धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान प्राप्त है। बौद्ध परंपरा के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सारनाथ पहुँचकर अपने पाँच पूर्व साथियों को पहला उपदेश दिया था। इस ऐतिहासिक घटना को "धर्मचक्र प्रवर्तन" (Turning of the Wheel of the Law) कहा जाता है। इसी उपदेश के माध्यम से बुद्ध ने मानवता को मध्यम मार्ग, चार आर्य सत्य तथा दुःख से मुक्ति का मार्ग बताया।

धर्मचक्र प्रवर्तन केवल एक धार्मिक घटना नहीं थी, बल्कि बौद्ध धर्म के औपचारिक प्रसार की शुरुआत भी थी। यहीं से बौद्ध दर्शन ने विश्वभर में अपना प्रभाव फैलाना प्रारंभ किया।

बौद्ध संघ का जन्मस्थान

सारनाथ को बौद्ध भिक्षु संघ का जन्मस्थान भी माना जाता है। यहीं भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पाँच शिष्यों को दीक्षा देकर बौद्ध संघ की स्थापना की। इसी अवसर पर उन्होंने आर्य अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया जो सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि पर आधारित है। यह मार्ग आज भी बौद्ध दर्शन की मूल आधारशिला माना जाता है।

बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में सारनाथ

भगवान बुद्ध ने स्वयं चार स्थानों को बौद्ध अनुयायियों के लिये प्रमुख तीर्थस्थल बताया था—
  • लुंबिनी (नेपाल) – जन्मस्थान
  • बोधगया (भारत) – ज्ञान प्राप्ति स्थल
  • सारनाथ (भारत) – प्रथम उपदेश स्थल
  • कुशीनगर (भारत) – महापरिनिर्वाण स्थल
सारनाथ के यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद अब इन चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में से तीन स्थल —लुंबिनी, महाबोधि मंदिर (बोधगया) और सारनाथ यूनेस्को विश्व धरोहर संपत्तियों के रूप में संरक्षित हैं।

अन्य बौद्ध विश्व धरोहर स्थलों से जुड़ाव

सारनाथ अब विश्व के अन्य महत्त्वपूर्ण बौद्ध धरोहर स्थलों की श्रेणी में शामिल हो गया है। इनमें भारत के साँची स्तूप, नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष तथा अजंता गुफाएँ, श्रीलंका का अनुराधापुरा, बांग्लादेश का पहाड़पुर, तथा पाकिस्तान के तक्षशिला और तख्त-ए-बाही जैसे ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं।

सारनाथ के प्राचीन नाम

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सारनाथ का उल्लेख अनेक नामों से मिलता है। इसे ऋषिपत्तन, इशिपत्तन तथा मृगदाव (हिरण उद्यान) कहा गया है। मृगदाव नाम इसलिए प्रसिद्ध हुआ क्योंकि प्राचीन काल में यह क्षेत्र हिरणों का प्राकृतिक निवास स्थान था।

भारत के राष्ट्रीय प्रतीक का उद्गम

सारनाथ का एक और महत्त्वपूर्ण योगदान भारत के राष्ट्रीय प्रतीक से जुड़ा है। यहाँ किए गए पुरातात्त्विक उत्खननों में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित सिंह शीर्ष (Lion Capital) प्राप्त हुआ जिसे स्वतंत्र भारत ने अपने राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया। इसी स्थल से गुप्तकालीन प्रसिद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन बुद्ध प्रतिमा भी प्राप्त हुई जिसे भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिना जाता है।

ये दोनों अमूल्य धरोहरें सारनाथ पुरातात्त्विक संग्रहालय में सुरक्षित हैं जिसकी स्थापना वर्ष 1904 में हुई थी। यह भारत का सबसे प्राचीन स्थल संग्रहालय माना जाता है।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सारनाथ

यूनेस्को द्वारा चयन के आधार

भारत सरकार ने वर्ष 1998 में सारनाथ को यूनेस्को की Tentative List (संभावित सूची) में शामिल किया था। बाद में इसके असाधारण सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व को देखते हुए इसे विश्व धरोहर सूची के लिये नामांकित किया गया।

सारनाथ को मुख्यतः दो मानदंडों के आधार पर मान्यता मिली—

मानदंड (iii): निरंतर आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्त्व वाले प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में।
मानदंड (vi): भगवान बुद्ध के जीवन, उनके उपदेशों तथा त्रिरत्न (बुद्ध, धर्म और संघ) से प्रत्यक्ष संबंध के कारण।

सारनाथ विश्व धरोहर स्थल के प्रमुख घटक

यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त इस क्रमिक (Serial Property) धरोहर में कई ऐतिहासिक स्मारक सम्मिलित हैं।

चौखंडी स्तूप
  • यह ऊँची ईंटों से निर्मित संरचना उस स्थान का प्रतीक मानी जाती है जहाँ भगवान बुद्ध अपने प्रथम पाँच शिष्यों से मिले थे। यह बौद्ध इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल है।
धमेख स्तूप
  • धमेख स्तूप सारनाथ का सबसे प्रसिद्ध स्मारक है। यह विशाल बेलनाकार स्तूप उसी स्थान को चिह्नित करता है जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। वर्तमान में यह बौद्ध श्रद्धालुओं के लिये प्रमुख तीर्थस्थल है।
धर्मराजिका स्तूप
  • धर्मराजिका स्तूप भारत के सबसे प्राचीन बौद्ध स्तूपों में से एक माना जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार इसका निर्माण सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कराया था।
मूलगंधकुटी विहार
  • यह वह स्थान माना जाता है जहाँ भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला वर्षावास (Varshavasa) किया था। यह बौद्ध अनुयायियों के लिये अत्यंत पवित्र स्थल है।
अशोक स्तंभ
  • तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित बलुआ पत्थर का यह स्तंभ भारतीय इतिहास की महान धरोहर है। इसका सिंह शीर्ष आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है तथा इसके आधार पर अंकित धर्मचक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मध्य भाग में भी स्थान प्राप्त करता है।

दो हजार वर्षों से अधिक पुरानी विरासत

सारनाथ केवल स्तूपों और मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहाँ प्राचीन मंदिरों, विहारों, तीर्थस्थलों तथा अनेक पुरातात्त्विक अवशेषों के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। ये स्मारक लगभग दो सहस्राब्दियों तक बौद्ध शिक्षा, दर्शन, मठवासी जीवन और अंतरराष्ट्रीय तीर्थयात्रा के केंद्र के रूप में सारनाथ के विकास की कहानी बताते हैं।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल क्या है?

विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) ऐसे सांस्कृतिक, प्राकृतिक अथवा मिश्रित स्थल होते हैं जिन्हें उनकी असाधारण सार्वभौमिक महत्ता (Outstanding Universal Value) के कारण यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्रदान किया जाता है। इन स्थलों का संरक्षण केवल संबंधित देश की ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता की साझा जिम्मेदारी माना जाता है।

1972 का विश्व धरोहर कन्वेंशन

विश्व धरोहर स्थलों की मान्यता का आधार 1972 में अंगीकृत "विश्व सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण संबंधी कन्वेंशन" है। वर्तमान में विश्व के 170 देशों की 1,248 विश्व धरोहर संपत्तियाँ इस सूची में सम्मिलित हैं।

यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति इन स्थलों के संरक्षण, प्रबंधन तथा निगरानी का कार्य अपने विश्व धरोहर कार्यक्रम के माध्यम से करती है।

भारत ने वर्ष 1977 में इस कन्वेंशन का अनुसमर्थन किया था। भारत वर्ष 2021–2025 तक यूनेस्को विश्व धरोहर समिति का सदस्य भी रहा तथा जुलाई 2024 में नई दिल्ली में विश्व धरोहर समिति के 46वें सत्र की सफल मेजबानी की।

भारत की संभावित सूची

वर्तमान में भारत की Tentative List में 69 स्थल सम्मिलित हैं। किसी भी स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने से पहले उसका इस सूची में होना अनिवार्य होता है। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र प्रतिवर्ष केवल एक स्थल को अंतिम नामांकन के लिये प्रस्तुत कर सकता है।

भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर से संबंधित सभी मामलों के लिये भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की श्रेणियाँ

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Heritage): ऐतिहासिक भवन, स्मारक, पुरातात्त्विक स्थल तथा सांस्कृतिक महत्व की संरचनाएँ।

प्राकृतिक धरोहर (Natural Heritage): ऐसे क्षेत्र जहाँ उत्कृष्ट प्राकृतिक, जैविक तथा भूवैज्ञानिक विशेषताएँ पाई जाती हैं।

मिश्रित धरोहर (Mixed Heritage): ऐसे स्थल जिनमें सांस्कृतिक और प्राकृतिक दोनों प्रकार के असाधारण मूल्य मौजूद हों। उदाहरण के रूप में ग्रीस का माउंट ओलिंपस तथा भारत का खांगचेंदज़ोंगा राष्ट्रीय उद्यान उल्लेखनीय हैं।

खतरे में पड़े विश्व धरोहर स्थल

यूनेस्को ऐसी धरोहरों की एक अलग सूची भी तैयार करता है जो युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, प्रदूषण, अनियंत्रित शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन या अन्य कारणों से गंभीर खतरे का सामना कर रही हों। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से इन धरोहरों के संरक्षण हेतु त्वरित सुधारात्मक उपाय लागू करना है।

आपातकालीन नामांकन प्रक्रिया

1972 के विश्व धरोहर कन्वेंशन के अंतर्गत ऐसी धरोहरों के लिये Emergency Nomination Process की व्यवस्था भी है जो तत्काल विनाश के खतरे में हों। इस प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें शीघ्र विश्व धरोहर सूची में शामिल कर अंतरराष्ट्रीय संरक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के लाभ और चुनौतियाँ

यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से किसी स्थल को वैश्विक पहचान, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण, तकनीकी सहायता, वित्तीय सहयोग तथा पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत को भी लाभ पहुँचता है। हालांकि अत्यधिक पर्यटन, व्यावसायीकरण, प्रदूषण तथा संरक्षण संबंधी चुनौतियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए संतुलित पर्यटन और वैज्ञानिक संरक्षण की नीति अपनाना आवश्यक है।

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